Monday, September 1, 2014

26. Nath Panth and Meghwal


नाथ पंथ और मेघवालगोरख नाथ ने नाथ पंथ चलायायह सभी जानते हैंपरन्तु यह बहुत कम लोग जानते हैं कि इन नाथों में बहुत से मेघ थे। जो नाथों से पूर्व सिद्ध परंपरा से जुड़े थे। वे बाद में या तो नाथों में मिल गए या विलीन हो गए।

इस सम्बन्ध में गुजरात के कच्छ की धिनोधर पीठ भी हैजिनका पीर कभी मेघवाल होता था। अब वो नहीं है। धिनोधर धुनी नाथों में मिल गयी। वहां का प्रमुख महंत या पुजारी पीर कहलाता था और उसके मातहत धुणियों के गादीपति आयास कहे जाते थे। जोधपुर के महामंदिर की गादी भी उसके अधीन थी। धिनोधर में जब वार नाथ गादी पर बैठा तो मेघवालों को पंथ से बाहर कर दिया। इसके सामाजिक राजनीतिक कारणों के साथ धार्मिक कारण भी थे।

यह धूनी धर्म नाथ ने थापी थी। धर्म नाथ मछेंद्र नाथ के चेले थे। गोरख नाथ भी मछेंद्र नाथ के चेले थे। मछेंद्र और जालंधर को गुरु भाई भी कहा जाता है। मछेंद्र और जालंधर बौद्धों के चौरासी सिद्धों में माने जाते हैं।

"Gorakhnath and the Kanphata Yogi" (1838) पृष्ठ 26 पर इस सन्दर्भ में लिखा है- "formerly in Kucch Dheds were admitted to the order, and one pir of the monastery was Megh nath, of that caste. However, the practice was discontinued and Meghvals, or Dheds, were denied admittance." Reference as cited above, Further, Indian antiquary, 1878 at page 10, same facts are affirmed. It writes as under:

"Formerly Meghvals, or Dheds were admitted, and one of their pir Meghnath was of this caste. The yogis of Dhinodhar are, therefore, regarded as very low, though the practice of adopting Meghwals is long since discontinued." Reference -I A, 1878, page- 10.


कच्छ में कई जगह मेघवालों के भव्य मंदिर और मठ थे।

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