Thursday, December 18, 2014

107. मेघों के आंदोलन

Tararam Gautam
13 December at 22:45 · Edited

मैं मेघों के संघर्ष और स्वाभिमान आन्दोलन को कई नजरियों से देखता हूँ और जानने की कोशिश भी करता हूँ। विगत इतिहास के कुछ अनछुए पहलुओं पर भी एक नजर डालने का दुसाहस भी करता हूँ यह जानते हुए कि इससे मुझे कोई व्यक्तिगत लाभ या प्रेय या श्रेय भी नहीं मिलने का सिवाय आलोचना के। फिर भी पड़ताल करने की अपनी जिज्ञाषा के अधीन कुछ न कुछ कुरेदता रहता हूँ।
समग्र भारत में मेघों का आन्दोलन विगत में कैसा रहा, इसकी अत्यल्प जानकारी है। परन्तु जो कुछ है उसके आधार पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेघों के आन्दोलन को राज नैतिक लोगों ने बड़ी होशियारी से भाई-बिरादरी बन कर के तोडा या तहस नहस किया। उस समय उनके पास ज्ञान के या सूचना के इतने साधन नहीं थे कि वे इन भ्रमित करने वालों को पहचान सके और अपना भविष्य सुरक्षित कर सके- कई कारणों के साथ जातिवादी-सामंती समाज की मजबूत बेड़िया इसमे प्रमुख थी। उनकी सोच उस समाज की व्यूह रचना से बाहर की हो ही नहीं सकती थी।
जब बेगारी प्रथा के विरोध में देश व्यापी आन्दोलन चला, जब गंदे धंधे छोड़ने का देश व्यापी आन्दोलन चला और जब पृथक निर्वाचन हेतु आन्दोलन चला तो इन तीनों पर यह समाज बंटा हुआ था। ज्यादातर लोग बेगारी के विरुद्ध संघर्ष रत हुए। कई लोग गंदे धंधे छोड़ने के आन्दोलन से जुड़े और कुछ लोगों ने पृथक निर्वाचन की आवाज उठाई। ये तीनों तरह के आन्दोलन मेघो में आजादी से पहले अपनी पैठ बना चुके थे। कई लोग आगे आये। कुछ लोग डटे रहे बाकि लोग छद्म जाल में फंस गए। इन में से ही कई गंदे धंधो को करने की वकालत करते हुए राजनैतिक पार्टियों के चहेते बने और विधायक या सांसद बने। इन में से ही कई लोग बेगारी को रोजगार से जोड़ कर महिमा मंडित करने लगे और विधायक और सांसद बने। इन में से ही कई लोग पृथक निर्वाचन के विरोध में उतरे और अपनी राजनैतिक रोटियां सेकी। यह बात जो कही जा रही है उसे आप अपने आस पास के लोगों के विगत काल को टटोल कर जान सकते हो। 1932 से 1950 या 1952 और उसके बाद 1952 से 2000 तक के जो आपके समाज के विधायक या सांसद रहे है, उनके कोई लिखित दस्तावेज, व्यक्तव्य या अखबारों में छपी खबरे हो तो उसको अनुसंधेय करके आप इस बात की सच्चाई का पता लगा सकते हो। समाज के इस विगत को जाने वगैर आप राज नैतिक सूझ बुझ पैदा नहीं कर सकते। उनमे उर्जा एवं जोश जरुर था। साहस और स्वाभिमान भी था पर वह सब या तो संस्कृतिकरण की शरणगाह था या अभिशिप्त राज नैतिक पिच्छ्लगुपन। आज भी वह कमो वेश वर्त्तमान है। इसलिए ये समाज सामूहिक मुक्ति में असमर्थ रहा।-----
--आजादी से पहले मारवाड़ के अछूत वर्ग में जबरदस्त जाग्रति थी। उसे किसी भी स्तर पर न तो नकारा जा सकता है और न कमतर करके आँका जा सकता है। सामाजिक क्षेत्र और राजनैतिक क्षेत्र- दोनों ही क्षेत्रों में इसका नेतृत्व मेघवालों के आगीवान समाज सुधारको और साधु-संतो के हाथों में था। यह protest movement पुरे प्रदेश में अपनी गहरी उपसथिति दर्ज करा चूका था। डॉ आंबेडकर के आन्दोलन की हवा ने ही उनमें उर्जा का संचार किया था। मेघवालों के नेतृत्व में अछूत वर्ग हिन्दुओं के शोषण के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ था। वह समाज पूरी तरह से बागी हो गया। उसने अपने को डॉ आंबेडकर की शिक्षाओ का अनुगामी बनाया। मरे जानवरों को उठाना, मरे जानवरों का मांस खाना, सवर्णों के घर की रोटियां खाना, जानवरों की खाल उतारना, भेंट-बेगार नहीं करना, चिट्ठी-पत्री नहीं पहुँचाना, सवर्णों की मवेशी और बहिन-बेटी को आणे-टाणे में नहीं लाना-लेजाना आदि उनके प्रतिकार या विरोध के मुख्य मुद्दे थे। उनका यह इतिहास लिखा नहीं गया। हजारों कठिनाईयों के बावजूद भी उन्होंने इन कार्यो का बहिस्कार या प्रतिकार किया। मेघवालों के स्वाव्लाम्बन और संगठन को लेकर बाकी सवर्णी समाज सकपका गया था। इसके कई अच्छे और बुरे परिणाम हुए। कई तरह के राजनैतिक और सामाजिक हथकंडें अजमाए गए। अकालों की भयंकर विपदाओं में उनके पास खाने को भोजन और तन ढकने को वस्त्र तक नही थे। सिर ढकने को छत नहीं तो अनाज पैदा करने को जमीन का टुकड़ा तक नही था। वे इस विरोध आन्दोलन से होने वाली आर्थिक हानि से व्आकिफ थे।
उन्होंने अपने समाज में होने वाले ओसर- मोसर और अन्य खर्चों पर प्रतिबन्ध लगाकर इसकी भरपाई करने की कोसिस की। भेंट-बेगारी, फडके और त्योहारी की जगह मेहनत और मजदूरी पर जोर दिया। लेकिन कुछ लोग और कुछ जातियां इससे दूर रहे। धीरे-धीरे इस पर कांग्रेसी वर्चस्व हावी हो गया और वह आन्दोलन इतिहास की खाई में दफ़न हो गया।
लोग वापस ओसर-मोसर और दिखावे में आ गए। इनके धर्म की नब्ज को पकड़कर प्रतिक्रियावाद हावी हो गया। उनका उत्थान बंद होकर आपसी खिचाव में आ गया, जिसे मारवाड़ में "खुली-बंदी" के नाम से जाना गया। इन बातों को लेकर इनके अगुओं को और इस समाज को सताने के लिए और आपसी विघटन करने के लिए दुष्ट प्रयास हुए। खुद को ऊँचा और सभ्य समझने वाले जड़ बुद्धि लोगों ने जान-बूझ कर उन्हें पीड़ा पहुचाई। कुछ विभीषण और हनुमान जैसे स्वामिभक्तों ने इस समाज की एकता को तहस-नहस किया। नाम और काम की भूख कांग्रेस की ही देन है।
आज जो स्थिति है वह इन परिस्थितियों की उपज है। उस समय की हिन्दू वादी राजनैतिक पार्टियों और धार्मिक पुनरुत्थान वादी संगठनों ने मेघों को धर्म और राजनीती के नाम पर पूरी तरह से भ्रमित किया। भ्रमित करने वाली जमात में मेघों में से ही ऐसे साधू-संतों को इन राज नैतिक पार्टियों ने वृहदहस्त प्रदान किया। जो बुजुर्ग या जवान समाज की हेय दशा को लेकर चिंतित थे व कार्य शील थे। उन्हें गंदे धंधों से होने वाले मुनाफे और बेगारी से मिलाने वाले रोजगार और सम्मान आदि को धार्मिक कथा-किंवदंतियों से महिमा मंडित करते हुए सह मत किया और मेघों के विरुद्ध ही मेघों को खड़ा कर दिया। वे लोग जो बेगारी, छुआ छूत और पृथक मताधिकार या प्रतिनिधितित्व के लिए संघर्ष रत थे। अलग थलग पड़ते गए और धीरे धीरे वह आन्दोलन मृत हो गया। राज नीति में बेगार करने वाले, गंदे धंधों को महिमा मंडित करने वाले और प्रतिनिधित्व की जगह पैरोकारी करने वाले मेघो का वजूद बढ़ने लगा। वे राज सत्ता और राजनैतिक पार्टियों के संगठन में भी पदासीन हुए पर उनकी सोच में वह दृष्टिकोण नहीं था अतः वे कोई कारगर कार्य नहीं कर पाए।
अगर उस समय जब बेगारी पृथा के विरुद्ध हमारा आंदोलन था,जब गंदे धंधे छोड़ने का आंदोलन था, जब पृथक निर्वाचन के लिए हम झगड़ रहे थे । ये लोग साथ होते तो आज ये स्थितियां नहीं होती। इन लोगों ने या जिस पृष्ठ भूमि से ये आते है उसने हेय धंधों को महिमा मंडित किया। बेगारी को अच्छा बताया और पृथक निर्वाचन की खिलाफत की। जो इनके चंगुल में रहे भलेई वो आर्थिक रूप से संपन्न हो गए पर आपके समाज को प्रगति से बहुत पीछे धकेल दिया। जिसका खामियाजा आज की पीढ़ी भुगत रही है । इसलिए इन बातों को रहंने दीजिये। नयी पीढ़ी को उनके विचारों का गुलाम मत बनाइये और नायक पूजा की ओर मत मोड़िये। आज पढ़ा लिखा वर्ग नयी सोच के साथ आगे आ रहा है। उसे क्षुद्र राजनिति की घेरा बंधी में मत बंधने दीजिये।
हमारे यहाँ एक लोकोक्ति है-
"जिण री धन धरती, कबुहु ना राखिये संग ।
जे राखिये संग तो, 'र राखिये अपंग ।।"
इस पर गहराई से विचार करे। स्वतः समझ में आ जायेगा। जिसकी धन और धरती है, उन्हें कभी साथ मत रखिये। अगर रखना ही है तो उन्हें अपंग बनाकर रखिये।----
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Rattan Gottra, Raj Bose, Ajay Bhagat and 3 others like this.
Tararam Gautam ऐसे लोग निः संदेह मेरी घृणा के पात्र है, भलेई वो किसी भी सर्वोच्च स्तर पर आसीन हो। वह इस लिए कि मैं उस जमात से आता हूँ जिसने बेगारी का पुर जोर विरोध किया, जिसने गंदे धंधों को छोड़ने का आन्दोलन चलाया और पृथक निर्वाचन के लिए रंजिसे पाल ली। जो संस्कृतिकरण लिए हुए छद्म धार्मिक आडम्बरो से दूर रहे। जो यही मानकर चलते रहे की भीड़ की बजाय दो आदमी ही भले जो इरादों के पक्के या मजबूत हो। आज नहीं तो कल, विजय हमारी ही होगी---.
13 December at 23:04 · Like · 2
Tararam Gautam अगर उस समय जब बेगारी पृथा के विरुद्ध हमारा आंदोलन था,जब गंदे धंधे छोड़ने का आंदोलन था, जब पृथक निर्वाचन के लिए हम झगड़ रहे थे । ये लोग साथ होते तो आज ये स्थितियां नहीं होती। इन लोगों ने या जिस पृष्ठ भूमि से ये आते है उसने हेय धंधों को महिमा मंडित किया। बेगारी को अच्छा बताया और पृथक निर्वाचन की खिलाफत की। जो इनके चंगुल में रहे भलेई वो आर्थिक रूप से संपन्न हो गए पर आपके समाज को प्रगति से बहुत पीछे धकेल दिया। जिसका खामियाजा आज की पीढ़ी भुगत रही है । इसलिए इन बातों को रहंने दीजिये। नयी पीढ़ी को उनके विचारों का गुलाम मत बनाइये और नायक पूजा की ओर मत मोड़िये। आज पढ़ा लिखा वर्ग नयी सोच के साथ आगे आ रहा है। उसे क्षुद्र राजनिति की घेरा बंधी में मत बंधने दीजिये।
13 December at 23:23 · Like · 2
Bharat Bhushan Tararam Gautam जी, हमारी पिछली पीढ़ी और हमारी अपनी आधी पीढ़ी मनुस्मृति को धार्मिक ग्रंथ मानती रही. रोजगार और व्यक्ति की योग्यता को उसी के मानदंडों से नापती रही बिना जाने कि वह कोई धर्म नहीं था बल्कि संविधान था जो श्रमिक वर्ग को गुलाम और हमेशा के लिए सस्ता श्रम बनाए रखने का नियम और कानून था.
