Thursday, March 15, 2018

180. मेघ: लोक-वार्ताएं और वैदिक पुराकथा (प्रारूप)


मेघ: लोक-वार्ताएं और वैदिक पुराकथा (प्रारूप)

ताराराम,
जोधपुर(राजस्थान) 

1.विषय की पृष्ठभूमि -  मेघ या मेग भारत का एक प्राचीन राजनैतिक और सांस्कृतिक जातीय समूह है। कर्नल कन्निंघम ने इसे भारत की आदिम जाति कहा है। वेदों  में उल्लेखित मेगाद्रू नदी का ‘मेगाद्रू’ नाम उस नदी के मुहानों पर मेघों के निवासित होने के कारण ही पड़ा। मेगाद्रू नदी  को ही बाद में सताद्रू और सतलज नदी कहा है।[1]  प्राचीन काल में मेघ जाति का विस्तार मेगाद्रू नदी से मेघना नदी तक रहा है।  वर्तमान में यह जाति भारत के 10 राज्यों और 2 केंद्र प्रशासित राज्यों में अधिसूचित अनुसूचित जातियों में शुमार है। भारत के 8 राज्यों में यह मेघ नाम से, दो राज्यों(छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश) में सिर्फ मेघवाल नाम से, महाराष्ट्र में मेघवाल व मेंघवार नाम से, गुजरात में मेघवाल, मेघवल, मेंघवार नाम से, राजस्थान में मेघ, मेघवाल, मेगवाल और मेंघवार नाम से, जम्मू-कश्मीर में मेघ व कबीरपंथी के नाम से, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा आदि में मेघ के नाम से अधिसूचित है। इन राज्यों में मेघ लोग भगत, आर्य-भगत, कबीरपंथी, रिखी या रिखिया  आदि अन्य नामों से भी जाने जाते है। मेघ शब्द व्यक्तिवाचक और गुणवाचक शब्द है और इसके साथ जुड़े ‘ वाल’ का अर्थ ‘समूह’ या ‘वंशज’ से हैं। पीपल ऑफ़ इंडिया-राजस्थान में  मेघ जाति की उत्पति या निकास एक ऐसे  ऋषि से हुआ बताया गया  है, जिस में बादलों से वर्षा कराने की शक्ति थी, अस्तु उस ऋषि को मेघ कहते थे। मारवाड़ मर्दुम शुमारी में भी मेघ जाति की उत्पत्ति ‘मेघ ऋषि’ से होना उल्लेखित किया गया है और  ‘मेघ’ को ब्राह्मण उल्लेखित किया है।[2] बॉम्बे गजेटियर[3] बॉम्बे गजेटियर में मेघवालों की उत्पति और उनकी प्राचीनता के बारे में उल्लेख है कि –-मेग, संभवतः तिमुर के मेगियन ( Magians of Timur ) है, जो रियासी जम्मू और अक्नुर की वृहद् जनसँख्या है, ये निम्न जाति  मूल-प्रजाति ( pure race ) है, दूसरी जगहों में यह बहिष्कृत या जाति-बाह्य है। ये संभवतः आर्यन के मेकी ( Mekie ) है और मेखोवल उनसे ही सम्बंधित है। ये सारस्वत ब्राह्मण होने का दावा करते है। बुर्नेस ( Burnes ) इन्हें दक्षिण थार की मूल प्रजाति ( aboriginal race ) मानता है। ये निचले- सिंध के मेहर ( Mehar ) और बलूचिस्तान के मेघरी ( Meghari ) है। ये प्लिनी ( Pliny ) के मेगरी ( Megari ) या मेगाल्लाए ( Megallae ) है और ये राजपुत-इतिवृत्त में मोकर ( Mokar ) है।  पंजाब कास्ट्स [4] में भी मेघ जाति की उत्पति किसी मेघ नामक व्यक्ति से ही हुआ बताया गया है। इन सब प्रसंगों में मेघ जाति अपना सम्बन्ध मेघ यानि बादल से जोडती है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है और इस जाति की मान्यता है कि इस धरती पर सबसे पहले मेघ ही हुआ, उसी की संतति में बाकी सभी जातियां है। राजस्थानी शब्दकोष में मेघ को एक वंश का नाम बताया गया है। मेघ आर्यों के भारत-आगमन से पूर्व भारत में निवासित रही एक प्राचीन आदिम-जाति है। राजपूतों के परिघटन के समय कई अन्य समूह भी इस जाति में सामिल हुए। मूलतः यह ऋग्वैदिक काल में सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारों पर बसने वाला एक राजनैतिक और सांस्कृतिक समूह था।          

भारत की विभिन्न जातियों की लोक-कथाओं में इसके बारे में तरह-तरह की कथायें प्रचलित है, जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद में प्रयुक्त मेघ, वृत्र और इंद्र आदि से किसी न किसी रूप से जुडा हुआ है। यह जानना रुचिकर है कि  ऋग्वेद में  कई प्रसंगों में इसका उल्लेख हुआ है। मेघों में प्रचलित या उनके बारे में प्रचलित कथा-कहानियों  में स्पष्टतः वैदिक आधारभूमि दृष्टिगोचर होती है।  वेदों में जिन पात्रों का वर्णन है या उल्लेख है, वे केवल रूपक नहीं है; बल्कि उनका लौकिक सन्दर्भ भी सिद्ध होता है और न्यूनाधिक रूप से उनकी ऐतिहासिकता प्रकट होती है। उनका ऐतिहासिक निरूपण जन-मानस में प्रचलित लोक-कथाओं के माध्यम से संधारित किया जा सकता है। मेघ, वृत्र, पणि, असुर, दास, दस्यु आदि ऐसे ही पात्र है। ये शब्द ऋग्वेद में बार-बार आये है और देश के कोने-कोने में इन्हें कथा और कहानियों के माध्यम से आज तक संजोकर रखा है। निरुक्त में मेघ के 30 नामों का उल्लेख है, जिस में वृत्र को भी मेघ कहा गया है।(अद्रिः, ग्रावा, गोत्रः, बलः, अश्न:, पुरुभोजा:, बलिशान:, अश्मान, पर्वतः, गिरिः, वज्रः, चरुः,वराहः, शम्बरः, रौहिनः, रैवतः, फलिग:, उपरः, उपल:, चमसः, अहिः, अभ्रं, बलाहकः, मेघः, दृतिः, ओदनः, वृशधि:, वृत्रः, असुरः, कोश इति त्रिंशन्मेघ्नामानि, [5]) मेघ हेतु प्रयुक्त ये शब्द रूपक मात्र ही नहीं है, बल्कि इन शब्दों का लौकिक अर्थ और सन्दर्भ भी है, जिसे बाद की कथा-कहानियों में भी उकेरा गया है, इन शब्दों में से अधिकांश शब्द मेघ जाति की उपजातियों(clans) के द्वारा आज भी धारण किये जाते  है, यथा अद्रि से आद्रा, ग्रावा से गारवा, गोत्र से गोत्रा, बल से बल और बाला,उपल से उपल और उपला, अहि से अहीनिया, रौहीन से रोहिणा और रोहिन आदि-आदि । ये सभी जातियां अपना आदि-पुरुष ‘मेघ’ को ही मानते है। क्या ऋग्वैदिक मेघ ही इस मेघ जाति का आदि पुरुष रहा है? यह एक बहुत बड़ी गुत्थी है। प्रस्तुत शोध-पत्र में लोक में प्रचलित इस मेघ या मेघवाल जाति के ‘मेघ’ शब्द के अर्थ को ऋग्वेद में आये मेघ और वृत्र शब्द के सन्दर्भ में  अनावरित करने का एक लघु प्रयास किया गया है। चूँकि इस बारे में किसी भी प्रकार का अनुसन्धान नहीं हुआ है, अतः प्रस्तुत शोध-पत्र की अपनी बाध्यताएं है। यह इस सन्दर्भ में शोधार्थियों का ध्यान आकर्षित करने का एक संकेत भर है। इसकी प्रमाणिकता और ऐतिहासिकता भविष्य के अनुसन्धान पर टिकी है अर्थात यह कोई अंतिम गवेषणा नहीं है।                

2. सिन्धु-घाटी के लोग ही असुर कहे गए हैनिरुक्त में मेघ को असुर कहा गया है और आर्यों के आगमन के पूर्व वे सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के मुहानों पर और पर्वतों पर बसे हुए थे।  आर्यों के आदिम देश को लेकर मुख्यतः चार सिद्धांत प्रतिपादित हुए है। ये है- यूरोप का सिद्धांत, मध्य-एशिया का सिद्धांत, उत्तरी ध्रुव का सिद्धांत और सप्त-सैन्धव का सिद्धांत। इन में से अंतिम दो सिद्धांतों को अधिक समादर नहीं मिला है और अभी तक यह प्रश्न विवादस्पद ही रहा है कि आर्य किस प्रदेश के निवासी थे। प्रस्तुत शोध-पत्र का प्रत्यक्षतः यह विषय नहीं है। अतः ये यहाँ विवेच्याधीन नहीं है। हम इस बात को लेकर संतुष्ट है कि आर्यों का सम्बन्ध भारत के बाहर के देशों से था और ये भारत में आक्रमणकारी के रूप में आये। किन्तु यह निर्विवाद रूप से माना जाता है कि आर्य सीधे ही भारत में नहीं आये, अपितु आदिम स्थान से उनका पहला अभिगमन बाल्ख प्रदेश के समीप हुआ। यहाँ ये पर्याप्त समय तक रहे। वेद और अवेस्ता की धार्मिक एवं सांस्कृतिक समानता को देखते हुए यह मानना अनुचित नहीं होगा कि जहाँ अन्य आर्य जातियां आदिम देश से ही मूल जाति से अलग हो गयी, वहां वैदिक एवं ईरानी आर्य काफी समय तक साथ-साथ रहे। यह समय बाल्ख प्रदेश में निवास का था।

इतिहास पुस्तकों से हमें जानकारी मिलती है कि वैदिक आर्य बाल्ख प्रदेश से सप्त-सिन्धु की ओर आये। बाल्ख-प्रदेश से सिन्धु-प्रदेश में आने तक उन को किन-किन बाधाओं या जातियों से संघर्ष करना पड़ा, इसकी जानकारी भी अत्यल्प है। परन्तु, यह गवेषित है कि वैदिक आर्यों के सप्त-सिन्धु प्रदेश में आगमन से पूर्व यहाँ एक संस्कृति पल्वित थी, जिसे हम ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ कह सकते है। आर्य लोग घुमक्कड़ थे, स्थायी रूप से एक जगह नहीं रहने वाले वैदिक आर्यों के विरुद्ध सिन्धु घाटी के लोग मोहनजोदड़ो और हड़प्पा नामक दो बड़े-बड़े नगरों में रहते थे, जो एक विकसित नगरीय संस्कृति थी। आर्यों का मेघों, असुरों, पणियों, दासों या दस्युओं आदि से अनवरत संघर्ष चला। वृत्र नाम का असुर आर्यों के विरोधी दल का सबसे बड़ा पराक्रमी नेता था।   

