Monday, September 1, 2014

36. Moolraj Solanki & Meghs as enemy


एक संस्कृत रचना हैजिसका नाम 'द्वे आश्रयःहै। यह रचना प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमाचार्य द्वारा गुजरात के प्रसिद्ध राजा सिद्ध राज और राजा कुमार पाल के शासन काल में लिखी गयी। जिसकी मृत्यु सन 1174 ईस्वी में हुई। इस ग्रन्थ में श्लोक द्वि अर्थी हैं। संस्कृत व्याकरण के साथ-साथ उनका अर्थ सोलंकी राजाओं की प्रशंसाओं से भी जुड़ा है। उन्हें दोनों ही अर्थों में लिया जा सकता है। इस ग्रन्थ पर लक्ष्मी तिलक कवि द्वारा टीका भी लिखी गयी। इसे लेसा जय द्वारा संवत् 1312 अर्थात सन 1255 में पूरा किया गया। इसकी प्रति सुरक्षित है। यह ग्रन्थ गुजरात के इतिहास की एक महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है। इसके साथ ही इस ग्रन्थ में उस समय के जन-जीवनरहन-सहनलोक-परम्पराओंआपसी संबंधों आदि पर काफी जानकारी उपलब्ध होती है।

इस ग्रन्थ का परिचय 'इंडियन एंटीक़ुएरिके मार्च 1875 के अंक के पृष्ठ 71से 77 तथा 110, 232 व 265 आदि पर दिया गया है। इसके प्रथम सर्ग के अंग्रेजी सार में बताया गया है कि इस सर्ग में अनिहल्वाडा नगर और उसके राजाओं का काव्यात्मक वर्णन है। सोलंकी राजा मूल राज के प्रसंग में उसके दोस्तों और दुश्मनों का भी जिक्र है। जिसमें 'ढेढोंको मूल राज का दुश्मन बताया गया है। उससे यह स्पष्ट होता है कि मूल राज के राज्य स्थापना से पूर्व ढेढ़ यहाँ के मूल बाशिंदे थेजिसे मूल राज ने खदेड़ बाहर किया। मुझे गुजरात के इतिहास से मालूम हुआ कि गुजरात में बहुधा मेघों को ढेढ़ कहा जाता रहा हैभले ही मेघों ने इस संबोधन को स्वीकार नहीं किया हो। अतः ये घटनाएँ मेघों के पतन की कथाओं के रूप में ही देखनी चाहिए।

मुझे न तो मूल पुस्तक पढ़ने को मिली और न उसकी टीका। अतः विस्तृत नहीं कह सकता। हालाँकि गुजरात के इतिहास का एक अन्य ग्रन्थ 'रास-मालाबहुत वर्षों पहले पढ़ा थाजिसमें भी ऐसे वृतांतों का जिक्र हैपरन्तु उस समय मेघों पर लिखने का मेरा कोई विचार नहीं था। अतः उस पर ज्यादा गौर नहीं किया। अब जब उसे पुनः पढूंगा तो वह सन्दर्भ भी आपको उपलब्ध करूँगा।

फिलहाल आप प्रथम सर्ग के सार के निम्न वाक्यों पर गौर करें-

"Mulraja was the first of Solanki race in this city.----+--He gained the title-----. To Brahmins he gave great gifts: his enemies, like, Dheds, begged outside the town--- when this Raja went out on vijayayatra he subdued the Raja of north Kosala Desh.---"


(सन्दर्भ: The Indian Antiquary, Edited by Jus. Buggess, M.R.A.S, F.R.G.S., Volume: 4, 1875, page-72.)

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