आपसे सहमत हूँ. हमारे यहाँ भी सामाजिक उत्थान के लिये आंदोलन हुए लेकिन वे अन्य द्वारा सामाजिक बहिष्कार और कुछ हमारे अपने ही लोगों के स्वार्थ की भेंट चढ़ गए.
यह सच है कि बहुत कुछ जो हमारे समाज में क्रांतिकारी था वह हिंदू मेन स्ट्रीम संस्कृति के चिकने धरातल पर फिसल कर फिर उसी गढ्ढे में गिरा. आगे चल कर इससे हुई लाभ-हानि का मूल्यांकन होगा.
आरएसएस की वर्तनाम सरकार और उनकी गतिविधियों से लगता है कि केवल मेघ ही नहीं बल्कि सभी एससी-एसटी के स्वार्थी नेता तत्त्व उस जाल में आ गए हैं. ब्राह्मणों का यह संघ जिस संस्कृति की बात करता है उसका इन एससी-एसटी की सभ्यता से कुछ लेना-देना नहीं है.
अधिक नहीं कहना चाहता. हिंसक कौमें उन कौमों को कभी पूरी तरह समाप्त नहीं करतीं न ही उन्हें बग़लगीर होने देती हैं जो हिंसा का उत्तर प्रतिहिंसा से देना भूल जाती हैं. ऐसी कौमों को घर के बाहर बिठाए रख कर अपनी जीत का इतिहास जीवित रखा जाता है. आज की परिस्थितियों में आप ''प्रतिहिंसा'' शब्द की जगह ''सशक्त सामूहिक प्रतिरोध'' शब्द रख सकते हैं.
Rattan Gottra, K K Singh Genwa, Satish Bhagat, Er Mohinder Mamualiya, Annie Bhagat Damathia, Shaku Meghwal, Pritam Bhagat, Meenu Samotra, Ajay Bhagat,
14 December at 08:47 · Like · 2
Rattan Gottra The fact is that Megh society due to deep ignorance that they have been Sanskritised, has till now made worthies that actually are not. And these worthies themselves lacked true education, remained self-seeking 'True Bhaktas' of those who Sanskritised them. If recently, there are some well educated wise gems, they have been engaged by the government in top civil services & their hands are either bound in the code of conduct, or they lack time due to their business in respective professions or the personal problems faced by them. These circumstances compel us to wait for upcoming newly educated generation of individuals to emerge on the scene. Meanwhile, we the old or seniors should continue to spread awareness.
14 December at 10:18 · Unlike · 3
Tararam Gautam --आजादी से पहले मारवाड़ के अछूत वर्ग में जबरदस्त जाग्रति थी। उसे किसी भी स्तर पर न तो नकारा जा सकता है और न कमतर करके आँका जा सकता है। सामाजिक क्षेत्र और राजनैतिक क्षेत्र- दोनों ही क्षेत्रों में इसका नेतृत्व मेघवालों के आगीवान समाज सुधारको और साधु-संतो के हाथों में था। यह protest movement पुरे प्रदेश में अपनी गहरी उपसथिति दर्ज करा चूका था। डॉ आंबेडकर के आन्दोलन की हवा ने ही उनमें उर्जा का संचार किया था। मेघवालों के नेतृत्व में अछूत वर्ग हिन्दुओं के शोषण के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ था। वह समाज पूरी तरह से बागी हो गया। उसने अपने को डॉ आंबेडकर की शिक्षाओ का अनुगामी बनाया। मरे जानवरों को उठाना, मरे जानवरों का मांस खाना, सवर्णों के घर की रोटियां खाना, जानवरों की खाल उतारना, भेंट-बेगार नहीं करना, चिट्ठी-पत्री नहीं पहुँचाना, सवर्णों की मवेशी और बहिन-बेटी को आणे-टाणे में नहीं लाना-लेजाना आदि उनके प्रतिकार या विरोध के मुख्य मुद्दे थे। उनका यह इतिहास लिखा नहीं गया। हजारों कठिनाईयों के बावजूद भी उन्होंने इन कार्यो का बहिस्कार या प्रतिकार किया। मेघवालों के स्वाव्लाम्बन और संगठन को लेकर बाकी सवर्णी समाज सकपका गया था। इसके कई अच्छे और बुरे परिणाम हुए। कई तरह के राजनैतिक और सामाजिक हथकंडें अजमाए गए। अकालों की भयंकर विपदाओं में उनके पास खाने को भोजन और तन ढकने को वस्त्र तक नही थे। सिर ढकने को छत नहीं तो अनाज पैदा करने को जमीन का टुकड़ा तक नही था। वे इस विरोध आन्दोलन से होने वाली आर्थिक हानि से व्आकिफ थे।
उन्होंने अपने समाज में होने वाले ओसर- मोसर और अन्य खर्चों पर प्रतिबन्ध लगाकर इसकी भरपाई करने की कोसिस की। भेंट-बेगारी, फडके और त्योहारी की जगह मेहनत और मजदूरी पर जोर दिया। लेकिन कुछ लोग और कुछ जातियां इससे दूर रहे। धीरे-धीरे इस पर कांग्रेसी वर्चस्व हावी हो गया और वह आन्दोलन इतिहास की खाई में दफ़न हो गया।
लोग वापस ओसर-मोसर और दिखावे में आ गए। इनके धर्म की नब्ज को पकड़कर प्रतिक्रियावाद हावी हो गया। उनका उत्थान बंद होकर आपसी खिचाव में आ गया, जिसे मारवाड़ में "खुली-बंदी" के नाम से जाना गया। इन बातों को लेकर इनके अगुओं को और इस समाज को सताने के लिए और आपसी विघटन करने के लिए दुष्ट प्रयास हुए। खुद को ऊँचा और सभ्य समझने वाले जड़ बुद्धि लोगों ने जान-बूझ कर उन्हें पीड़ा पहुचाई। कुछ विभीषण और हनुमान जैसे स्वामिभक्तों ने इस समाज की एकता को तहस-नहस किया। नाम और काम की भूख कांग्रेस की ही देन है।
आज जो स्थिति है वह इन परिस्थितियों की उपज है। उस समय की हिन्दू वादी राजनैतिक पार्टियों और धार्मिक पुनरुत्थान वादी संगठनों ने मेघों को धर्म और राजनीती के नाम पर पूरी तरह से भ्रमित किया। भ्रमित करने वाली जमात में मेघों में से ही ऐसे साधू-संतों को इन राज नैतिक पार्टियों ने वृहदहस्त प्रदान किया। जो बुजुर्ग या जवान समाज की हेय दशा को लेकर चिंतित थे व कार्य शील थे। उन्हें गंदे धंधों से होने वाले मुनाफे और बेगारी से मिलाने वाले रोजगार और सम्मान आदि को धार्मिक कथा-किंवदंतियों से महिमा मंडित करते हुए सह मत किया और मेघों के विरुद्ध ही मेघों को खड़ा कर दिया। वे लोग जो बेगारी, छुआ छूत और पृथक मताधिकार या प्रतिनिधितित्व के लिए संघर्ष रत थे। अलग थलग पड़ते गए और धीरे धीरे वह आन्दोलन मृत हो गया। राज नीति में बेगार करने वाले, गंदे धंधों को महिमा मंडित करने वाले और प्रतिनिधित्व की जगह पैरोकारी करने वाले मेघो का वजूद बढ़ने लगा। वे राज सत्ता और राजनैतिक पार्टियों के संगठन में भी पदासीन हुए पर उनकी सोच में वह दृष्टिकोण नहीं था अतः वे कोई कारगर कार्य नहीं कर पाए।
14 December at 11:51 · Edited · Unlike · 3
Ajay Bhagat मैं बहुत आभारी हु आप सबका और फेसबुक का जिसके कारन मुझे नयी नयी जानकारी और अपना सही इतिहास जानने को मिला। आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद
14 December at 10:50 · Unlike · 3
Bharat Bhushan Ashok Bhagat ji
14 December at 15:28 · Like
Tararam Gautam Bharat Bhushanhi हमारे यहाँ एक लोकोक्ति है-
"जिण री धन धरती, कबुहु ना राखिये संग ।
जे राखिये संग तो क'र राखिये अपंग ।।"
इस पर गहराई से विचार करे। स्वतः समझ में आ जायेगा। जिसकी धन और धरती है, उन्हें कभी साथ मत रखिये। अगर रखना ही है तो उन्हें अपंग बनाकर रखिये।----
14 December at 16:17 · Unlike · 1
Tararam Gautam This indicate root cause of slavery of Meghs. As I told they were ancient rulers of this land. After defeat they were paralyzed by the various penal codes like smritis and puranas. Knowing all these still they are searching shelter in these poisonous shastra is nothing but enslaving the coming generations, knowingly or unknownigly .
14 December at 16:42 · Like · 1
Rattan Gottra They are still mostly ignorant about all that because of the very strong dose of 'SANSKRITIZATION'. To neutralize the effect of that dose, a very strong dose of true education is required.
14 December at 16:51 · Like · 2
Tararam Gautam They do not know what is sanskritisation. And I also do not feel appropriate to use the word given by sriniwasan. It is not sanskritisation but purely brahmanization. The word sanskritisation was used very cleverly by s niwasan to defeat the core of caste struggles. And it was emphasized and popularized by a group of ruling intellectuals. When Jat demand for reservation, when Gurjar demand for reservation than it is immitation but not upward but backward, how it can be called sanskritization as conceptualized by s sriniwasan. If it is Sanskrit Dharma than why not be used a term Brahmanisation.?
14 December at 17:01 · Edited · Like · 1
Tararam Gautam It also include in its meanings that these lower castes are uncivilized and sanskritization is a process of civilization, which I openly reject. Because in my opinion lower caste have had their civilization far superior than those of Sanskrit Dharma ie Brahmanical religion. Their aticates and manners are more Democratic, pro social and more giving ground to rise a free society than those of so called close society based on brahmanical principalities.
14 December at 17:06 · Like · 1
Rattan Gottra What I mean by 'Sanskritization' is actually 'Brahmanization' contained in their Sanskrit books that are most dear to them, but are otherwise full of poison against the depressed classes.
14 December at 17:20 · Like · 2
Tararam Gautam अगर किसी के पास अपने इलाके के ऐसे आन्दोलनों की जानकारी हो तो कृपया यहाँ साझा करे। it will enrich your history and will give a lamp to new generation. Please do share.
14 December at 19:42 · Like · 2
Bharat Bhushan