स्पष्टतः वैदिक आर्यों के सप्त-सिन्धु प्रदेश में प्रवेश का सिन्धु-सभ्यता के लोगों ने कड़ा विरोध किया। आक्रमणकारी एवं गृह-विहीन आर्यों के विरुद्ध नगर और दृढ पुरों वाले इन लोगों का विरोध निश्चय ही उग्र था, जिसकी स्पष्ट तस्वीर इंद्र और वृत्र के संघर्ष में दिखती है। यह ध्यातव्य है कि सिन्धु-घाटी की सभ्यता के लोगों का सम्बन्ध असीरिया की सभ्यता के लोगों से था और सिन्धु-घाटी के लोगों और असीरिया के लोगों में कई बातों में समानता होने के कारण वैदिक आर्यों ने उन्हें असुर कहा।[6] (ऋग्वेद में इन्द्र, पृष्ठ-119.) , इस आधार पर मेघ असुर कहे गए है। प्रो. कोसाम्बी का मत है कि यदि असुरों को असीरियन नहीं भी माने, तब भी उन्हें मनुष्य मानना उपयुक्त है।[7] अर्थात ऋग्वेद में प्रयुक्त वृत्र या मेघ मनुष्य ही थे। अतः आर्यों के द्वारा प्रयुक्त ‘असुर’ शब्द को हम सिन्धु-घाटी के लोगों के लिए प्रयुक्त ही मानेंगे।

3. लोक-कथाओं में मेघ- भारत की कई जन-जातियों में वृत्र, जिसे मेघ राजा कहा गया है, उसकी कई कथा-कहानियां आज भी प्रचलित है। मेघ, जिसे ऋग्वेद में बादल या असुर कहा गया है, उसे कई जन-जातियां एक व्यक्ति-रूप ‘मेघ’ व वर्षा से सम्बंधित देवता या ऋषि मानती है। वह इसे केवल बादल का ही प्रतीक नहीं मानती है। मेघ जाति मेघ को सिर्फ बादल ही नहीं मानती, बल्कि इसे अपना आदि पुरुष मानती है एवं जाति के नामकरण का कारण भी इसे ही मानती है। गोंड(बोही, पंडरिया जमीदारी) में प्रचलित कथा में सूरज और चन्द्रमा को मेघ राजा और मेघ रानी की पुत्रियों के रूप में कहा गया है। बिजली उनकी तीसरी पुत्री कही गयी है। यह प्रतीकात्मक प्रतीत होता है, परन्तु इन जातियों में मेघ को लेकर जो परम्परायें प्रचलित है, वे इन प्रतीकों को व्यकिरूप और सामाजिक-गठन को रूप देती है; यथा: विवाह से पूर्व वधु के घर कार्य करना, वधु के हल्दी आदि लगाना और वधु के सुसराल पहुँचाने से पहले वर द्वारा वधु का मुंह नहीं देखना आदि इस कहानी के माध्यम से कहा गया है, जो इन जन-जातियों और अन्य आदि-निवासियों में आज भी परंपरा के रूप में प्रचलित है।[8]

भील जन जाति में ‘मेघ राजा’ को कालो वारो या कि काला वायरा(हवा) कहा जाता है और उसे वर्षा का देवता माना जाता है। उन में प्रचलित कहानी में काली बादली(Dark Cloud) मेघ राजा की पत्नी है। बारी मेघ( Twelve Rains), गजन घोटो(Thunder House), थोथी वीजल(Limping Lightning), काली वीजल(Dark Lightning) उनकी संतति है। इनकी कहानी में मेघ राजा के किसी यात्रा के समय दो देवताओं से युद्ध का जिक्र है और कहा गया है, सैनिकों के खून की जितनी भी बूँदें गिरती उतने ही सैनिक पैदा हो जाते थे। वे काली हवा के पास गए काली हवा बादलों के साथ आई और भयंकर बरसात करने लगी, जिस से सैनिकों के घाव से बूंदें धुल जाती और नए सैनिक पैदा होने बंद हो गए और अंत में राजा पराजित हो गया।[9]

बैगा जन-जाति(कसैकुंड, कवर्धा-स्टेट) में भी मेघ राजा और मेघ रानी की कहानी प्रचलित है और उनके दरबार का जिक्र है। इस कहानी में भीमसेन, दुर्होदानो(दुर्योधन) आदि पात्रों का भी जिक्र किया जाता है.[10] गुर्जर जाति में मेघ को ‘मेघ-बाबा’ के रूप में पूजा जाता है। वह इंद्र और मेघ दोनों के प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर मेघ की पूजा-अर्चना करती है। प्रतीकात्मक स्वरूप में इंद्र को उल्टा लटकाती है और उसके सामने मेघ का प्रतीक बनाकर पूजती है। यह इंद्र और मेघ के प्रति इस जाति की धारणा को व्यक्त करता है। वहीँ मेघ, मेघवाल, मेघवार जाति तो मेघ को अपना आदि पुरुष ही मानती है, वे इसे रिखी या ऋषि की उपमा भी देते है। उनकी मान्यता में मेघ न तो असुर है और न आसुरी शक्ति का प्रतीक है, बल्कि सृष्टि का प्रथम पुरुष है। इन विभिन्न जन-जातियों में प्रचलित मेघ का जल से सम्बन्ध है और उनके लिए वह जल का देवता है, हालाँकि वेद में मेघ को असुर कहा गया है और जल-वर्षण को रोकने वाली या जल की बाधक शक्ति के रूप में उसका निरूपण है। इंद्र उस से जल को मुक्त कराता है। वहां जल का देवता इंद्र है। वेद में मेघ के प्रति श्रृद्धा नहीं है, वहीँ इन जातियों में मेघ के प्रति अगाध श्रृद्धा है। 

4. वृत्र और मेघ की वैदिक अवधारणा- वैदिक साहित्य में वृत्र को भी असुर कहा गया है। यास्क ने सर्वप्रथम निरुक्त में वृत्र सम्बन्धी जिज्ञाषा में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि ‘मेघ’ रूपी वृत्र को विद्युत रूपी वज्र से आहत करके इंद्र ने जल को मुक्त किया। निरुक्त का लेखक यास्क प्रश्न करता है- ‘को वृत्र?’ अर्थात वृत्र कौन? और इसके जबाब में लिखता है- ‘वृत्रो मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोसुर इत्यैतिहासिका’[11] (निरुक्त,2.10) इस में न्यूनाधिक रूप से वृत्र के बारे में उस समय प्रचलित रही दो परम्पराओं का दिग्दर्शन होता है। वह पूर्वपक्ष को रखने के बाद ऐतिहासिकों की मान्यता को भी रखता है, जिनके अनुसार वृत्र एक असुर था। वह तवष्टा का पुत्र था। इस पर इस से अधिक विमर्श न करते हुए, वह इस परंपरा की अनदेखी करता है और नकारता है। यास्क निरुक्त की परंपरा का पालन करता है और उसी अनुरूप इसका यत्र-तत्र वर्णन करता है। सायण भी निरुक्त की विचार-परंपरा का अनुगमन करता है। परन्तु, निरुक्त में उल्लेखित इस वर्णन से भी यह स्पष्ट है कि आदि काल से ही वेद की पुराकथाओं(mythology) की व्याख्या को लेकर दो परम्पराएँ विद्यमान थी- एक ऐतिहासिक परंपरा(historical school) और दूसरी नैसर्गिक या प्राकृतिक परंपरा(naturalistic school).[12] प्राकृतिक परंपरा का अनुगमन करने वाले वेदों के प्रतीकवाद को दृष्टिगत रखकर वेदमंत्रों का अर्थ करते है। यास्क और सायानाचार्य इस परंपरा का प्रतिनिधित्त्व करते है। इसके पश्चात् मैकडोनल, ओल्डेनबर्ग, पेरी, ब्लूमफिल्ड आदि कई विद्वान इस परम्परा का समर्थन करते है। इस परम्परा को प्रतीकवाद भी कह सकते है, लेकिन यह रूपक या प्रतीकवाद सब जगह और सब सन्दर्भों में उपयुक्त नहीं बैठता है। क्योंकि घटनाएँ और घटनाओं के पात्र सब जगह रूपक या प्रतीक ही नहीं है। इंद्र और वृत्र के सन्दर्भ में तो यह प्रतीकवाद धराशायी होता हुआ दिखता है एवं ऐतिहासिकों की परंपरा सुष्ठु ठहरती है।

ऋग्वेद में वृत्र का उल्लेख कई मन्त्रों और प्रसंगों में मिलता है। जिनकी मान्यता है कि ऋग्वैदिक मन्त्रों में आये हुए नाम या पात्र रूपक या प्रतीक है, उनके विचार में वृत्र एक बाधा है। यह नकारात्मक या आसुरी प्रवृतियों हेतु प्रयुक्त रूपक या नाम है। उनका यह भी मानना है कि जिस समय आर्य अपने मूल निवास या आदि प्रदेश में थे, तब उनका जीवन कठिन था और विभिन्न तरह की बाधाओं का सामना करते थे। उन बाधाओं के लिए उन्होंने एक शब्द चुना जिसे उन्होंने ‘वृथ्र’ नाम दिया. यह नाम अवेस्ता में सुरक्षित है। और, जब बाल्ख प्रदेश से ईरानी और वैदिक आर्य अलग-अलग हो गए, तब भी वह धारणा उनके दिमाग में चलती रही और वैदिक आर्यों का जब सिन्धु प्रदेश में आव्रजन हुआ तो उसी वृथ्र को ऋग्वेद में वृत्र कहकर संबोधित किया। लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि ऋग्वेद में आये हुए वृत्र का सम्बन्ध मेघ या जल से सम्बंधित है, जबकि अवेस्ता के वृथ्र का जल से कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरी बात यह है कि अवेस्ता का वृथ्र ‘बाधा’ है, वहीँ ऋग्वेद का वृत्र ‘बाधक’ है। साथ ही, ऋग्वेद का वृत्र एक वचन में ही नहीं बल्कि कई स्थलों पर बहुवचन में भी प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद में वृत्र के नपुंसक लिंग के  बहुवचन के ‘वृत्राणि’ शब्द का प्रयोग प्रायः उन दैत्यों के साथ हुआ है, जो वृत्र के मित्र थे और वृत्र से कम भयंकर भी थे। एकवचन में उल्लेखित ‘वृत्र’ इंद्र का मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं एवं बहुवचन में प्रयुक्त ‘वृत्राणि’ गौण प्रतिद्वंद्वी है या अन्य प्रतिद्वंदियों के गण या समूह है।