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Saturday, November 22, 2014

106. मेघ: विश्व इतिहास को कैसे समझे

मेघ: विश्व इतिहास को कैसे समझे


मेघ लोग विश्व की कोई अलग जाति या समुदाय नहीं है बल्कि विश्व-इतिहास में घटित विभिन्न परिवर्तनों और प्रभावों से ही जुडा एक मानव समुदाय है। अतः उसका प्राचीन इतिहास भी इसी विश्व-इतिहास की परतों के अनुरूप और अनुशरण में ही ज्ञेय किया जाना चाहिए। जो लोग इसे अलौकिकता का जामा पहनाते है, वे सिर्फ और सिर्फ अंधकार को बने रहने देने का कार्य भर कर रहे है। अंधकार की परतों को हटाकर जब विश्व-इतिहास रचा जा सकता है तो आप लोग उस प्रकाश में अपना भी इतिहास खोज सकते हो, बस एक दृष्टि की जरुरत है। प्रकाश की वह किरण अगर आप प् लेते है तो उसके उजाले में बहुत कुछ साफ-साफ देख सकते हो। अतः इस संक्षिप आलेख में मनुष्य के प्राचीन इतिहास की जानकारी को अति संक्षेप में रखने का एक प्रयास किया है। इस आलेख की अपनी सीमाएं है फिर भी आप इससे एक दृष्टि पा सकते है। अतः तीन या चार कड़ियों में इसे यहाँ दिया जायेगा। आप इस पर अवश्य मंथन करेंगे- ऐसी मेरी अभिलाषा है।

मनुष्य जाति काआदि-इतिहास अंधकार में दबा पड़ा है, उसका एक सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि उस समय लिखने की कला का विकास नहीं हुआ था। और जब मनुष्य ने कुछ महारथ हासिल करके अपने को कुछ शक्ति-सम्पन्न बना दिया, तब भी उसके दिमाग में वह काबिलियत या उर्जा नहीं थी कि वह सत्य और झूठ को अलग-अलग कर सके। इस लिए सभी देशों के इतिहास दन्त-कथाओ के वर्णनों से परिपूर्ण मिलते है। इन में अपवाद को ढूंढ़ने का अवसर ही नहीं है। इन मिथकीय वर्णनों को आज साफगोई के साथ परखा जा सकता है, कारण यह है कि उन में समाहित या संलग्न कल्पनाओं और तथ्यों को अलग करने के आधार मनुष्य बुद्धि ने खोज निकाले है। उनसे यह अभीष्ट निकलता है कि सभी देशों या राष्ट्रों के प्राचीन इतिहास अपने देश या राष्ट्र की सुझावग्राह्यता से ग्रसित रहे है और यहाँ तक कि वे उससे आबद्ध, अतिरंजित और अनुप्रेरित होते रहे है. ये मानवीय बुद्धि की संभाव्यता के निदर्शन या प्रतिरूप कहे जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

बिना किसी लिखित दस्तावेजों के भी मनुष्य ने अपने प्राचीन इतिहास को जानने के लिए कईं उपागमों और तरीकों को अपनाया है। इन साधनों को अख्तियार करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका भु-गर्भ विज्ञान के विकास की रही है, उसे किसी भी स्तर पर नकारा नहीं जा सकता है. जिस इतिहास का अन्वेषण पहले धार्मिक ग्रंथों के आधार पर खोजा जाता था और माना जाता था कि सबसे पहले मनुष्य की उत्पति हुई , उसे भू-गर्भ विज्ञान ने स्पष्ट कर दिया कि पृथ्वी पर मनुष्य की उपस्थिति कई घटनाओं और जीवों के उत्पन्न होने के बहुत बाद में हुई है। यह उसके इतिहास को जानने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। यह अभिधेय हुआ कि मनुष्य की उत्पति बहुत प्राचीन है फिर भी छोटे-मोटे जीव-जन्तुओ की उत्पति मनुष्य की उत्पति से बहुत प्राचीनतर है और यह कि पृथ्वी के धरातल पर मनुष्य का अवतरण या विचरण तब तक नहीं हुआ था, जब तक कि पृथ्वी का धरातल विभिन्न परिवर्तनों के बाद उसके रहने योग्य नहीं हो गया। अगर देखा जाय तो मनुष्य का प्राचीन इतिहास जानने में इस साधन या उपागम ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दूसरा, जो मानव-जाति विज्ञानी या Enthnologist है, उनकी खोजों ने भी मानव इतिहास की कई परतों को खोलने और उसे सुस्पष्ट करने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। मानव-जाति विज्ञानी प्राचीन राष्ट्रों का इतिहास उनकी भौतिक या शारीरिक विशेषताओं, उनकी भाषाओं, शिष्टाचारों आदि के माध्यम से करते है। उनके द्वारा की गयी नित नयी खोजों और जानकारियों से इस महत्वपूर्ण संभावना की स्थापना हुयी कि मानव जाति एक ही जोड़े से पैदा हुई है और वह भी एक ऐसे प्राचीन सुदूर केंद्र में, जहाँ पहली मानव-बस्ती बसी । ऐसे विभिन्न साक्ष्यों व शास्त्रों के स्वतंत्र निवाकरणों से भी कोई भी मनुष्य की प्रथम उत्पति या उपस्थिति की ठीक-ठीक गणना करने में अभी तक सफल नहीं हुआ है। फिर भी यह एक सामान्य चलन बन गया है कि मनुष्य की उत्पति ईसा से चार हजार वर्ष पहले हो चुकी थी।

तिथि गणना के ऐसे जो आंकड़े है, वे विभिन्न राजाओं के काल को जोड़ते हुए आंकलित किये जाते है। भारतीय सन्दर्भ में भी कई धार्मिक ग्रंथों में वर्णित राजाओं के काल को जोड़ते हुए मानव की उत्पति के कयास लगाये गए है। ऐसे सभी प्रयत्न निःसंदेह मानव-इतिहास को समझने में सहायक रहे है- उन्हें एक सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता है। परन्तु जब उन्हें समग्र रूप से देखा जाता है तो ऐसा ज्ञात होता है कि विभिन्न देशों या राष्ट्रों के वर्णनों में उनकी गणना एक-दूसरे देश या राष्ट्र से बहुधा मेल ही नहीं खाती है । इतना ही नहीं एक ही देश या राष्ट्र के अलग-अलग साक्ष्यों में भी वह अलग-अलग मिलती है। इस प्रकार से ये जो साहित्यिक या शास्त्र-साक्ष्य है वे एकरूपता लिए हुए नहीं है। अतः उनको आधार मानना खतरे से खाली नहीं है।

प्राचीन इतिहास को जानने के साधनों में ज्ञान की एक नयी शाखा पुरातत्व ने सबसे अहम् भूमिका निभाई। हम पुरातत्व को, जो प्राचीन स्मारक या अवशेष आदि है, उनके वैज्ञानिक अध्ययन से जुडी शाखा के रूप में जानते है। उसकी नित-नयी खोजों से भी प्राचीन इतिहास को उघाड़ने या उसका संधान करने में हमें बहुत बड़ी सहायता मिली है। इन खोजों से यह साबित हुआ कि प्राचीन काल में सभी राष्ट्रों का तकरीबन एकसा ही निश्चित इतिहास रहा है। सभी आदि काल में जंगली, अनपढ़ और धातुओं के प्रयोग आदि से अनभिज्ञ थे। धीरे-धीरे उसने औजार बनाये- पत्थर के, हड्डियों के, सींगों के और अन्य चीजों के- जो उसे उपलब्ध थे। उसका भोजन भेड़-बकरी या मच्छली आदि था। समय के साथ उसने धीरे-धीरे धातुओं का प्रयोग भी सीखा और ताम्बा, टिन, सोना,चाँदी का प्रथमतः उपयोग शुरू किया। उसके बाद लोहे का उपयोग भी शुरू हुआ। ऐसा माना जाता है कि यह आदि पाषण-युग हमारे लिखित इतिहास के शुरू होने से बहुत पहले ही ख़त्म हो गया। लेकिन दक्षिणीय समुन्द्र के किनारे बसी बस्तियों में यह आज भी वर्त्तमान है। कुछ देशों में ताम्र-युग का भी लिखित इतिहास नहीं है और लौह-युग में भी घटनाओं का लेखबद्ध किया जाना नहीं मिलता लेकिन रोमन आदि साहित्य में यथा होमर की कृतियों में ताम्र-युग को पार करने के प्रचुर साक्ष्य मिलते है।

इस प्रकार से अगर विहंगम दृष्टिपात करे तो मनुष्य के प्रारंभिक इतिहास का खाका खींचने में हमें बहुत कुछ तार्किक संभाव्यता मिल जाती है और यह स्पष्ट हो जाता है कि एक बर्बर आदि-मानव का सभ्य-मानव में बदलना अपने आप में अन-थकी और अन-कही एक लम्बी यात्रा है। वस्तुतः इन सबसे हम सिर्फ तार्किक रूप से कुछ तार पकड़कर ही प्राचीन इतिहास का उद्घाटन कर पाते है। सामान्यतया इतिहासकारों का मत है कि ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में मानव-बस्तियां इजाद थी, जो आज भी मौजूद है एवं अभी भी अपनी प्राचीन आदतों और आकृतियों से साम्यता रखती है। इस कड़ी में अगर देखा जाय तो जो कुछ पुस्तकीय साक्ष्य है या विभिन्न राष्ट्रों की जो आम-धारणाएं है, वे सभी इस बात की ओर संकेत करती है कि एशिया, और वह भी उसका पश्चिमी भाग मनुष्य की प्रारंभिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। वहीँ से मनुष्य का पृथ्वी के अन्य भागों में फैलाव हुआ। यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में भी वहां की धरती और पर्यावरण के अनुसार आबादी हुई। कदाचित आदि मानव की उत्पति का केंद्र भी अफ्रीका माना जाता है पर सभ्यता का विकास वहां नहीं हो पाया, इसका श्रेय निश्चित रूप से एशिया महाद्वीप को ही दिया जाता है।

ऐसे कतिपय साधनों से जुटायी गयी जानकारियों के साथ ही मानव-इतिहास के प्रारंभिक चरण की सामान्य अवधारानाओ या कथनों को पुष्ट करने हेतु इतिहासकार आदि-मानव की जनसँख्या को उसके विशेष लक्षणों, जो एक-दूसरे से भिन्न या विशेष है, के आधार पर भी उसे कई भागों में विभक्त कर इतिहास को समझने की कोशिश करते है। यह भी एक महत्वपूर्ण और अहम् साधन और उपागम है, जिससे दबे हुए इतिहास की कई परते खुली और कई तरह के संदेहों से पर्दा उठा। इसमे विभिन्न लक्षणों के आधार पर मानव-प्रजाति का कई भागों और उपभागों में विभाजन किया जाता है और फिर उनके मानक और विचलन की संभाव्यता और विस्तार को आधुनिक उपस्थित मानव से मेल करते हुए इतिहास की रिक्तता को भरा जाता है। जो मानव-प्रजाति का अध्ययन करने वाले एथ्नोलोजिस्ट है, वे मोटे रूप से तीन तरह की विभिन्नताओं के आधार पर मानव-जाति को मानव-समूहों या राष्ट्रों में बाँटते है, वे है- 1.शारीरिक बनावट की भिन्नता, 2.भाषा की भिन्नता और 3.बुद्धि या नैतिक-मानदंडों की भिन्नता।

इन तीनों आधारों पर मानव जाति का परीक्षण या बंटन करते हुए मानव-जाति विज्ञानी(एथ्नोलोजिस्ट) और इतिहासकार सामान्यतया समस्त मानव-जाति को तीन मुख्य भागों या प्रकारों में बांटते हुए सहमत होते है। इतिहास के सुगम ज्ञान हेतु उसे साधारणतया निम्नवत समझा जा सकता है- 1.नीग्रो (Nigros)या एथोपियन प्रकार- इसका मूल क्षेत्र अफ्रीका माना जाता है। जो एटलॉस का दक्षिण है(Continent of Africa, south of mount Atlas). इस प्रजाति के मानव का वर्गीकरण उसके काले रंग, घने घुंघराले ऊनि किस्म के बाल, लम्बी और संकीर्ण खोपड़ी, उन्नत ललाट और जबड़ों आदि की शारीरिक और भौतिक बनावट के आधार पर करते है। उनकी भाषा संयुक्ताक्षारी (agglutinated language) व एक पदीय आदि ज्ञात की जाती है। इस मानव-प्रजाति ने अभी तक विश्व-इतिहास पर कोई विशेष प्रभाव नहीं बनाया, हालाँकि नीग्रो प्रजाति साहसी, उद्यमशील और खेती के प्रति अति संवेदशील और प्यारे लोग है फिर भी बौद्धिक क्षमता के विकास के कम ही अवसर है। 2.मंगोलियन (Mangolian) प्रकार- इसका प्रसार पूर्वी और उत्तरी एशिया महाद्वीप में है, साथ ही पोलिनेसिया और अमेरिका में भी है। इनकी चमड़ी का रंग पीला, जो गौर वर्ण से लेकर श्याम वर्ण के बीच विस्तीर्ण माना जाता है। इनकी शारीरिक बनावट में ऋजु और दुबले प्रकार के, काले बाल और सपाट चेहरा, व्यापक खोपड़ी, गालों की हड्डी उभरी हुई और संकीर्ण आँखें आदि बताये जाते है। इस मानव-प्रजाति ने मानव-सभ्यता पर बहुत व्यापक और सार्थक प्रभाव डाला है- मुख्यतः नैतिक विकास के आयाम में, विभिन्न आविष्कारों के द्वारा, युद्धों द्वारा प्रव्रजन के द्वारा विभिन्न भू-भागों को आबाद करने आदि में। ये एशिया के उन लोगों के नेतृत्व कारी लोग थे जो नोमेडिक जीवन जी रहे थे, उन्हें मध्य एशिया तक सिमित कर दिया। इस प्रजाति का सर्वोच्च विकास हम चीन और जापान में पाते है, जो इस प्रजाति से सम्बंधित है। 3.काकेसियन (Caucasian)प्रकार- इस प्रजाति का मूल प्रदेश पश्चिम एशिया, यूरोप और अफ्रीका (एटलॉस के उत्तर का अफ्रीका) माना जाता है, परन्तु यह प्रजाति भी विश्व के विभिन्न भागों में फ़ैल गयी। भारत में आने वाले अंग्रेज (Britishers) इसी प्रजाति से निकले हुए लोग थे। रंग-रूप में ये गौर वर्णीय या हलके काले रंग के मने गए है। अच्छे और काले बाल परन्तु ऊनी किस्म के नहीं। गोल या अन्डाकर खोपड़ी, उन्नत ललाट आदि शारीरिक विशेषताएं पाई जाती है। इसके भी दो प्रकार पाए जाते है- : सेमेटिक या सीरो प्रकार, जिसमे अरेबियन समूह के लोग परिगणित किये जाते है और ब: इंडो-युरोपियन या जफेटिक समूह। समेटिक लोग सीरिया और अरब देशों में फैले, जिनका मूल प्रदेश या निवास एशिया का पश्चिमी भाग (इसमे अफ्रीका भी शामिल) माना जाता है। जो एक ओर टिगरिस और नील नदी के मध्य तक तथा दूसरी ओर भू मध्यसागर के क्षेत्र और हिन्द महासागर तक के विस्तृत क्षेत्र में माना जाता है। भारोपीय या इंडो-यूरोपियन का भारतीय प्रायः द्वीप से पश्चिमी की ओर पर्शिया तथा पूरे यूरोप को पार करते हुए कैप्सियन सागर और ब्लैक-सी से एटलान्टिक और जर्मन सागर तक का क्षेत्र माना जाता है। काकेशिया समूह ने विश्व-इतिहास में विशिष्ट भाग अदा किया है।

मानव-प्रजाति का मोटे रूप में किया गया यह प्रकार भेद और कई आधारों पर उपविभाजित किया जाता है, ज्ञान के क्षेत्र में वह सब महत्वपूर्ण है परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि मानव की इन प्रजातियों में और उनके चरित्र में ये विभिन्नताएं कैसे पैदा हुई? मनुष्य की खोज-बुद्धि ने इस पर भी बहुत जाँच-पड़ताल की है। इस पर भी काफी कुछ लिखा जा चुका है और अनुसन्धान हो चुका है। क्या ये वातावरण के प्रभाव से धीरे-धीरे परिवर्तित हुए? क्या इनके शारीरिक गुण उनकी बनावट के कारण विकसित हुए? आदि कई तरह के प्रश्न है, जो अभी भी अंतिम रूप से निर्णीत नहीं हुए है। जहाँ तक उपलब्ध इतिहास की बात है और प्राचीन ज्ञात इतिहास की पैठ है, ये भेद जैसे आज है वैसे ही पूर्व में भी दिखते थे। अफ्रीका जैसा अभी है, पूर्व में भी था- जो इथोपियन या नीग्रो लोगों का आवास है। पूर्वी और मध्य एशिया मंगोल लोगों का आवास या घर है तो पश्चिम एशिया और यूरोप काकेशियन प्रकार के लोगों का आवास या घर है।