वृत्र को मेघ भी कहा गया है, उसके अनुसार ‘वृत्र अर्थात मेघ जल को रोक लेता है, वर्षण नहीं करता। इंद्र, जो कि वर्षण का देवता है, अपने वज्र से अर्थात विद्युत से मेघ को विदीर्ण कर जल धाराओं को बरसाने के लिए मुक्त कर देता है’। इस मत के अनुसार ‘पर्वत’ अथवा गिरी जहाँ जल संचित रहता है, मेघ ही है। ऋग्वेद में अन्यत्र भी पर्वत का अर्थ मेघ ही है।[13]  इस प्रतीकात्मकता में आमतौर पर पर्वत का अर्थ ‘मेघ’ होता है, किन्तु फिर भी ओल्डेनबर्ग की स्वीकृति है कि इंद्र-वृत्र युद्ध में वर्णित पर्वत मेघ नहीं, अपितु वैदिक ऋषि की दृष्टि में वास्तविक पर्वत थे। इसी भांति इंद्र द्वारा विमुक्त नदियां भी सूक्ष्म न होकर पार्थिव है, विशेषकर विपाशा और शुतुद्रि(मेगाद्री)। कर्नल एलेग्जेंडर कांनिन्घम ने शताद्री को मेघों की नदी कहा है, इसका मूल नाम मेगाद्री ही था। मेगाद्री अर्थात मेघों की नदी। और ये मेघ लोग यहाँ के आदि-निवासी थे।निरुक्त में मेघ के 30 नामों का उल्लेख है, जिस में वृत्र भी को भी एक मेघ ही कहा गया है।(अद्रिः, ग्रावा, गोत्रः, बलः, अश्न:, पुरुभोजा:, बलिशान:, अश्मान, पर्वतः, गिरिः, वज्रः, चरुः,वराहः, शम्बरः, रौहिनः, रैवतः, फलिग:, उपरः, उपल:, चमसः, अहिः, अभ्रं, बलाहकः, मेघः, दृतिः, ओदनः, वृशधि:, वृत्रः, असुरः, कोश इति त्रिंशन्मेघ्नामानि,[14] स्पष्ट यह है कि  ऐतिहासिक परम्परा की दृष्टि से ये शब्द रूपक मात्र ही नहीं है, बल्कि इन शब्दों का लौकिक अर्थ और सन्दर्भ भी है और इस दृष्टि से वृत्र या मेघ उस कालावधि में व्यक्ति-विशेष ही ठहरते है, न कि कोई प्रतीकात्मक बाधा। 

वृत्र, जिसे इंद्र ने अपने वज्र से मारा, उसे असुर कहा गया है। ऋग्वेद के कई मन्त्रों में वृत्र का मानव के रूप में उल्लेखित किया गया है, यथा: स राजसि पुरुष्टुतं एको वृत्राणि जिघ्नसे।[15], also life ancient India,[16] ‘..Similarly Vritra, whom Indra slew with his thunderbolt, was no doubt the demon that imprisoned water in the cloud, but the Vritras sometimes seem to refer to human tribes and not demons, as in “Auspicious Indra, best hero in the fight where spoil is gathered, the strong who listens, who give aid in battles, who slays the Vritas, wins and gathers riches” (ऋग्वेद 10.89.18). “Then wast thou, chieftain of all living mortals, the very mighty slayer of the Vritas; then didst thou set the obstructed rivers flowing, and with the floods that were enthralled by Dasas”(ऋग्वेद 8.85.18). “Thou art king, alone thou smitest Vritras dead, to gain, O Indra, spoils of war and high renown”(ऋग्वेद  8.15.3)’[17] ‘Indra’s attempt to capture the cows of Panis(R.V. 10.108) seems to refer to fights with a tribe of traders living near an actual river Rasa, who refused to present priests of the fire-cult with cattle and not to meteorological phenomena.’

‘Sambara, Sushna, Pipu and others, were probably actual kings or perhaps gods of the tribes who refused to accept the worship of Indra.’[18]

परम्परा के अनुसार इंद्र और वृत्र के युद्ध का रोचक वर्णन कई स्थलों पर हुआ है। इंद्र-वृत्र युद्ध के सन्दर्भ में उल्लेखित झंझावत(storms) एवं विद्युत आदि अपरोक्ष रूप से बहुत ही कम आते है, अधिकतर परोक्ष रूप में आते है। ऋग्वेद में किसी भी स्थल में इंद्र को स्पष्टतः जल-वर्षण करने वाला नहीं कहा है।.....प्रो. कार्पेंतियर(Charpentier) के अनुसार इंद्र देवता झंझावत या ग्रीष्मकालीन उष्णता का देवता न होकर एक जातीय नेता था, जो समय के आदिम जनों का देवता बन गया।(‘Indra was not the god of thunder or heat-summer; he was the heroic and somewhat grotesque chief of a flock of early knightes-errant’, ‘rustic; semi-nomadic, strong and half-barbarous people’.[19]  (दांडेकर द्वारा ज. पू. यू. 21, पृष्ठ-४६-47 पर उद्धृत)                                  

इंद्र और उसके अन्य विरोधी : -  बाल्ख से भारत में आने तक इंद्र को अनेक जातियों से युद्ध करना पड़ा, तथा भारत में भी उसे सहज प्रवेश नहीं मिला। उसे सिन्धु-घाटी के लोगों से लड़ना पड़ा। वृत्र मेघ उन में सबसे प्रबल शत्रु था। आर्यों के भारत में बस जाने के बाद भी यदा-कदा विद्रोह करने वाली जातियों का भी उसे दमन करना पड़ा। ऋग्वेद में इन समस्त विरोधी जातियों के लिए ‘दास’ शब्द का भी प्रयोग हुआ है। आदिम घुमक्कड़ और सरल जीवन में पद-पद पर आर्यों को अनेकानेक कठिनाइयों और बाधाओं का सामना करना पड़ा। उन कठिनाईयों और बाधाओं को आज हम दुर्भाग्य, आपत्ति अथवा विघ्न आदि कई शब्दों से व्यक्त करते है और जानते है। अवेस्ता में ‘वृथ्र’ शब्द बाधाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है। बल्ख-प्रदेश से जब ईरानी और वैदिक आर्य अलग-अलग हो गए, तब भी उनके मन-मस्तिष्क में वह अवधारणा चलती रही, यही कारण है कि सप्त-सिन्धु में प्रवेश करने पर सामने आने वाली हर बाधा को उन्होंने वृत्राणि कहकर संबोधित किया। चाहे ये बधाएं प्राकृतिक रही हो या मानवीय। यही कारण है कि अवेस्ता में वृथ्र(vrera) तथा ऋग्वेद में वृत्र अथवा वृत्राणि शब्द मिलते है। शब्द साम्यता के साथ ही इन दोनों शब्दों के अर्थ और सन्दर्भ में जो सबसे महत्त्वपूर्ण भेद भी मिलता है, ऋग्वेद में वृत्र प्रायः जल या जल-वर्षण से सम्बंधित है, वही अवेस्ता में वृथ्र का जल से सम्बन्ध नहीं मिलता है। साथ ही ऋग्वेद का वृत्र ‘बाधा’ मात्र नहीं है, बल्कि ‘बाधक’ भी है और एक व्यक्ति के रूप में भी ज्ञाप्त होता है।

इंद्र के शत्रुओं को दैत्य मानकर उल्लेखित किया गया है। वृत्र व शम्बर आदि इंद्र के प्रमुख शत्रु वर्णित किये गए है। ऋग्वेद में इंद्र का प्रमुखतम प्रबल शत्रु वृत्र ही है। वृत्र का वध करने के कारण ही इंद्र को वृत्रहन की उपाधि मिली।[20] व वृत्रहन वृत्रों का वध करो [21] इंद्र के शत्रुओं के जो अन्य नाम मिलते है, उन में अहि, शुष्ण[22], पणि[23], अर्बुद,[24] बल, रोहिण[25], व्यंस[26], अहीशुव, विश्वरूप, स्वर्भानु, उरण,[27] अश्न,[28] पिशाची, शंडिका, क्रिवी,[29], शम्बर[30], पिपु[31], नमुचि,[32], धुनि, चुमुरी,[33] वर्चिन[34], कुयव, कर्णज, पनेय, कुवयच, इली-बिश[35], नार्मर, नव-वास्त्य, मृगय, वृष-शिप्र, मख, अनर्शाने, पद-ग्रभी, रुधिका[36], दृभीक[37], वंग्रद आदि कई है।

निरुक्त में वृत्र के बारे कहा गया है, ‘तत्को वृत्रो? मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोसुर इत्यैतिहासिकाः।[38] स्पष्टः यह है कि वृत्र एक ऐतिहासिक व्यक्ति था। वह एक मेघ था। वह एक असुर था। ऐतिहासिकों के मतानुसार वृत्र वस्तुतः कोई पार्थिव व्यक्ति था। जिसके साथ इंद्र का संघर्ष वास्तविक युद्ध का परिचायक है। ऋग्वेद में वृत्र को एक व्यक्ति मानकर उसके माता और पिता का उल्लेख भी मिलता है। जिसके अनुसार वृत्र की माता दानु[39] थी और उसके पिता का नाम त्वष्ट्र था। बुद्ध प्रकाश के अनुसार इंद्र आर्यों का युद्ध नेता था व वृत्र दस्यु थे।[40]