इतिहास की दबी परतों में हम जितना पीछे जाते है, यह पाते है कि मनुष्य का चाहे जैसा भी प्रकार रहा हो, उसका विभिन्न जातीय- समुदायों में या परिवारों में बंटाना उसके बर्बर या आदिवासी जीवन में ही शुरू हो गया था परन्तु इसकी कोई ठोस इतिहास-सामग्री नहीं मिलती है। ऐसे सभी आंकलन तार्किक रूप से इतिहास की रिक्तता को भर देते है और इतिहास एक गति या लय से चल पड़ता है। वस्तुतः इतिहासकार का काम वहां से शुरू होता है, जब मनुष्य ने अपने विशेष सामाजिक समूह की जनसँख्या को एक कौम या राष्ट्र कहना शुरू किया, एक निश्चित भू-भाग पर रहना शुरू किया और धीरे-धीरे उसका प्रकटीकरण होने लगा और पहचान बनने लगी। कुछ निश्चित कानून-कायदों के या सरकार के अधीन रहने लगे। यह पहली बार किस तरह से घटित हुआ या ये समागम या संयोजन कैसे हुए- हम अभी भी अनभिज्ञ है। इस पर भी बहुत सारी संभावनाएं व्यक्त की जाती है, जो हमारे ज्ञान क्षेत्र में इजाफा करती है।

कुछ इस तरह के वर्णन मिलते है कि सामाजिकता की प्रवृति मनुष्य की एक मूल-प्रवृति है, जिसने पहले एक छोटे से मनुष्य-समूह में आश्रय पाया और धीरे-धीरे उसका प्रसार या विस्तार अन्य मनुष्य समूहों में भी हुआ। इस प्रकार से वे व्यक्तियों को एक-दूसरे के नजदीक सम्बन्ध करते गए या जोड़ते गए और सामाजिक समूह विभिन्न परिवार, गोत्र या जाति आदि के रूप में उभरते गए और एक कौम या राष्ट्र का प्रार्दुभाव हुआ। कुछ यह भी कहते है कि यह सब बाहरी या पर्यावर्णीय कारणों से हुआ। मनुष्य पहले पहाड़ों में या कंदराओं में रहता था फिर वह घाटी-प्रदेशों में आया, वहां से नदियों के उपजाऊ मुहानो पर आया और वहां से अन्य प्रदेशों या जगहों पर गया या कि मनुष्य पहले शिकारी के जीवन या पेशे में ढला, मत्स्य-जीवनयापन किया फिर उसने उन्नत पशुपालन जीवन में प्रवेश किया फिर कृषि के जीवन में ढला- जिसने शहरों, बाजारों और सभ्यता के अन्य साजो-सामान को जन्म दिया, आदि-आदि।

इन सब में सच्चाई का पुट है- कोई एक या सभी कारण किसी न किसी घटना या विकास के उत्तरदायी कारक रहे है लेकिन उन्हे सिर्फं योंही या स्वतः ही विश्वसनीय नहीं मान लेना चाहिए। जो कुछ निश्चित रूप से कहा जा सकता है वह यह है कि कुछ निश्चित बाहरी परिस्थितियां यथा भूमि, जलवायु और भूगोलीय स्थिति ने जो छोटे समुन्द्रों के निकट थी या नदियों के नौकायन से कुछ विशेष सहयोगी क्रिया-कलापों, जो मानव जाति के लिए विशेष थी, वे अवसर पाकर उभरी। प्रारंम्भिक युग में इन परिस्थितियों ने कुछ कौमों को उनके एकीकरण और सहभागिता को बल दिया और वे एक संस्कृति के रूप में संज्ञेय हुए, जबकि बाकी मानव समूह बर्बर या असभ्य ही बना रहा। संस्कृति के विकास में आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण योगदान होता है, उसे किसी भी स्तर पर नाकारा नहीं जा सकता है। बिना संचयन और आदान-प्रदान के संस्कृति विकसित ही नहीं हो सकती है।

इस प्रकार से मनुष्य जाति के प्रारंभिक सामान्य इतिहास पटल पर जो सबसे पहले राष्ट्र आते है- वे आंशिक रूप से सेमेटिक और आंशिक रूप से जेफेटिक कहे गए है। जिन्हें विभिन्न नामों से पुकारा जाता है यथा, इजिप्टियन, अरब, असीरियन, हेब्रो, फ़ोनेशियन, मेदिज, पर्शियन, लिडियन आदि-आदि। ये सभी प्राचीन काल में फले-फुले और आज भी एशिया के दक्षिण-पश्चिम भाग में अपने परिवर्तित या विकसित रूप में विद्यमान है और अफ्रीका के निकटस्थ भागों में भी। ईसा से बहुत शताब्दियाँ पूर्व हम पाते है कि ये राष्ट्र साथ-साथ अस्तित्व में है या एक-दूसरे के उत्तरोतर में। प्रत्येक का अपना वजूद है और इन्होने प्रत्येक ने अपनी एक राज्य संस्था या पोलिटी विकसित की थी। हमें यह भी ज्ञात होता है कि वे एक-दूसरे के विरोध में और काफी हद तक अलग या एकाकी और एक-दूसरे की क्रिया या प्रतिक्रिया में क्रियाशील भी उजागर होते है। यह सब उनके लडाई-झगड़ों या वाणिज्य-व्यापार से स्पष्ट होता है। ईसा पूर्व लगभग पांचवीं या छठी शताब्दी में इन्हें पर्शिया एम्पायर के रूप में हम विश्व-पटल पर इन्हें संज्ञेय करते है। इस साम्राज्य का गठन इतिहास की महत्वपूर्ण गूंज या घटना है। तब तक का विभिन्न देशों या राष्ट्रों का इतिहास अलग-अलग या विशिष्ट है। इतिहासकार सभ्यता के विकास को जानने हेतु एक से दूसरे की टोह लेते रहते है, जिससे उन्हें अच्छे ढंग से जानने के अवसर मिलते है।
पर्शियन एम्पायर के गठन की तिथि विभिन्न स्रोतों में बिखरी पड़ी इतिहास सामग्री को एक सूत्र में बंधने का अवसर देती है और उस समय से इतिहास एक लय और एक गति को प्राप्त कर लेता है। तब से लेकर दो शताब्दियों तक पर्शियन प्राच्य-जगत (Oriental World) के मालिक होते है। इसलिए उनका जो इतिहास है वह प्राचीन राष्ट्रों के सामान्य इतिहास को अपने में समाहित कर लेता है। उसके बाद ग्रीक लोगों का वर्चस्व बढ़ता है और वे सभ्यता को पर्शिया की सीमाओं से बाहर ले जाते है। यह भी दो शताब्दी तक रहता है। ग्रीक लोगों को रोमन लोगों से टक्कर मिलती है और रोमन एम्पायर की भूमिका बढ़ती है, जो सभ्यता को पश्चिम में अटलांटिक तक ले जाते है। इनका भी पाँच सौ- छः सौ वर्षों तक वर्चस्व रहता है और उसका विघटन आधुनिक समाज के निर्माण में होता है।

रोमन एम्पायर के विघटन से पूर्व के प्राचीन विश्व इतिहास को इतिहासकारों ने चार भागों में बांटा है- 1.प्राचीन काल (Primeval Era)- प्राचीन काल की तब तक की अवधि जब तक की प्राचीन राष्ट्रों का अपना इतिहास अस्तित्व में नहीं आता- लगभग ईसा से 525 वर्ष से पहले का युग। 2.परेशियन युग (Persian Era)- इसमे पर्शियन आधिपत्य का काल समाहित है जो 525 .पूर्व से 330 .पूर्व तक माना गया है। 3. ग्रीस-एम्पायर (Grecian Era)- जो 330 . पूर्व से तब तक माना जाता है, जब तक रोमन शक्ति की स्थापना नहीं होती है और लगभग ई. पूर्व 90 तक माना जाता है। 4. रोमन युग (Roman Era)- . पूर्व 90 से 476 ईस्वी तक।

इन चारों युगों में तिथियों या अवधी को लेकर थोड़ी-बहुत उहा-पोह हो सकती है परन्तु विश्व-इतिहास की समझ हेतु यह उपागम तकरीबन सर्व सहमतिकारक मन जाता है। इन चारों काल-खण्डों में विश्व-इतिहास में प्रारंभिक युग और पर्शियन युग में चीन और भारत का इतिहास कदाचित गायब'सा है, क्योंकि इसके बाद उत्पन्न ग्रीक और रोमन साम्राज्यों में ये राष्ट्र स्थायी रूप से समाहित नहीं रहे है। अतः इनका इतिहास लुप्त-प्रायः है। जो कुछ भारत के बारे में लिखा गया वह उसकी वर्त्तमान हालातों का अवधान करके ही इतिहासकारों ने लिखा है। अभी भी भारत का प्राचीन इतिहास खोज का विषय ही बना हुआ है, जबकि ग्रीक और रोमन साम्राज्यों में पर्शियन साम्राज्यों की प्रबल संयुजता और काल क्रमिकता रही है।

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शेष अगले आलेख में-------

मेघ: एशिया का इतिहास

पिछली पोस्ट में विश्व-इतिहास पर एक विहंगम अवलोकन रखा था, जिसमे यह बात कही गयी थी कि एशिया महाद्वीप सभ्यताओं की भूमि रही है। इसलिए विश्व में एशिया महाद्वीप 'officina genitium' या 'mother of nations' के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहने का एक सबसे बड़ा कारण यह है कि इसने न केवल विभिन्न सभ्यताओं को जन्म दिया बल्कि इसने बहुतायत से यहाँ पर विभिन्न मानव-प्रजातियों को आश्रय भी दिया। एशिया में निवासित मलय या दक्षिण की दो मानव प्रजातियों को छोड़ दे, जो दुनिया में पनपी पांच या छः प्रजातियों में से है, तो तक़रीबन सभी प्रजातियाँ यहाँ पनपी। सामान्यतया मंगोलिया के रहवासी और काकेसिया के रहवासी एशिया महाद्वीप की प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करते है। इन दो विशिष्ठ भू-भागों के आधार पर ही इन दो विशिष्ट प्रजातियों का नाम पड़ा है, हालाँकि इन नामों को लेकर कई प्रकार के आक्षेप भी लगते है और इनके दूसरे वैकल्पिक या वैज्ञानिक नाम भी सुझाये जाते है, पर ये नाम इतने सुआख्यात और सुदृढ़ हो गए है कि उनके दूसरे सुझाये गए नाम इतनी स्पष्टता से प्रकट या प्रस्फुटित नहीं होते है।