रामनाथ अवस्थी[41] इंद्र को एक व्यक्ति मानते है। उनके अनुसार वृत्रासुर असीरिया, सीरिया या शाम का प्रसिद्द दलपति था। रामगोविंद त्रिवेदी का कथन है कि ‘अवेस्ता से ज्ञात होता है कि बेबीलोन नगर को आर्यशून्य करने के लिए वृत्र ने अद्विशूर नाम की देवी की उपासना की थी, किन्तु प्रयत्न में असफल रहा—फ़ारस के राजा साइरस ने जैसे टाइगर्स नदी का प्रवाह रोककर बेबीलोन को जितने का निश्चय किया था .....’(हिंदी ऋग्वेद की भूमिका) ऐ.ब्रा.(8.18) के उद्धरण से स्पष्ट है कि दस्युओं द्वारा आर्यजन अभिप्रेत थे। वृत्र को अहि कहने का तात्पर्य है कि उसके अनुगामी जन सर्पपूजक थे।( हिंदी ऋग्वेद की भूमिका)

अन्यत्र बुद्धप्रकाश ने वृत्रों को प्राग्वैदिक भारतीय जाति माना है, जिसे मेगास्थनीज ने अपनी इंडिका पुस्तक में “Veretatae” कहा है।[42] इंद्र द्वारा वृत्र का वध करना ब्रह्महत्या माना गया है इस से यह साबित होता है कि वृत्र ब्राह्मण था। मेघ जाति भी अपने इस आदि-पुरुष मेघ को ब्राह्मण ही मानती है।  इंद्र को वर्षण का देवता मानने वाले विद्वान वृत्र को ‘मेघ’ मानते है। पेरी का कथन है कि वृत्र को नाना रूपों[43] में प्रदर्शित किया जाता है।[44]

हापकिंस वृत्र को जल रोकने वाली शक्ति मानते है।[45] मैगन के अनुसार वृत्र एवं अहि दोनों ही जल निरोधक तत्त्व है। केवल इनके स्वरूपगत अंतर के कारण भिन्न-भिन्न नाम है।[46] म्योर वृत्र को सूखे का दैत्य(demon of drought)कहते है। उनके अनुसार मेघ में जल को रोक रखने वाली दुरात्माओं को वृत्र, अहि, शुष्ण, नमुचि, पिप्रु, शम्बर एवं उरण आदि कहा गया है।[47] लुडविग के अनुसार वृत्र दैवी-जल को पृथ्वी से अलग रखता है।[48] ए.पी. करमाकर के अनुसार इन्द्र-वृत्र युद्ध आर्य-नाग संघर्ष का चित्रण करता है।[49]

वृत्र शब्द का अर्थ-
वृत्र को अवाराणार्थक वृ धातु अथवा वर्तनार्थक वृत्त धातु से निष्पन्न मानते है। वृत्त का भाव वैदिक नहीं है। अनेक संस्कृतियों में वृत्राहा के तुल्य देवता प्राप्त है। अतः वृत्र शब्द की निरुक्ति किसी वैदिक धातु से माननी उपयुक्त नहीं है। प्रो. दांडेकर भारोपीय धातु वार को वृत्र के मूल में बताते है, जिसका अर्थ बाधा देना(to resist) है। वृत्र के विभिन्न अर्थ लिए जाते है। पेरी के अनुसार इसका प्रयोग प्रथमतः बचाव(Hindrancess, defence), एवं तत्पश्चात जिससे बचाव किया जाए अर्थात् शत्रुओं के लिए होने लगा।[50] चट्टोपाध्याय भी वृत्र शब्द को शत्रु के लिए प्रयुक्त मानते है।[51] दांडेकर के अनुसार वृत्र शब्द का मौलिक अर्थ निरोध या बाधा है।[52] यह ध्यातव्य है कि ऋग्वेद में प्रायः वृत्र के बहुवचन ‘वृत्रानि’[53] का प्रयोग उन विविध विरोधी शक्तियों के प्रति हुआ है; तो इस बहुवचन के प्रयोग का क्या प्रयोजन है। अतः वृत्र को नाना भांति की विरोधी शक्तियों का मुर्तिकरण मानना उचित है। मैकडोनल का कथन है कि इंद्र द्वारा दासों पर विजय पूर्णतः व्यक्तियों पर विजय है क्योंकि विशेष दास का वध विशिष्ट व्यक्ति के लिए होता है।[54] जो भी हो, आर्यों को सप्त-सिन्धु की ओर परायण के समय अनेक जातियों से युद्ध करना पड़ा। उस समय यात्रा की बाधक इन जातियों को ही ‘वृत्राणि’ कहा गया, जान पड़ता है। आगे चलकर इन नानाविध बाधारूप शत्रुओं को मूर्त रूप में वृत्र नामक दैत्य की संज्ञा दे दी गयी।[55]

इसके पश्चात् जब इंद्र को प्राकृतिक शक्ति का देवता बनाने के लिए वर्षण से सम्बंधित किया गया, तो वृत्र को वह मेघ माना गया जो जल को बरसने नहीं देता अर्थात वर्षण का बाधारूप। इंद्र का सुर्यीकरण(Solarisation) हुआ तो वृत्र को सूर्य-विरोधिनी शक्ति अर्थात अंधकार के रूप में चित्रित किया गया। इस प्रकार से इंद्र के व्यक्तित्त्व का विकास होने के साथ-साथ वृत्र के चरित्र का भी विकास हुआ। इंद्र और वृत्र को अलग नहीं किया जा सकता है। जहाँ-जहाँ इंद्र का विकास हुआ, विजयी देवता इंद्र है और विजित को वृत्र संज्ञा दी गयी। मूलतः वृत्र वह बाधा है जो इंद्र की प्रतिरोधी है। ऋग्वेद में बहुवचन में प्रयुक्त ‘वृत्राणि’ शब्द मनुष्य-शत्रुओं का एवं एकवचन में आया वृत्र दैत्य का बोधक है।

Dandekar writes- ‘A minute and careful consideration of the descriptions in RV of Indra-Vrtra-contest brings out some significant facts in this connection. It will be seen that, in all such descriptions, the words like ‘thunder’, ‘cloud’, ‘lightening’, ‘rain’, etc., seldom occur directly. The waters, which Indra is credited with having released and let flow, are often terrestrial, rather than celestial, waters. The terms, which are frequently used in these passages, are ‘thunderbolt’, ‘mountain’, ‘fortresses’, ‘cows’, ‘light’, ‘waters’, etc. One would, therefore, be justified in asking whether the main intention of Vedic poets could have really been to suggest the phenomena of thunderstorm and rain through the symbolism of Indra-Vrtra-war. The occurrence, in the RV, of poetic symbolism is, it may be pointed out, quite understandable. ...... As  a matter of fact it is actually interpreted variously.’[56]

Dandekar – ‘A reference has already been made .....to the traditional belief that the Indra is a latter addition to the Vedic pantheon. This very significant tradition cannot be adequately explained except on the the assumption of Indra’s primarily human personality. It implies that Indra was not originally a god, but that he was a human hero who attained godhead by virtue of his miraculous exploits. Not only that, but soon he superseded the olden gods. (RV, 7.21.7) and came to be regarded the foremost among them. (RV, 2.12.1). this fact is mythologically represented in variety of ways in the later Vedic literature.( TS 2, 3.4.2, MS 1, 9.4, TB 2, 2.3.3; 2, 2.7.2, AB8, 4.12)     

   इंद्र के अस्त्रों में वज्र प्रमुख है, जिसे सामान्यतया ‘अयस’ यानि की धातु का बताया गया है।[57] चूँकि वृत्र सभी विरोधी तत्त्वों का चित्रण करता है, अतः इंद्र के अन्य शत्रुओं को भी प्रायः वृत्र कहा गया है। ‘दास द्वारा शासित एवं अहि द्वारा रक्षित जल निरुद्ध था। इंद्र ने वृत्र को मारकर रुके हुए स्रोतों को खोल दिया[58]. इस वर्णन से वृत्र ही अहि एवं दास के रूप में वर्णित जान पड़ता है। इसी वृत्र को ‘सर्पों में आदिजन्मा’[59] कहा गया है।            

असुर और इंद्र-  आर्यों के प्रचंड वीर नेता इंद्र ने असुरों के अनेक पुर नष्ट किये[60] असुरों के पुरों को विदीर्ण करने के कारण ही इंद्र को पुरंदर का विशेषण मिला। इंद्र का एक अन्य विशेषण पुरभिद अर्थात शत्रुओं के पुरों(नगरों) का नाश करने वाला भी है।[61] पुरो को जीत कर दासों पर अधिकार करने का उल्लेख है[62] इंद्र के समान वृत्रहन तथा पुरभिद वाक्य का प्रयोग भी हुआ है[63] पुरभिद का समानार्थी शब्द ‘पुरंदर’ है। आर्यों ने सिन्धु-घाटी में बने हुए अनेक बाँध इत्यादि भी नष्ट किये। आज भी मोहनजोदाडो से कुछ पश्चिम में अनेक ऐसे ध्वस्त बांध मिलते है। प्रो. कोसाम्बी के अनुसार, जल को मुक्त करने के लिए इंद्र द्वारा किसी दानव के वध की कथाएं, वस्तुतः इन बांधों को तोड़ने से ही सम्बंधित है।

मघवन शब्द भी इंद्र के लिए प्रयुक्त हुआ है।[64] इंद्र-वृत्र युद्ध की भीषणता का प्रायः वर्णन है। यह भी सूर्य के हिमानी अथवा अंधकार के विरुद्ध संघर्ष में सटीक नहीं बैठते है। ये वर्णन इतने विशद एवं स्पष्ट है कि इन्हें आलंकारिक मानना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता है। प्रायः यह युद्ध दो सजीव व्यक्तियों के बीच हुए संघर्ष का चित्रण मालूम पड़ते है। साथ ही ऋग्वेद में इंद्र का अत्यंत मानवीय वर्णन हुआ है। ओल्डनबर्ग[65] के विचार में इन्द्र और वृत्र के युद्ध में जिन पर्वतों और नदियों का वर्णन हुआ है उन्हें सांकेतिक रूप से बादल के रूप में नहीं समझा जा सकता है, बल्कि वे वास्तविक पर्वत है। उसी प्रकार से जिन नदियों का वर्णन है, वे सूक्ष्म-दैवीय जल(celestial water) नहीं है बल्कि वे वास्तविक नदियाँ है।[66] हिल्लेब्रन्द्त (Hillebrandt) ने सुझाव दिया है कि वृत्र द्वारा जिस जल को अवरुद्ध किया गया था, वह दैवीय-वर्षा का जल नहीं था, बल्कि वे पृथ्वी की वास्तविक नदियों का जल था।[67]

आर्यों ने सिन्धु-घाटी में बने हुए अनेक बाँध इत्यादि भी नष्ट किये। आज भी मोहनजोदाडो से कुछ पश्चिम में अनेक ऐसे ध्वस्त बांध मिलते है। प्रो. कोसाम्बी[68] के अनुसार, जल को मुक्त करने के लिए इंद्र द्वारा किसी दानव के वध की कथाएं, वस्तुतः इन बांधों को तोड़ने से ही सम्बंधित है।

 इन शब्दों का वास्तविक अर्थ क्या है? वृत्रस्य यद् बद्वधानस्य रोदसी[69], इन्द्रो यद् वृत्रमवधीन्न्दीवृतं[70], निरुद्धा आपः पणिनेव गावः[71] वृत्र या मेघ, पणि, दस्यु आदि किसे कहा गया है? क्या ये रूपक मात्र या कोई अवरोधक शक्ति है या उस समय के किन्हीं लोगों के अभिध्येयार्थ इनका कोई लौकिक अर्थ भी था। ऋग्वेद में इस सन्दर्भ में वृत्र-मेघ आदि सन्दर्भों पर आशु-दृष्टि डाल दे, जिन में वृत्र या मेघ या मेघों का उल्लेख है.

( ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 32 वें सूक्त के 1ले, 4थे व 5वें मन्त्र में,[72] 51वें सूक्त के 4थे व 10वें मन्त्र में,[73] 5वें सूक्त के 5वें मन्त्र में[74], 57वें सूक्त के 6ठे मन्त्र में,[75] 61वें सूक्त के 7वें और 9वें मन्त्र में,[76] 103 के पहले मन्त्र में,[77] 130वें सूक्त के 3रे मन्त्र में,[78] 135वें सूक्त के 6ठे मन्त्र में,[79] ऋग्वेद के 5वें मंडल के 32वें सूक्त के 1ले मन्त्र में,[80] ऋग्वेद के 6ठे मंडल के 30वें सूक्त के 4थे और 5वें मन्त्र में,[81] ऋग्वेद के 10वें मंडल के 43वें सूक्त के 8वें मन्त्र में,[82] ऋग्वेद के 10वें मंडल के 133वें सूक्त के 2रे मन्त्र में,[83]   ऋग्वेद के10वें मंडल के 139वें सूक्त के 6ठे मन्त्र में,[84])

मेघ विशेषण का ऋग्वेद 5/30/7 में प्रयोग हुआ है।[85] शीघ्र बनने वाले मेघ के रूप में ऋग्वेद 6/26/5 में प्रयोग हुआ है।[86] बिना बरसने वाले मेघ के लिए ऋग्वेद 7/19/2 में प्रयोग हुआ है।[87] बलरहित शत्रु के लिए ऋग्वेद 10/83/1 में प्रयोग हुआ है।[88] अनार्य के लिए ऋग्वेद 10/83/19 में प्रयोग हुआ है।[89] अज्ञानी, अकर्मका, मानवीय व्यवहार से शून्य व्यक्ति के लिए ऋग्वेद 10/22/8 में प्रयोग हुआ है।[90] प्रजा के विशेषण में ऋग्वेद 6/25/2, 10/148/2  और 2/11/4 में प्रयोग हुआ है।[91] वर्ण के विशेषण रूप में ऋग्वेद 3/34/9,  2/12/4 में हुआ है।[92] उत्तम कर्महीन व्यक्ति के लिए ऋग्वेद 10/22/8  में दास शब्द का प्रयोग हुआ है[93] अर्थात यदि ब्राह्मण भी कर्महीन हो जाय तो वो भी दास कहलायेगा। गूंगे या शब्दहीन के विशेषण में ऋग्वेद 5/29/10 में दास का प्रयोग हुआ है[94]

वैदिक इंडेक्स आदि के लेखकों ने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया हैं कि वेद में आर्य और दस्युओं के युद्ध का वर्णन हैं। यह सर्व-संज्ञात है कि वेद में दासों के साथ युद्ध करने का वर्णन मिलता है। इन्द्र और वृत्र के युद्ध का तो रोचक वर्णन ऋग्वेद और पुराण में मिलता है। वृत्र को असुरों का राजा कहा गया है। वृत्र मेघ का नाम है या कि वृत्र एक मेघ है। इसे प्रथम मेघ, अहि मेघ आदि नामों से भी संबोधित किया गया है। अगर इस युद्ध को रूपक या अलंकारिक भाषा में मान लिया जाय तो इन दोनों का परस्पर संघर्ष प्राकृतिक युद्ध के जैसा हैं। परन्तु दधीची, इन्द्र, वृत्र, मेघ, असुर आदि रूपक मात्र ही नहीं है, ये उस समय के इतिहास-पुरुष है और इन में इतिहास छुपा पड़ा है। इतिहास की दृष्टि से इसकी गवेषणा का कार्य अभी भी वांछित है। इतिहासकार का काम इन कथा-कहानियों से इतिहास के सूत्र ढूढ़ना है। इतिहास-अन्वेषण की दृष्टि से पुराणों पर काफी कुछ कार्य हुआ है और उस से भारत का प्राचीन इतिहास उजागर हुआ है, परन्तु वेदों में वर्णित घटनाओं और नामों पर इतिहास-अन्वेषण की दृष्टि से किंचित-मात्र भी अन्वेषण नहीं हुआ है। इन पर शोध कर हम इतिहास को और अधिक रोशन कर सकते है.

यास्काचार्य ने भी निरुक्त 2/16 में इन्द्र-वृत्र युद्ध को प्राकृतिक माना है। इसलिए वेद में जिन भी स्थलों पर आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना की गई है उन स्थलों को प्रकृति में होने वाली क्रियाओ को उपमा अलंकार से दर्शित किया गया हैं। वहीँ ऐतिहासिकों ने उसे एक व्यक्ति माना है। प्रस्तुत शोध-पत्र में वृत्र को एक ऐतिहासिक पात्र के रूप में गवेषित किया गया है।

(ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 32 वें सूक्त के 1ले, 4थे व 5वें मन्त्र में, 51वें सूक्त के 4थे व 10वें मन्त्र में, 5वें सूक्त के 5वें मन्त्र में, 57वें सूक्त के 6ठे मन्त्र में, 61वें सूक्त के 7वें और 9वें मन्त्र में, 103 के पहले मन्त्र में, 130वें सूक्त के 3रे मन्त्र में, 135वें सूक्त के 6ठे मन्त्र में, ऋग्वेद के 5वें मंडल के 32वें सूक्त के 1ले मन्त्र में, ऋग्वेद के 6ठे मंडल के 30वें सूक्त के 4थे और 5वें मन्त्र में, ऋग्वेद के 10वें मंडल के 43वें सूक्त के 8वें मन्त्र में, ऋग्वेद के 10वें मंडल के 133वें सूक्त के 2रे मन्त्र में,   ऋग्वेद के10वें मंडल के 139वें सूक्त के 6ठे मन्त्र में,)

वृत्रासुर की कथा वेद में हैं। वेदों में इंद्र और वृत्र के युद्ध के सैकड़ों मन्त्र है। इन मन्त्रों में कहा गया है कि ‘इंद्र ने वृत्र का वध किया। वृत्र के सब अनुयायियों का नाश किया। वृत्र के सिर को इंद्र ने काटा। त्वष्टा देवों का शिल्पी था, उसने इंद्र को सौ धारावाला वज्र बनाया, इस शत-पर्ववाले वज्र से इंद्र ने वृत्र का सिर काटा। वृत्र के सब मर्म काटे, हनु काट दी. इस तरह वृत्र के टुकड़े-टुकड़े करके उसका वध किया।’

घनो वृत्रानामभवः।[95]ऋग.1.4.8

घनं वृत्राणाम जनयन्त देवाः।[96]ऋग. 3.49.1

श्रेष्ठो घने वृत्रानाम।[97]ऋग.6.28.8

घनो वृत्रानाम तविषो बभूथ।[98]ऋग. 8.96.18

हंतो वृत्रानामसि।[99]ऋग. 9.88.4

वृत्रस्य अभिनत शिरः।[100]ऋग. 1.52.10

अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद वज्रं सवपस्तमं स्वयं रणाय. वृत्रस्य चिद विदद येन मर्म तुजन्निशानस्तुजता कियेधाः।[101] ऋग. 1.61.6

इन्द्रो वृत्रस्य तविषीं निरहंत्सहसा सहः महत्तदस्य पौस्यं वृत्रं जघन्वान असृजत[102]।ऋग. 1.80.10

इन्द्रो वृत्रस्य संजितो धनानाम।[103]ऋग. 5.42.5

वी चिद वृत्रस्य दोधतो वज्रेण शतपर्वणा. शिरो बिभेद वृष्निना।[104]ऋग.8.6.6

अयमिन्द्रो मरुत्सखा वि वृत्रस्यभिनच्छिरः। वज्रेण शतपर्वणा।[105] ऋग.8.76.2

निषीम वृत्रस्य मर्मणि वज्रमिन्दो अपीपयत।[106]ऋग. 8.100.7

वृत्रस्य हनू रुज।[107]ऋग. 10.152.3

श्रीमद्भागवत पुराण में यही कथा विस्तार से कही गयी है। भागवत में कहा गया है कि “त्वष्टा का पुत्र वृत्र था। इस वृत्र ने सब लोक पराभूत किये और सब लोकों पर अंधकार छा दिया। सब लोक भयभीत हुए और ईश्वर की प्रार्थना करने लगे। ‘हे ईश्वर! इस त्वष्टा पुत्र असुर का नाश कर, इसने सब के शस्त्र खाए है और सबको परास्त किया है।’ ईश्वर ने सब देवों से कहा कि ‘हे देवो! तुम दधीची ऋषि के पास जाओ और उसकी हड्डियाँ मांगो। वह ऋषि बड़ा ज्ञानी है, वह तुम्हें हड्डियाँ देगा। उन हड्डियों से विश्वकर्मा वज्र बना देगा और उस वज्र से इंद्र वृत्र का वध करेगा।’ इस तरह सौ धाराओं से युक्त वज्र को विश्वकर्मा ने बनाया और इस वज्र से इंद्र ने उस वृत्र का नाश किया। उस वृत्र के हाथ-पांव तोड़े गए और वह भूमि पर मरकर गिर गया. वृत्र का वध होने के बाद तीनों लोक दुःख रहित हो गए.”

महता रौद्रदंष्ट्रेंण जृम्भमाणम मुहुर्मुहु:, वित्रस्ता दुद्रुबुलोर्का वीक्ष्य सर्वे दिशोदश।[108]श्रीमद्भागवत.6.9.17.