काकेसियन लोगो के लिए जर्मन लेखकों ने बारम्बार 'मेडिटेरियन' शब्द का प्रयोग किया है। समुन्द्रों के किनारे टापुओं में बसे लोग इसी प्रकार में समाहित माने गए है। मेडीटेरियन शब्द को एक विकल्प के रूप में तो लिया जा सकता है परन्तु यह काकेशियन शब्द के पर्याय या सबस्टिट्यूट के रूप में नहीं लिया जा सकता। क्योंकि ऐसा अवधान करने से यह शब्द बहुत सी मानव प्रजातियों को बाहर कर देता है, जो बहुत पहले यहाँ निवासित थी और धीरे-धीरे मेदितेरियन क्षेत्र से विस्थापित हो गयी। इसकी जगह पीत या पीली प्रजाति के लोग शब्द काम में लिया जा सकता है, जो यहाँ के निवासित लोगों की चमड़ी का रंग है। ध्यान देने वाली बात यह है कि चमड़ी के ये रंग आदि प्रतिस्थापकस्थायी कारक नहीं है, अतः फिर स्थितियां वैसी नहीं बनी रहती। पीत या येल्लो 'मंगोली' प्रायः उजले-साफ (फिर) या भूरे रंग में परिवर्तित हुए, जिन्हें युरोपियन रंग से अलग करना कठिन है और गौर वर्ण अक्सर काले या श्याम वर्ण में भी देखा गया है। कई कारको से शरीर के रंग-रूप का परिवर्तन या उनका अंतर्विष्ट स्वरुप घटित होता रहा है। जिन में प्रमुखतः जलवायु, भोजन, सामाजिक-आदतें और उनका आपसी अंतर्संबंध है। जो इस महाद्वीप में सुदूर अज्ञात काल से आज तक जारी है।

दक्षिण-पश्चिम एशिया- जिस में भारत, ईरान का पठारी क्षेत्र, अनातोलिया और अरबिया प्रायः द्वीप में काकेशियन प्रजाति की प्रमुखता है और बाकी में मंगोलियन प्रजाति की। यह भी स्थापित हुआ कि सुदूर पूर्व और भारत से परे उत्तरी क्षेत्रों में भी जापान, कोरिया, मंचूरिया और अल्टाई आदि प्रदेशों में भी इसका विस्तार हुआ। अतः जो कुछ निस्चित रूप से कहा जा सकता है, वह यही है कि पूर्व और पश्चिम संभवतः मंगोलियन और काकेशियन प्रजाति के मूल घर है। प्रश्न यह खड़ा होता है कि अगर ये मूल रूप में एक ही थे तो फिर उनमें भेद कैसे और कहाँ हुआ? और यह सब कैसे विस्तारित हुआ? आदि-आदि। इसलिए हमें तथ्यों के साथ बात करनी चाहिए, जो यह है कि ये दोनों आदिम प्रजातियाँ सहस्रों वर्षों से एक-दूसरी के संपर्क और सानिध्य में रही है। इतिहास केवल ऊपरी आवरण को कुरेदता है और तकरीबन पीछे के 7000-8000 वर्षों के इतिहास को जानने के लिए वह अक्कादियन, सेमेटिक, आर्य और चीनी आदि के रूप में धुंधली सी प्रतिध्वनि के एक रूप में व्यक्त करता है। अद्यतन जानकारी यह सुव्यक्त करती है कि उस समय भी एशिया महाद्वीप आर्टिक प्रदेश से भारतीय-महासागर तक और सर्मटिया से प्रशांत महासागर तक बसा हुआ था, जैसा कि वह आज है। न केवल इन दो सुस्पष्ट प्रजातियों के लोगों से बल्कि इनके विभिन्न अवांतर भेदों की प्रजातीय जनसँख्या के साथ आबाद था।

इतिहास की इन मद्धिम प्रतिध्वनियों से इतर सब कुछ शांत और अज्ञेय है। विभिन्न पुरातत्व अभियानों में एशिया में जगह-जगह कंकालो के टीले मिलते रहे है, जो क्रूर पाषण-काल और आदिम-मनाव के नम्र अवाशेषों को सुव्यक्त या उजागर करते है। एशिया में जगह-जगह बिखरे ऐसे अवशेष मनुष्य की यहाँ प्राचीन उपस्थिति को सुव्यक्त कर देते है। इनसे यह बात सुविदित हुई कि मानव-इतिहास के सुप्रकटिकरण से पूर्व कई युगों तक मनुष्य का एक जगह से दूसरी जगह आवर्जन और प्रव्रजन होता रहा है। मनुष्य आखेट, चारे और भोजन-पानी के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकता रहा है। जिससे उसका पीत वर्ण या गौर वर्ण अनंत प्रकारों में बदला और वह पूरे एशिया महाद्वीप में और पडोसी यूरोप, यूरोप के पश्चिमी प्रायः द्वीपों और उत्तरी अफ्रीका में विस्तृत हुआ। ऐसा माना जाता है कि इतना होने के बावजूद भी मंगोलियन प्रकार मुख्य रूप से एशिया महाद्वीप में बना रहा और काकेशियन प्रकार सर्वाधिक रूप से एशिया महाद्वीप के इतर विस्तृत हुआ। मंगोलियन तत्व का प्रतिनिधित्व मुख्य रूप से यूरोप के फिन्नो-तातार (finno-tatars), पूर्वी अर्चिपेलागो (eastern archipelago) और मदगस्कार (Madagascar) के रूप में पहचाना जाता है। जबकि काकेसियन स्टॉक का प्रतिनिधित्व यूरोप की आर्य प्रजाति के रूप में किया जाता है, जिनमे हमितेस (hamites) और सेमिटेस (Semites) का उत्तर और उत्तर पूर्व अफ्रीका, इंडोनेशिया, मलेशिया और प्रशांत महासागर के पोलिनेशिया आदि में विस्तार बताया जाता है। लेकिन एशिया महाद्वीप में अपने भीतर ही चीनी साम्राज्य, इंडो-चाइना, साईबेरिया और भारत से परे इरानीया, तर्किस्तान आदि इलाकों में भी मंगोल की विभिन्न प्रजातीयां है, जबकि यह भी माना जाता है की काकेशियन प्रजाति भारत के दक्षिण-पश्चिम भागों में और कुछ जापान में भी पायी जाती है। साथ ही साथ ये सभी क्षेत्र कुछ संदर्भित अर्थों में या संबंधों में परस्पर प्रयुक्त विरोधी शक्तियों के प्रतिनिधि भी कहे गए है।

ऐसे कई विवरणों और तथ्यों से यह कहना वाजिब लगता है कि पूर्व में मंगोल तत्व की प्रधानता है या अधिकता है तो वहीं पश्चिम में काकेशियन तत्व की, परन्तु आजकल दोनों प्रजातियाँ सर्वत्र पायी जाती है। इनका आपस में इतना मेल-जोल या घुलना-मिलना हो चुका है कि बहुत कम प्रदेश ऐसे है जहाँ ये अभी भी शुद्ध रूप में वर्त्तमान है। ऐसा माना जाता है कि अरबिया प्रायः द्वीप में काकेशियन और तिब्बत में मंगोलियन अभी भी बहुत-कुछ उसी रूप में है। लेकिन बाकी एशिया में ये इस प्रकार से घुल-मिल गए है कि यह कहना मुश्किल है कि ये कहाँ से शुरू हुए थे और कहाँ ख़त्म हुए। इस संदेह के कारण कई लोगों ने मंगोलियन प्रजाति का संज्ञान लेना ही छोड़ दिया।

इन सब पर जानकारी होना हमारे प्राचीन अलिखित इतिहास को जानने के लिए जरुरी है। अतः जो लोग इस क्षेत्र में काम करने के इच्छुक है, उन्हें इस प्रकार के ज्ञान से अपने को संपन्न करना चाहिए। यहाँ जो कुछ किंचित उल्लेख किया गया है, वह नाम मात्र का है। सिर्फ एक संकेतभर है।

प्रजातिगत लक्षणों के अलावा मानव-प्रजातियों के निर्धारण में विभिन्न लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को भी एक आधार-रूप में देखा जाता है। हालाँकि उसकी अपनी सीमाएं है और कई बार यह संदेह का स्रोत भी बन जाती है फिर भी यह एक बहुत बड़ा आधार माना जाता है। इन पर अध्ययन करने वालों ने भाषाओँ के आधार पर मानव-समूहों का कई भागों में विभाजन किया है। मोटे रूप से उन्हें 30 या उससे भी अधिक भागों में बांटा गया है। भाषा के आधार पर काकेशियन समूह मोटे रूप से 6 या 8 प्रकारों में यथा, आर्य, सेमेटिक, जोर्जियन, आदि रूप में बंटे मिलते है। वहीं मंगोलियन उरल-अल्टैक, अन्नामितिको-चइनीज, टिबेटो-बर्मन आदि समूहों में विभक्त किये जाते है। इन जानकारियों से कई प्रच्छाओ का भी जन्म हुआ। यह पूछा जा सकता है कि शारीरिक गठन के प्रकारों से ज्यादा भेद भाषा के आधार पर कैसे और कब हुए? अगर सभी काकेशियान का जैविक रूप एकस ही है, जैसा कि माना जाता है, तो उनका प्रारंभिक बिंदु भी एक ही होना चाहिए। यह कैसे हुआ कि आर्य, सेमेटिक और अन्य भाषायी प्रकार उत्पति रूप से (genetically) एक नहीं है। भाषाविद इस पर काफी माथा-पच्ची करते हुए दिखते है। उनकी खोजों ने भी हमारे अंधकार में दबे इतिहास को उजागर करने में बड़ी मदद की है। इसके जो संभावित समाधान सुझाये जाते है, उनमे यह ध्यान देने योग्य है कि या तो ये काकेशियन या मंगोलियन लोगों द्वारा दूसरी जातियों पर थोंपे गए या उन्होंने (काकेशियन या मंगोलियन) ने इन्हें समय के साथ स्वतंत्र रूप से विकसित किया हो। खैर, जो भी हो, भाषा का तत्व मानव के प्राचीन इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण कारक तो ठहरता ही है।

विजय के द्वारा, आवर्जन या प्रव्रजन के द्वारा या विस्थापन और कई अन्य कारणों से भी लोग अपनी भाषा को बदलने के लिए बाध्य हुए होंगे और फिर उसे अंतर्मिलन के फलस्वरूप परिवर्तित और परिवर्धित भी किया होगा- इस बात को नकार नहीं जा सकता है। इसमे तुर्की लोगों की भाषा देखी जा सकती है, जो भाषायी रूप से मंगोल लोगों से अलग हुए। भाषागत रूप से वे काकेशियन है जबकि बोलते तुर्की है। इसके उलटा हजारा और अयमक (उत्तर-अफ़ग़ान) में वे प्रजातिगत रूप से मंगोल है पर उन्होंने अपनी भाषा पर्शियन अपना ली।

ऐसे विवरणों से यह लगता है कि प्रजातियों की प्राचीन छान-बीन में न तो भाषा और न शारीरिक गठन कभी भी सुरक्षित पैमाना कहा जा सकता है। उनकी अपनी-अपनी सीमाएं और आबधतायें है और यह ठीक-ठीक बताना असंभव लगता है कि इनमे भाषाओँ का विकास और भेद कैसे हुआ? ऐसे कतिपय कारणों से यह कहना उचित लगता है कि एशिया महाद्वीप के लोगों का प्रजातिगत वर्गीकरण असंभव है। फिर भी एक परिकल्पना के रूप में शारीरिक आधार और भाषायी आधार पर उन्हें कुछ निश्चित प्रकारों में वर्गीकृत कर हम संभाव्य सत्य के काफी कुछ नजदीक पहुँच जाते है। जहाँ भाषा और शारीरिक प्रकार या गठन अलग या विशिष्ट है वहां हम इसके ज्यादा नजदीक होते है, जैसा कि अरबिया और तिब्बत। बाकी सब जगहों का भेद या वर्गीकरण अवैज्ञानिक लगता है। दर असल यह मसला लोगों की कौमों से जुड़ा है न कि लोगों की प्रजातियों से।

विभिन्न बोलियाँ या भाषाएँ बोलने वाले लोगों का साहचर्य और आपसी सम्बन्ध कभी भी संदेह में नहीं रहा है अर्थार्त वे परस्पर मिलते-जुलते रहे है- कारण कोई भी हो। उनके आपसी सम्बंधता में भलेई उनकी अपनी भाषा की शब्दावली आतंरिक रूप से अपने को बचाने की कितनी ही जुगाड़ करती रही हो फिर उनकी बोलियाँ या भाषाएँ भी घुल-मिल गयी और आपस में इतनी अंतर्गुन्थित हो गयी कि उन्हें एक दूसरे से विलग करना भी कठिन हो गया है। यह देखिये कि जब आर्य प्रजाति संकेताक्षर प्रयुक्त किया जाता है तो मानव शास्त्रीय दृष्टिकोण से हम आर्य भाषा परिवार की बात कर रहे होते है, जो भाषाविदों को सुविज्ञ होती है। इसलिए एशियाई भाषाओँ की संरचना प्रथम स्थान प्राप्त करती है। इस आधार पर बनाये गए समूहों में भाषा का आधार होता है, जो वैज्ञानिक हिसाब से सटीक बैठता है। परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रजातीयता (racial) आधार पर किये जाने वाले वर्गीकरण से भाषायी आधार पर किया जाने वाला वर्गीकरण बिलकुल ही या पूर्णतः अलग ही है और यह भाषायी वर्गीकरण प्रजातीय वर्गीकरण की अपेक्षा मौजूदा आधारों पर अवस्थित है।

भाषाओँ की जो संरचना या व्याकरण है, वह उस बोली या भाषा के विकसित होने के बहुत बाद में सुव्यवस्थित होती है। जो प्रारंभिक भाषा है, उसके ओर्गनिक संरचना में अपरिवृत्य रूप पाते है। वे अपने में अडिग है, फिर भी ये निश्चित रूप से एक-दूसरी पर निर्भर है। इस प्रकार से बहुत सी काकेशियन और मंगोलियन मिश्रित प्रजातियाँ यथा अनातोलियन तुर्क, उज्बेग, ताजिक, तुर्किस्तानी आदि विकसित हुई है।

कहने का तात्पर्य यही है कि मानव समूहों के प्रजातीय भेदों की जानकारी हेतु सभी संभाव्य खतरों के साथ भाषा भी एक बहुत बड़ा आधार है। जिसके सूत्र पकड़कर हम अपने प्राचीन अन-कहे इतिहास की सतर्कता से टोह ले सकते है।

सेमेटिक भाषा समूह------
क्रमशः---- जारी-----

अगर एशिया महाद्वीप को प्रजातीय और भाषायी प्रकार से देखें तो भी हम पाते है कि यहाँ पर विभिन्न तरह की भाषाएँ बोली जाती है और कदाचित इन सभी भाषाओँ का मूल या निकास एक ही माना जाता है। कईं भाषाविद उनके अलग-अलग मूल के सिद्धांत भी पेश करते है। जो भी हो, एशिया के लोगों का एथ्निकल एंड लिंगविस्टिक स्कीम में दो भागों में विभाजन किया जाता है। जिसमें पहला मंगोलियन या पीत-वर्णीय मानव-प्रजातीय भाषाई प्रकार कहा जाता है और दूसरा, काकेशियन या फेयर वर्णीय मानव-प्रजातीय भाषायी प्रकार कहा जाता है। अन्यत्र इस पर विवेचन किया जायेगा। यहाँ इन दोनों प्रकारों से सम्बंधित किये जाने वाले भाषा समूह , उस भाषा को बोलने वाली मानव-प्रजाति और उसके मुख्य प्रकारों को अवलोकनार्थ दिया जा रहा है, ताकि प्रजातीय व भाषाई प्रकारों के आधार पर कहे गए या बताये जाने वाले इतिहास को हम ठीक से जान सके।

मंगोलियन प्रकार:-
1.भाषा समूह- तिब्बती-बर्मन, मानव प्रजाति- तिब्बती और बर्मन, इनके मुख्य प्रकारों में बोडपा, तागुता, सिफों, हिमालयी जातियां और उत्तरी असमी जातियां तिब्बती प्रजाति में गिनी जाती है और बर्मीज, खाखी, अरकविज, आदि बर्मीज में गिनी जाती है।
2.भाषा समूह- खासी, मुख्य प्रकार- दक्षिणी असमी।
3.भाषा समूह- मोन, मुख्य प्रकार - खसिया और तलेंग(पेरू)
4.भाषा समूह- ताई, मानव प्रजाति- श्यामी, शान, लामो, अहोम।
5.भाषा समूह- सिनिको-एन्न्मिटिक, मानव प्रजाति- चायनीज-एन्नमिज, मुख्य प्रकार- चायनीज, तोंकिनिज, कोचीन-चायनीज।
6.भाषा समूह- कोरिया-जापानी, मानव प्रजाति- कोरिया, जापानी, लू-चु।
7.भाषा समूह- उरल-अल्तेक, मानव प्रजाति- फिनो-तातार, मुख्य प्रकार- मंगोलियन, तुगास और मांचू, तुर्की, समोयेदी, उग्रेन।
8.भाषा समूह- मलयन, मानव प्रजाति- मलय, मुख्य प्रकार- मलय और फोरमोसन।

इसके अलावा निम्न भाषायी समूह काकेशियन प्रकार का माना जाता है-

काकेशियन प्रकार:-
9.भाषा समूह- कर्ट्वेली, मानव प्रजाति- काकेशियन, मुख्य प्रकार- जोर्जियन, मिग्रेलियन, स्वां, खेव्सर, पश, लेज।
10. भाषा समूह- चेर्केस, मानव प्रजाति- काकेशियन, मुख्य प्रकार- किर्कसियन, अवखेसियाँ, कबर्ड।
11.भाषा समूह- चेचेन, मानव प्रजाति काकेशियन, मुख्य प्रकार- चेचेन।
12.भाषा समूह- लेस्घियन, मानव प्रजाति- काकेशियन, मुख्य प्रकार- दागेस्तानी ।
13.भाषा समूह- आर्यन, मानव प्रजाति- ईरानी, गल्चास व हिन्दू, मुख्य प्रकार- ईरानी: ताजिक, बलोच, कुर्द, ओस्सेतिअन, अर्मेनियन, अफ़ग़ान, गल्चास में ज़राफ्शन, वाखी,शिया-पोश-काफ़िर व हिन्दू में पंजाबी, हिंदी, बंगाली, असमी, नेपाली, उड़िया, मराठी।
14.भाषा समूह- सेमेटिक, मानव प्रजाति- सेमेटिज, मुख्य प्रकार- असीरियन, अरमान, हेब्रेओ फोनेसियन, अरब, हिम्यरिते व अब्य्स्सिनिअन।

निम्न भाषा समूह अभी भी किसी प्रकार में नहीं रखे जा सके। इनके बारे में संदेह है, हालाँकि कुछ अध्ययन इन्हें किसी न किसी वर्गीकरण में ला खड़ा कर देते है परन्तु अंतिम रूप से अभी भी अनिर्णीत ही है-