येनावृता इमे लोकास्तमसा त्वाष्ट्रमूर्तिना, स वै वृत्र इति प्रोक्तः पापः परमदारुण:।[109]श्रीमद्भागवत.6.9.18.

अथो ईश जहि त्वाष्ट्रम ग्रसंतम भुवनत्रयम, ग्रस्तानि येन नः कृष्ण तेजान्स्यस्त्रायुधानि च।[110] श्रीमद्भागवत.6.9.44.

मघवन यात भद्रं वो दध्यंच ऋषिसत्तमम, विध्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरं।[111]श्रीमद्भागवत.6.9.51.

सा वा अधिगतो दध्यंदडश्विभ्याम ब्रह्म निष्कलम, यद्वा अश्वशिरो नाम तयोरमरताम् व्यधात।[112] श्रीमद्भागवत.6.9.52.

दध्यांगाथर्वणस्त्वाष्ट्रे वर्माभेध्यम मदात्मकम, विश्वरूपाय यात्प्रादात्त्वष्टा यत्त्वमधास्ततः।[113]श्रीमद्भागवत.6.9.53.

युष्मभ्यं याचितोश्विभ्यामधर्मज्ञोंगानि दास्यति, ततस्तैरायुधश्रेष्ठो विश्वकर्मविनिर्मितः।[114]श्रीमद्भागवत.6.9.54

येन वृत्रशिरो हर्ता मत्तेज उप वृन्हितः।[115]श्रीमद्भागवत.6.9.5

स तु वृत्रस्य परिघं करं च करभोपमम, चिच्छेद युगपद्देवो वज्रेण शतपर्वणा।[116]श्रीमद्भागवत. 6.12.25

छिन्नपक्षो यथा गोत्रः खादभ्रष्टो वज्रिणा हतः।[117]श्रीमद्भागवत.6.12.1

वृत्रे हते त्रयो लोका विना शक्रेण भूरिद, सपाला ह्यभवन सद्यो विज्वरा निर्वृतेंद्रियाः।[118]श्रीमद्भागवत.6.13.1”

यह उल्लेखनीय है कि जिन नामों का उल्लेख भागवत में है, वे वेद मन्त्रों में भी इसी सन्दर्भ में मिलते है। दधीची ऋषि का नाम ऋग्वेद के प्रथम मंडल में मिलता है,

यामथर्वा मनुष्पिता दध्यन्धियमत्नत, तस्मिन् पूर्वथेन्द्र उक्था समग्तार्चान्ननु स्वराज्यम।[119]ऋग. 1.80.16

see also ऋग. 1.116.12

इन्द्रो दधीचो अस्थिभि: वृत्रान्यप्रतिष्कुतः, जघान नवतीर्नव।[120]ऋग. 1.84.13

आथर्वणायाश्विना दधिचेश्व्यम शिरः प्रत्येरयतम, युवं शचीभिर्वीमदाय जायाम न्यूहथु: पुरुमित्रस्य योषाम।[121]ऋग. 1.117.20

इस तरह से अथर्वपुत्र दधीची का वर्णन भी वेद मन्त्रों में है। ‘उसको अश्व का सिर लगाया गया और उसने अश्विनीदेवों को मधुविद्या कही। दधीची ने अपनी हड्डियाँ दी, इन हड्डियों का वज्र बनाया और उस वज्र के द्वारा इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया।’ इसी प्रकार से वृत्र के साथी शंबरासुर[122](शम्बर के लिए देखिये; ऋगवेद 2.24.2, 1.112.14, 1.59.6, 1.101.2, 2.12.11, 4.30.14, 6.18.8 व अन्य)  और नमुचि[123](नमुचि के लिए देखिये, ऋग्वेद 1.53.7, 2.14.5, 7.19.5, व अन्य) आदि का भी वर्णन वेदों में और पुराण में भी हुआ है। ये मन्त्र या श्लोक मात्र अलंकारिक या रूपक नहीं है। इन में उल्लेखित ये पात्र उस समय के लोग और जन जातियां थी, जिनका संघर्ष वैदिक ऋषियों से हुआ या होता रहता था।

इंद्र का नाम ही केवल पूर्व वैदिक है, किन्तु देवाताविशेष के रूप में उसका विकास वैदिक संस्कृति की देन है। बहुदेववाद के क्षेत्र में इंद्र को निजी और अतुलनीय व्यक्तित्त्व का अधिकारी माना गया है। इंद्र के व्यक्तित्व की सारी समस्याओं के तर्कसंगत समन्वय की दृष्टि से इंद्र को प्रारंभ से देवता ण मानकर यह स्थापित करने की चेष्टा की गयी है कि इन्द्र प्रारंभ में व्यक्ति था और बाद में देवता रूप में उसका विकास हुआ( इंद्र-व्यक्ति-उपाधि-देवता) इंद्र और वृत्रहा की धारणाएं मूलतः दो भिन्न धारणाएं है।  वृत्र और वृत्रहा का भाव भारोपीय है, जबकि इंद्र का वैदिक, और विकास के क्रम में दोनों चरित्रों को एक व्यक्तित्व में संश्लिष्ट कर दिया गया है।

इंद्र के दैहिक शरीर का वर्णन- आकृति और प्रकृति दोनों ही दृष्टि से ऋग्वेद में इंद्र का अत्यंत मानवीय चित्रण मिलता है। ऋग्वेद में आये विभिन्न प्रसंगों के अनुसार इंद्र एक सुदृढ़ शरीर, भुजाएं और सिरवाला है।[124](ऋग-2.16.2, 8.85.3), अनेक बाहु न होकर इंद्र दो हाथों वाला है, जिसका बायाँ हाथ भी सुन्दर है और दाहिना हाथ भी[125](ऋग-8.33.5)। इंद्र के हाथ सुगठित है[126](ऋग-4.21.90)। इसकी भुजाएं दूर तक फैलने वाली, विशाल व शक्ति-संपन्न[127](ऋग-6.193, 8.32.10/70.1) है। इसकी हथेलियाँ विशाल[128](ऋग-6.29.2) है। इंद्र की जिह्वा सुनिर्मित एवं विस्तृत[129](ऋग-6.41.2) है। इसकी ग्रीवा दृढ[130](ऋग-8.17.8) है। इसके कानों का उल्लेख[131](ऋग-1.10.9) है। इसके केश[132](ऋग-10.96.5/8) व दाढ़ी[133](ऋग-10.23.4)का रंग हरित है। कभी-कभी इसके केशों का रंग स्वर्णिम भी बताया गया है। इंद्र स्वर्ण-वर्णी[134](ऋग-1.7.2, 8.55.3) है। किन्तु कभी-कभी इसका रंग हरा भी दृष्टिगोचर होता[135](ऋग-10.96) है। उसे सुशिप्र[136](ऋग-2.12.6/33,5.19.3),शिप्रिन[137](ऋग-1.29.2, 3.30.10, 8.2.28) एवं शिप्रवान[138](ऋग-6.17.2) कहा गया है। शिप्र के अनेक अर्थ किये गए है, जिन में हनु, नासिका, अधर, एवं दाढ़ी आदि है। उसके उदर को झील के समान विस्तृत कहा गया[139](ऋग-3.36.8) है। उसे सूर्य से भी अधिक कांतिवाला बताया गया[140](ऋग-10.112.3) है।

वृत्रहनन-  वस्तुतः इंद्र का वास्तविक नाम वृत्रहा ही है, अन्य नाम तो गौण है। ऋग्वेद में इंद्र के लिए कहा गया है- ‘वृत्रहेन्द्रो नामान्यपराः’ अर्थात इंद्र का सच्चा व्यक्तित्व तो उसके वृत्रहा अभिधान से ही स्पष्ट है। वृत्र से तात्पर्य उन सभी विरोधी तत्वों से है, जिनका इंद्र संहार करता है। इंद्र वृत्र का वध करता[141](ऋग-6.20.2) है। शम्बर व पिप्रु जैसे दास नेताओं को समाप्त करता[142](ऋग-1.130.7, 8.32.2) है। रिप, क्रिमिद्न आदि दुरात्माओं का हन्ता[143](ऋग-7.32.12, 7.104.2) है। दस्युओं का नाश करता[144](ऋग्वेद 4.18.3, 1.13.8, 3.34.9) है। पणियों को पराजित करता[145](ऋग-6.20.4, 7.56.10) है। जल को अवरुद्ध करने वाली शक्तियों को समाप्त करता[146](ऋग-1.32.12, 2.12.12, 4.26.6) है। अंधकार को नाश कर प्रकाश लाता[147](ऋग-1.6.3, 1.121.2) है।


असुर कौन ?
कुइपेर(F.B.J. Kuiper) के मतानुसार सृष्टि के प्रथम चरण में असुर एक विशेष देवताओं का समूह है।[148](F.B.J,Kuiper, The Basic Concept of Vedic Religion: History of Religion-15 (1975), page-108, cited in Asura in Early Vedic Religion p-1), नार्मन ब्राउन(W. Norman Brown) वेद में देव और असुर दो वर्गों का वर्णन हुआ मानते है। कुछ देव दोनों वर्ग में उल्लेखित किये गए है। उसके मतानुसार असुर शब्द अशुभचिंतक या दुष्ट लोगों (malevolent being) के लिए प्रयुक्त हुआ है। असुरों में भी दो वर्ग थे- अच्छे और बुरे, जिन असुरों को अच्छा कहा गया, वे आदित्य कहे गए और बुरे, जिन्हें दानव कहा गया है, जिनका नेता वृत्र था। असुर का मूल अर्थ मालिक(lord) के जैसा है, परन्तु अनुप्रयोग में इसका अर्थ बलशाली या बलवान व्यक्ति या अतिमानव या मायावी होता है। ऋग्वेद में वरुण, मित्रवरुण, आदित्य आदि समूहों के लिए असुर शब्द का प्रयोग हुआ है। इंद्र, अग्नि, सूर्य और संभवतः रूद्र आदि के लिए भी असुर शब्द का प्रयोग हुआ है। द्यौस के लिए भी लिए भी हुआ है। यह सिद्ध है कि असुरों को देवों से अलग किया जा सकता है।[149] (W. Norman Brown, The Creation Myth of Rig Veda, Journal of the American Oriental Society 62(1942), pp-88-91. Cited in Asura in Early RV, p-4) 

 हौग(Haug) ने पहली बार प्रस्तावित किया कि इंडो-ईरानियन लोगों के अलग-अलग धर्म में बंटने के कारण भारत में असुर और ईरान में अहुर का अलग विकास हुआ।[150](Arthur Berriedale Keith, The Religion and Philosophy of Veda and Upanishads, 2 vols, Harward Oriental Series, vols.31 and 32, 1925, reprint, Motilal Banarasidass, 1970, vol.1, p-231, cited in Asura in RV, P-5) ब्रद्के(P. von Bradke) ने हौग के सिद्धांत का परिमार्जन करते हुए असुर का अर्थ highest lordship से लिया है और बताया कि असुर शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग द्यौस के लिए किया गया है।[151](P. von Bradke, Dyaus Asura, Ahura Mazda and die Asuras, Halle; Max Niemeyer, 1885, cited in Asura in RV,P-5-6) रुडोल्फ ओटो (Rudolf Otto) हौग के मत का अनुसरण करते हुए स्पष्ट करता है कि एक असुर धर्म था, जो ईरानियों और वैदिक आर्यों के अलग-अलग होने से पहले अस्तित्व में था। भारत में उस धर्म को वैदिक ‘देव’ धर्म ने अवशोषित कर लिया गया, परन्तु ईरान में वह शुद्ध रूप से अस्तित्व में रहा, जिस से ज़रौसुस्त्र धर्म का उद्भव हुआ।[152](Rudolf Otto, The Kindom of God and the Son of Man, trans.by F. V. Filson and B.L. Woolf, London: Lutterworth Press, 1938, p-20, cited in Asura in RV, P-8) एमिले  बेंवेनिस्ते(Emile Benveniste) भी इंडो-इरानियन संस्कृति को असुर-पूजक मानने वालों में है। अहुर मज़्दा को असुर परिवार का सदस्य मानती है।[153](Benveniste and Renous, Vritra et varangna, p-46, Asura in RV,p-10) स्टें कोनो (Sten Konow) का मत है कि प्रारंभ में देवों और असुरों के बीच में विरोध था। उसके अध्यन के अनुसार प्राचीन समय में वैदिक आर्यों ने देवताओं के लिए देव और असुर, दोनों शब्दों का प्रयोग किया है।  उसने देवों और असुरों के संबंधों को अन्वेषित करते हुए विभिन्न तरह से देवों और असुरों के विकास को प्रस्तुत किया और बताया कि किस प्रकार से असुर के स्वरुप का विकास दैत्य के रूप में हुआ [154](Sten Konow, cited in Asura in RV, p-11)

रजवाड़े(Rajwade, V. K.) के अनुसार असुर का अर्थ बलवान या शक्तिशाली है और यह एक आम (generic) शब्द की तरह प्रयुक्त हुआ है। वह संस्कृत शब्द महष की तुलना अवेस्ता में आये मज्दा से करते हुए स्पष्ट करते है कि वैदिक आर्यों का मूल निवास निश्चित रूप से भारत नहीं था। असुर, पणि और दस्यु जैसे शब्द भारतीय मूल के शब्द भी नहीं है।[155](Rajwade, V. K, ‘Asyrasya Maya in Rgveda,’ in proceeding and translation of the First Conference, poona, Bhandarkar Oriental Research Institute, 1920, p-10, cited in Asura in RV, P-9-12) वेंकटकृष्णा राव (U. Venkatakrishna Rao) के अनुसार पूर्व-काल में असुर पूजे जाते थे। उसके अनुसार अहुर मज़्दा और संस्कृत का असुरोमहा में साम्यता है एवं अमरकोश में पूर्व-देवों की सूचि में असुर उसका पर्याय-वाची शब्द है।[156](U. Venkatakrishna Rao, The Romance of Words, The Arya Path 14, 1943, p-204-205, cited in Asura in RV, pp-13)

दांडेकर (R. N. Dandekar) का मत है की असुर शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है जो रहस्यमय सर्वोच्च शक्तियों से संपन्न थे। असुर शब्द की निष्पति असु+र से हुई है। जिसका भाषाई अर्थ हुआ, वह व्यक्ति जो असु संपन्न हो और असु शब्द जीवन-शक्ति को बताता है। असुरों की विशेष शक्ति ही माया कहलाती थी। वैदिक धर्म में इंद्र और असुर के बीच दुश्मनी असुर और असीरियन नामों के संदेह से लोक-कथाओं में बढ़-चढ़ गयी।[157](R.N.Dandekar, asura varuna, annals of Bhandarkar Oriental Research Institute 21, 1941, p-179, 180 etc, Asura in RV, P-13-14) जेम्स दर्मेसतेटर(James Darmesteter) का सुझाव है कि इंडो-ईरानियन भाषा में देव(god) के लिए तीन शब्द है- असुर, याग्ता और देव, इस में असुर सर्वोच्च देव है। याग्ता वह देव है जिसे बलि दी जाए और देवता का अर्थ अभाषित(shining)। देव शब्द ही बिगड़ कर दैत्य बना। भंडारकर एवं राजा(R.G. Bhandarkar and K.R.V. Raja) कई विद्वानों ने असुर शब्द को सेमेटिक भाषा के अस्सुर से सम्बंधित माना है। के. आर. वी. राजा[158](K.R.V.Raja, Asura Maya, Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland, January, 1917, pp-131-132, Asura in RV,P-15) ने पहली बार सं 1908 में सुझाव दिया कि भारतीय-आर्यों ने असुर शब्द असीरिया से ग्रहण किया है। सं 1918 में आर. वी. भंडारकर[159](R.G. Bhandarkar, The Aryan in the Land of Asuras, The Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society 25, 1918, p-76)   ने उसी परिप्रेक्ष्य में सिद्ध किया कि ऋग्वेद का असुर शब्द ईश्वर (देव) का द्योतक है, लेकिन कुछ अपवादों में कभी-कभी देव का विरोधी और मनुष्यों का शत्रु रूप में भी प्रयुक्त हुआ है। पतंजलि महाभाष्य में असुरों को गैर-ब्राह्मण दिखाया गया है।(77), शतपथ ब्राह्मण में असुरों की भाषा को वैदिक आर्यों की भाषा से अन्य बताया गया है।(78) एशिया माइनर में मिली एक किताब में 5 वैदिक देवों को मित्राणि कहा गया है। अगर ये वो ही लोग है, जो बाद में भारत में प्रविष्ट हुए तो स्पष्ट है कि वेद-पूर्व असीरिया से सम्बन्ध होना उजागर होता है। बाद में जब ये भारत में आये तो यहाँ के मूल-निवासी जातियों से तीव्र प्रतिरोध हुआ। जिस तरह का प्रतिरोध असीरियन से हुआ था, वैसा ही यहाँ भी हुआ, अतः उसे उन्होंने अपनी स्मृति और परम्परा के अनुरूप  अपने छंदों  में संकलित व सुरक्षित किया। असुर शब्द पूर्व में देव के लिए प्रयुक्त रहा व बाद में घुमक्कड़ आर्यों के खूंखार मानव-दुश्मनों के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा और बाद में पुरा-कथाओं(mythology) में देवतों के सूक्ष्म दुशमनों के रूप में प्रयुक्त होने लगा।(100)

 बनर्जी और शास्त्री (A. Banerji-Sastri) के मत में असुर शब्द की उत्पति असीरियन से ही हुई है। पतंजलि और शतपथ ब्राह्मण के आधार पर। उनके अनुसार असीरियन ने समुद्र के रस्ते इंदुस नदी की ओर आये। भविष्य पुराण के वर्णन के अनुसार असुर नमक के समुन्द्र से आये। इन असुरों को ऋग्वेद में काले वर्ण का वर्णित किया गया है। समुन्द्र असुर तत्व है और हम पते है कि वरुण जो की मित्र के साथ है, उसे नाविकों का दोस्त कहा गया है। भारत में सबसे पहले बसने वाले दास है और फिर असुर और बाद में आर्य आ बसे।(A. Banerji-Sastri, Asura expansion by sea: The Journal of the Bihar and Orissa Research Society 12, 1926, pp-336,246, etc., cited in Asura in RV,P-17)

एस. सी. राय(S.C.Roy) (Rai Bahadur S.C. Roy, The Asuras: Ancient and Modern, The Journal of the Bihar and Orissa Research Society 12, 1926, p-147. Asura in RV, P-20)  ने यह मत प्रकट किया कि असुर व्यक्तियों का समूह था, जो भारत के निवासी थे। उन्हें कभी-कभी अतिमानव शत्रु के रूप में वर्णन मिलता है, परन्तु वे मनुष्य थे। उसी प्रकार से दैत्य और दानव भी इन्ही जातीय लोगों के लिए प्रयुक्त किये गए शब्द है। मुंडा आज भी असुर कहे जाते है। संभवतः वे उन्ही असुरों के वंशज हो।

जीन प्रज्जय्लुकी(Jean Przylusky) असुर को द्रोही मनुष्य मानता है एवं असुर शब्द को अक्कादियन अस्सुर से निकला मानता है।( Jean Przylusky, Deva et asura, Rocznik Orientalistyczny 8, 1931-2, p-26, cited in Asura in RV, P-21)

वेद मन्त्रों  में असुर-
ऋग्वेद में अग्नि के सम्बन्ध में आये मन्त्र में असुर शब्द में अग्नि को असुर कहा गया है। (ऋग-3.3.4, 4.2.5, 5.12.1, 5.15.1, 7.2.3, 7.6.1, 7.30.3, सावित्री के सन्दर्भ में- 4.53.1, 5.49.2,  वरुण के सन्दर्भ में- 2.27.10, 2.28.7, मित्रवरुण- 7.36.2, रूद्र के सन्दर्भ में- 5.42.2, 2.1.6, 5.41.3, ध्योस के सन्दर्भ में- 3.53.7,)

असुर मनुष्य के लिए प्रयुक्त  है- ऋग-2.30.4, 7.99.5, 5.27.1, 7.56.24,

 6 बार अग्नि के लिए(ऋग्वेद 3.3.4, 4.2.5, 5.12.1, 5.15.1), दो बार सावित्री के लिए(ऋग्वेद 4.53.1, 5.49.2), दो बार वरुण के लिए(ऋग्वेद 2.27.10, 2.28.7), दो बार मित्रवरुण के लिए(ऋग्वेद 7.36.2, 7.65.2),  रूद्र के लिए(ऋग्वेद 2.1.6, 5.42.11, 5.41.3), ध्योस के लिए(ऋग्वेद 3.53.7), आर्यमन के लिए(5.42.1), पूसन के लिए(ऋग्वेद 5.51.11), प्रजन्य के लिए(ऋग्वेद 5.83.6),  मनुष्य के लिए असुर शब्द का प्रयोग चार मन्त्रों में हुआ है, जिस में दो मन्त्रों(ऋग्वेद 5.27.1 7.56.24) में वह ऋषि का मित्र है और दो मन्त्रों(ऋग्वेद 2.30.4 7.99.5) में शत्रु है।