संदेहयुक्त-
15.बलुस्चिस्तान की ब्राहुई
16.दक्षिण की द्रवेडियन
17.कोलारियन
18.सिंहली(सीलोन)
19.खमेर(कम्बोडिया)
20.एनो(येसो और सखलियन)
21.चुक्चिस व कोरियाक
22.युकगिर
23.कम्चदलस
24.गिलियक
25.दक्षिण-पश्चिम चीन के आदिवासियों की भाषा
26.अंडमान आइलैंड के निग्रितोस व मालक्का की भाषा
ऊपर निर्दिष्ट पहली पांच भाषाएँ अन्य सभी रूपों से कुछ अहम मामलों में अलग है जो तथाकथित "एकपदीय," या "अलग" परिवार, के रूप में जानी जाती है। ये एक आदिम प्रकार की भाषाएं मानी जाती है। यह विभिन्न व्याकरणिक संबंधों को व्यक्त करने के लिए किसी भी संशोधन के काबिल नहीं हैं। प्रत्येक 'मूल' एक पद है और वह विशिष्ट या अलग है , जो वाक्य में अपनी स्थिति के अनुसार अर्थ को प्राप्त करता है। अर्थार्त वाक्य में उस पद की स्थिति के अनुसार उसका अर्थ ग्रहण किया जाता है। इससे लगता है कि ये आदि मानव की प्रारंभिक भाषा का प्रतिनिधित्व प्रकार है। एक पदीय भाषाओँ को मनुष्य की भाषा का प्रारंभिक प्रकार माना जाता है। ये प्रारंभिक भाषाएँ किसी भी प्रकार के व्याकरणीय संबंधों हेतु असक्षम होती है अर्थार्त इनकी व्याकरण विकसित नहीं होती है। इन भाषाओँ में ध्वनि या पद के ध्वन्यात्मक प्रकार का विशेष महत्त्व होता है। एक ही शब्द विभिन्न ध्वन्यात्मक उच्चारण से भिन्न अर्थ को व्यक्त करता है। कई भागों या कई मानव समूहों में ऐसी भाषाएँ है, परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी एक दूसरे से जुडी हुइ है। जितनी भी अलग अलग एक पदीय भाषाएँ है, जो पालि या देव नागरी से निकली है, वे इंडो-चाइना में भारतीय बौद्ध भिक्षुओं द्वारा तकरीबन 2000 वर्षों पूर्व लायी या प्रचलित की गयी।
जिस प्रकार से श्याम, पीत और गौर वर्ण का वर्गीकरण मानव प्रजाति के विकास क्रम को दिखाने के लिए किया जाता है, उसी प्रकार से अलग-थलग या एक पदीय भाषा, समूहन की भाषा और संश्लेसित भाषा के प्रकार भी मनुष्य के भाषा के उर्ध्वगामी विकास को दर्शाने के लिए किये जाते है। यह जानना सार्थक है कि आर्यन और सेमेटिक भाषाएँ सर्वाधिक संक्रमण से गुजर कर विकसित हुई है। यह सब कुछ आपस में मिलने और समूहन होने से ही होता है। इस प्रकार से ये इस प्रकार से गुथम-गुथ हो गयी है कि आज उनमे विभेदक रेखा खींचना या उसे जानना बड़ा मुश्किल है।
आर्यन या सेमेटिक भाषाओँ क बारे में कुछ कहे, उससे पहले भाषा की लिपि पर बात करना आवश्यक है, क्योंकि आज अगर हमें उनके प्राचीन भेद का पता लगाना है तो लिपि में प्राप्त उनके लेखों से ही लगाया जा सकता है। वही एक मात्र प्रबल आधार है, जिससे हम भाषा के प्राचीन से लेकर अद्यतन विकास को जान सकते है। मनुष्य ने अपने ज्ञान को लिपि के माध्यम से ही आगे बढाया है। साधारण बोल-चाल की भाषा में हम उसे 'लिखने की कला' का नाम देते है। और अगर इतिहास के झरोखे से देखा जाय तो हम पाते है कि वास्तव में इसका विकास एक कला के रूप में ही हुआ है। निःसंदेह प्राचीन संस्कृतियों में लिपि का बहुत महत्त्व माना गया था। इसीलिए मनुष्य ने इसे मनुष्य द्वारा इजाद की गयी कला के रूप में व्यक्त करने में भी संकोच किया । प्राचीन संस्कृतियों में बहुधा लिपि को मनुष्य की कृति नहीं माना गया। उनकी धारणा के अनुसार लिपि का कर्ता मनुष्य नहीं है, बल्कि यह देवता की देन मानी गयी थी। आप देख सकते है कि मिस्र निवासी इसके आविष्कारक को 'टोथ' नामक देवता से जोड़ते है। मेसोपोटामिया के निवासियों का विश्वास था कि यह उनके देवता 'नीबो' की देन है। यूनानी लोग इसका श्रेय अपने देवता 'हर्मीज' को देते है। भारतीय परंपरा में ऐसी धारणा प्रचलित थी कि लिपि का आविष्कार 'ब्रह्मा' ने किया आदि-आदि। ये सब प्राचीन काल में मनुष्य में जो दैवीय विश्वास की धारणा रही है, उसी का परिणाम है।
सबसे पहले मनुष्य ने लिखना कब सीखा? यह निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता है, पर इतना निश्चित है कि चित्र कला का विकास विश्व-इतिहास में उस समय हो चुका था, जिस समय मनुष्य पाषाणों के आश्रय में रहने लगा। बहुधा उसे 'पाषाण-युग' के नाम से भी जाना जाता है। गुफाओं में मिले कई शैल-चित्र उसके लिपि सम्बंधित ज्ञान के पूर्वाभास कहे जा सकते है। प्रारंभ में उकेरी गयी ये आकृतियाँ धीरे-धीरे आपसी संबंधो से चित्रात्मक शैली के रूप में लिपि का रूप लेने लगी होगी। ऐसा माना जाता है। इस प्रकार से चिन्हों का विकास हुआ और उसके साथ ही मनुष्य की लिपि का भी विकास होता गया। चित्रात्मक लिपि से भावनात्मक लिपि व ध्वन्यात्मक लिपि का विकास हुआ और उत्तरोतर आज की लिपियाँ अस्तित्व में आयी। यह सब लिपियों के विकास की लम्बी गाथाएं है। चित्रात्मक या भावनात्मक लिपियों में चित्र-चिन्ह प्रयोग में लाये जाते थे। जो लिपि की सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते थे। एक ही चित्र-चिन्ह का विभिन्न भाषाओँ में अलग अलग अर्थ हो सकता था और भी कई मुसीबतें थी। उन सबको दूर करने के लिए मनुष्य ने उस लिपि का आविष्कार किया, जिसे ध्वन्यात्मक लिपि कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके आविष्कार से मनुष्य ने अपने मन की भावनाओं को लिपि के चिन्हों के रूप में उतारने के लिए हर प्रकार से सफलता को प्राप्त किया। इस स्तर पर लिपि भारी भरकम या बोझिल नहीं लगती। इससे उसकी वाणी और भाषा साकार हो उठे।
इस ध्वन्यात्मक लिपि का विकास दो लिपियों में हुआ। इसमे पहली लिपि पदात्मक थी तथा दूसरी व्यंजन प्रधान थी। जिनका पहले किंचित उल्लेख किया गया है। पदात्मक लिपि मे व्याकरण यानिं व्यवस्था का अभाव था, पर व्यंजन प्रधान लिपि व्याकरण या व्यवस्था से व्यवस्थित लिपि बन गयी। इतना होने के बावजूद भी प्राचीन विश्व इतिहास में लिपियों के विकास में पदात्मक लिपि का अभूतपूर्व योगदान रहा है। प्राचीन संस्कृतियों में इस पदात्मक लिपि को कई स्रोतों से जाना जा चुका है। इस कोटि की लिपियों में तीन प्राचीन लिपियों का विशेष उल्लेख किया जाता है। जिसमें पहली लिपि का विकास दजला-फ़रात की घाटी के तीसरे चरण के विकास में हुआ। जिसका तात्पर्य क्युनिफोर्म लिपि से है। असीरियन सभ्यता के उत्तरकालीन स्तर पर यह लिपि पदात्मक बन चुकी थी। सीरिया और साइप्रस में जिन लिपियों का विकास हुआ था, उनमें भी पदात्मक लिपि के प्रमुख तत्व विद्यमान थे। मिनोअन सभ्यता की लिपि में भी पदात्मक लिपि की विशेषताए विद्यमान थी। इन सबसे निष्कर्ष यह निकलता है कि पदात्मक लिपि मे अपेक्षित व्यास्था और निश्चित योजना का अभाव था, फिर भी इसकी प्राचीनता संदेह रहित है एवं इसकी उत्तरकालीन विद्यमानता भी विवाद रहित मानी जाती है।
ज्यो-ज्योहं सभ्यता का विकास हुआ मनुष्य ने अपनी लिपि में भी विकास किया। इस विकास क्रम में वर्णमाला का विकास उसकी पराकाष्ठा थी। अर्थार्त वर्ण माला के स्तर पर पहुँच कर लिपि ने उच्च कोटि को प्राप्त किया और मानव ज्ञान को सबके लिए सहज और सुलभ बना दिया। वर्णमाला की जगह प्राचीन विश्व संस्कृतियों में अन्य प्रचलित लिपियों का स्वरुप इतना दुरूह था कि इनका प्रयोग समाज के संपन्न व्यक्ति या पुरोहित ही कर सकते थे पर वर्ण माल अ आविष्कार और विकास होने से यह सार्वजनिक बन गयी और शिक्षा के प्रसार में अभूतपूर्व योगदान मिला।
सिन्धु और हडप्पा की सभ्यता उजागरित होने से और वहां से प्राप्त विभिन्न लेखों से यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में भी लिपि और भाषा सम्बंधित विकास हो चुका था। जब तक यह लिपि पढ़ ली नहीं जाती है तब तक निश्चित रूप से इसके बारे में कोई कथन अहि किया जा सकता है। कई विद्वान इसे ब्राह्मी लिपि की पूर्व गामी लिपि भी मानते है। जो भी हो अभी तक इस लिपि से पर्दा नहीं उठा है परन्तु इतना निश्चित है कि सिन्धु और हडप्पा के निवासियों को लिपि ज्ञान था और उन्होंने अपनी एक भाषा भी विकसित कर रखी थी।
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विश्व इतिहास: मेघ

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Tararam Gautam