वेदमंत्रो में असुर के कई गुणों का निदर्शन भी होता है। उन्हें संतति की वृद्धि या रक्षा करने वाला कहा गया है(ऋग्वेद 7.65.2), उन्हें व्यक्तियों के लिए(ऋग्वेद 7.56.24), बुद्धिमान(ऋग्वेद 3.3.4), स्वर्ग का(ऋग्वेद 2.1.6, 5.41.3),  प्रजन्य को असुर का पिता बताया गया(5.83.6), असुरो की माया का उल्लेख है(ऋग्वेद 5.63.3, 5.63.7), असुरों के नायक की बात कही गयी है(ऋग्वेद 2.30.4, 3.53.7, 3.56.8, 7.99.5), असुर और देव को एक समान बताया गया है(ऋग्वेद 5.42.11),  इन से यह स्पष्ट है कि असुर मनुष्यों का एक समूह था, या कि समूह का नेता था।

ऋग्वेद में 27 जगह आये हुए असुर शब्दों में ‘असुर्याम’ संज्ञा के रूप में 12 बार आया है, जिन में 3 बार मित्रवरुण के सम्बन्ध में, 3 बार इंद्र के सम्बन्ध में, 2 बार अग्नि और एक-एक बार वरुण, रूद्र, सोमरूद्र और आदित्य के लिए है। विशेषण ‘‘असुर्या’ के रूप में तीन या चार बार इंद्र के प्रसंग में एक बार ब्रहस्पति,अपाम, नपात और सरस्वती के प्रसंग में है। आसुर शब्द एक बार अग्नि और वरुण के सम्बन्ध में और दो बार स्वर्भानु के लिए। असुरहन शब्द एक बार इंद्र के सम्बन्ध में और एक बार अग्नि के सम्बन्ध में प्रयुक्त है। असुरत्व शब्द एक बार देवो के लिए।

 अस्सुरा इन early ऋग्वेद के अनुसार ‘ This indicate that one was not an Asura from birth or by his nature, but was an asura by the consent and support of those who followed him.’ Asura in Rv m Pp66-77)

ऋगवेद 10.11.6 में अग्नि के सन्दर्भ में असुर शब्द का प्रयोग एक वचन में हुआ है। साथ ही ऋग्वेद 8.19.23 में अग्नि को असुर नहीं कहा गया है, लेकिन यह कहा गया है कि वह वस्त्राभूषणों से सज्जित असुर की तरह प्रदर्शित होती है। इस से असुरों का पहनावा स्पष्ट होता है। इस से यह भी पता लगता है कि असुर बड़े धनवान थे, जो वस्त्राभूषणों से सुसज्जित रहते थे। ऋग्वेद 10.74.2 में भी एकवचन में प्रयुक्त है।

वरुण के साथ असुर का प्रयोग ऋग्वेद 1.24.14 में हुआ है। जिस में उसे(असुर को) राज करने वाला बुद्धिमान राजा कहा गया है।                                                 



संदर्भ

[1] एलेग्जेंडर कन्निंघम- आर्क. सर्वे ऑफ़ इंडिया, फोर रिपोर्ट्स-1862-63-64-65,वोल्युमे-2, गवर्नमेंट सेंट्रल प्रेस, शिमला, 1871, पृष्ठ-11-17 व अन्य)

[2]राय बहादुर मुंशी हरदयालसिंह- रिपोर्ट- मर्दुम शुमारी राजमारवाड़ 1891,Marwar Census Report-1891, पृष्ठ-527

[3] एन्थोवें, आर.ई- द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ बॉम्बे, वोलू.3, कोस्मो पब्लिकेशन, 1922/1987, पृष्ठ: 43-52

[4] डेंजिल इब्बेतसन- पंजाब कास्ट्स, फुटनोट, 1883/ 1916, गवर्नमेंट प्रिंटिंग, लाहौर, पृष्ठ-334,

[5] निरुक्त,1.10

[6] दांडेकर, एनल्स ऑफ़ भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट (ऐ. भ. ओ. रि. इ.)- 31.पृष्ठ-41

[7] कोसाम्बी, जर्नल ऑफ़ द बॉम्बे ब्रांच ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी(ज.बां.ब्रा.रा.ए.सो.)- 26, पृष्ठ-26, पृष्ठ-31. ‘It would make better sense to regard Asuras as human, if not Assyrian.’

[8] Elwin, verrier: Myths Of Middle India, Oxford University Press, London, Publication date 1949, pages- 61-62, 78-80, 88-90, 99-100......

[9] Naik, T. B :  Bhils a study,  Bharatiya Adimjati Sevak Sangh, Kingsway, Delhi.Publication date 1956, पेज 181.

[10] Elwin, verrier: Middle India, Oxford University Press, London, Publication date 1949, pages- 100-101

[11] निरुक्त,2.10

[12] Dandekar, R.N.- Vrtraha Indra, Annals of Bhandarkar Oriental Research Institute, Vol. 31, Poona, pp-1to55, * p-2-3*

[13] Dandekar, R.N.- Vrtraha Indra, Annals of Bhandarkar Oriental Research Institute, Vol. 31, Poona, pp-1to55, * p-2-3*

[14] निरुक्त,1.10

[15] ऋग्वेद 8.15.3, अन्य दृष्टव्य, ऋग.10.89.18, 8.85.18, 8.15.3

[16] life in ancient India, page-118 

[17] life in ancient India, pp-118

[18] life in ancient India, Pp-119

[19] दांडेकर द्वारा जर्नल ऑफ़ पूना यूनिवर्सिटी (ज. पू. यू.) 21, पृष्ठ-४६-47 पर उद्धृत

[20] ऋग्वेद 8.78.6, 8.17.9,

[21] ऋग्वेद 8.17.9

[22] ऋगवेद-5.32.4, 10.22.4

[23] ऋग-7.20.4, 7.56.10

[24] ऋग-1.51.6, 2.11.20

[25] ऋग-1.103.2, 2.12.12

[26] ऋग-1.101.2; 103

[27] ऋग-2.14.4

[28] ऋग-2.14.5; 20.5

[29] ऋग- 2.17.6; 22.2

[30] ऋग-2.12.2, 4.47.21, 7.18.20

[31] ऋग-1.101.2, 2.14.5, 6.16.13

[32] ऋग-2.14.5, 5.30.7-8, 6.20.6

[33] ऋग- 7.28.6

[34] ऋग-2.14.6

[35] ऋग-1.33.12

[36] ऋग-2.14.5

[37] ऋग-2.14.3

[38] निरुक्त, 2-16

[39] ऋग्वेद 1.32.9, 3.30.8

[40] बुद्ध प्रकाश, दी क्वाटर्ली रिव्यूज ऑफ़ हिस्टोरिकल स्टडीज, पृष्ठ-149) ( ऋग..इंद्र,139

[41] रामनाथ अवस्थी

[42] बुद्ध प्रकाश, एनल्स ऑफ़ भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट (ऐ. भ. ओ. रि. इ.)- 30, पृष्ठ-163

[43] यथा ऋग्वेद 1.121.11 में वराह, 8.85.7 में अहि, तथा 5.32.3 में वन्य पशु

[44] पेरी, :जर्नल ऑफ़ द अमेरिकल ओरिएण्टल सोसाइटी ( ज. अ. ओ. सो.)- 11, पृष्ठ-13 ‘these different names for Vrtra...are different names for one and the same thing: namely the cloud.’

[45] हापकिंस, जर्नल ऑफ़ द एशियाटिक ओरिएण्टल सोसाइटी (ज. ए. ओ. सो.)- 26, पृष्ठ-254

[46] मैगन, (स्टडीज इन ओनर ऑफ़ मौरिस ब्लूमफील्ड  (स्ट. ओ. ब्लू.), पृष्ठ-204-205... ‘When the Indo-Iranians were longing for rain, a stationary crest would call forth the first term. At other times, a black and lowering one that darkened the air would suggest the second.’

[47] म्योर, ओ. सं. टे. 5, पृष्ठ-95

[48] लुडविग, 3, 337 *दांडेकर द्वारा ऐ. भ. ओ. रि. इ. 31, पृष्ठ-4 पर निर्देशित*) ऋग्वेद में इंद्र पृष्ठ-140.

[49] करमाकर, न्यू इंडियन एन्टीक्वेरी (न्यू. इ. ऐ.), 5, पृष्ठ-184-189

[50] पेरी, ज. अ. ओ. सो, 11, पृष्ठ-135—‘....Vrtra, first Hindrance, defence*zd Verethra*; that which is to be hindered, warded off, concrete enemy...’

[51] चट्टोपाध्याय,(आल इंडिया ओरिएण्टल कांफ्रेंस- प्रोसेदिंग्स ऑफ़ आल इंडिया ओरिएण्टल कांफ्रेंस) आ. इ. ओ. कां. 4, पृष्ठ-529

[52] चट्टोपाध्याय, आ. इ. ओ. कां. 4, पृष्ठ-529

[53] ऋग्वेद 6.22.10/60-6, 8.83.1

[54] मैकडोनल: वैदिक माइथोलॉजी (वै. मा.), पृष्ठ- 64

[55] दांडेकर, ऐ. भ. ओ. रि. इ. 31, पृष्ठ-33—‘the historical human Vrtras were collectively transformed into the ‘demon’ who prominently opposed Indra.....’

[56] Dandekar, Vrtraha-Indra, page-6-7

[57] ऋग-1.52.8

[58] ऋग्वेद 1.32.11

[59] प्रथमजामहिनाम, ऋग्वेद 1.32.3-4

[60] ऋग.1.51.5, 1.14.6/19.6, 8.17.14 आदि

[61] ऋग-10.74.6

[62] ऋग-3.4.1

[63] ऋग्वेद 9.88.4

[64] ऋग-7.27.3, 8.1.14, 10.42.8, 7.28.5, 6.44.4, 7.28.5, 1.52.11, 1.65.9, 5.34.3, 8.3.11, 1.32.3, 4.17.7, 1.33.12 आदि

[65] ऋग-5.140

[66] Dandekar, Vrtraha Indra, footnote at p-6

[67] Dandekar, Vrtraha Indra, footnote at p-13

[68]

[69] ऋग.1.53.7

[70] ऋग.1.52.2

[71] ऋग.1.32.11

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