Monday, September 1, 2014

40. Meghs of J & K : Fredrick Drew's discription


(Frederic Drew की पुस्तक के पृष्ठ 55-57 तक का अनुवाद)

अंत में वे जातियाँ आती हैं जिन्हें हम अंग्रेज़ सामान्यतः हिंदुओं की 'निम्न जातियाँ' कहते हैं लेकिन ऐसा किसी हिंदू के मुँह से नहीं सुना जाताउन्हें हिंदू के तौर पर कोई मान्यता नहीं दी जातीउन्हें हिंदुओं में नीचा स्थान भी प्राप्त नहीं हैउनके नाम हैं मेघ और डूम और मेरा विचार है कि इनमें धियार नामक लोगों को भी शामिल करना चाहिए जिनका पेशा लोहा पिघलाना है और जिन्हें आमतौर पर उनके साथ ही वर्गीकृत किया जाता है.

ये कबीले आर्यों से पहले आने वाले कबीलों के वंशज हैं जो पहाड़ों पर रहने वाले थे जो हिंदुओं और आर्यों द्वारा देश पर कब्ज़ा करने के बाद दास बना लिए गए थेआवश्यक नहीं था कि वे किसी एक व्यक्ति के ही दास होंवे समुदाय के लिए निम्न (कमीनऔर गंदगी का कार्य करते थेउनकी स्थिति आज भी वैसी हैवे शहरों और गाँवों में सफाई का कार्य करते हैं*. (* मेरा विचार है कि धियारों का रोज़गार ऐसा कम है कि वे जातीय रूप से मेघों और डूमों से जुड़े हैं.) डूमों और मेघों की संख्या जम्मू में अधिक है और वे पूरे देशजो निचली पहाड़ियों और उससे आगे की ऊँची पहाड़ियोंमें बिखरे हैंवे ईँट बनानेंचारकोल बर्निंग और झाड़ू-पोंछा जैसे रोज़गार से थोड़ी कमाई कर लेते हैंइन्हें प्राधिकारियों द्वारा किसी भी समय ऐसे कार्य के लिए बुलाया जा सकता है जिसमें कोई अन्य हाथ नहीं लगाता.

केवल उनके द्वारा किए जाने वाले ऐसे श्रम की श्रेणी के कारण ही ऐसा है कि उन्हें एकदम अस्वच्छ गिना जाता हैवे जिस चीज़ को छूते हैं वह गंदी प्रदूषित हो जाती हैकोई हिंदू सपने में भी नहीं सोच सकता कि वह उनके द्वारा लाए गए ऐसे बर्तन से पानी पीएगा जिस बर्तन को एक सोंटी के किनारे पर लटका कर ही क्यों न लाया गया होजिस गलीचे पर अन्य बैठै हों वहाँ इन्हें कभी आने नहीं दिया जाता हैयदि संयोग से उन्हें कोई कागज़ देना हो तो हिंदू उस कागज़ को ज़मीन पर गिरा देगा और वहाँ से वह उसे ख़ुद ही उठाएगावह उन्हें उनके हाथ से नहीं लेगा.

मेघों और डूमों के शारीरिक गुण भी हैं जो उन्हें अन्य जातियों से अलग करते हैंउनका रंग सामान्यतः अधिक साँवला होता है जबकि इन क्षेत्रों में उनका रंग हल्का गेहुँआ होता हैइनका रंग कभी इतना साँवला भी हो सकता है जितना दिल्ली से नीचे के भारतवासियों में हैमेरा विचार है कि आम तौर पर इनके अंग छोटे होते हैं और कद भी तनिक छोटा होता हैअन्य जातियों की अपेक्षा इनके चेहरे पर कम दाढ़ी होती है और डोगरों के मुकाबले इनका चेहरा-मोहरा काफी निम्न प्रकार का हैहालाँकि इसके अपवाद हैं जिसका कारण निस्संदेह रक्तमिश्रण हैक्योंकि दिलचस्प है कि अन्य के साधारण दैनिक जीवन से इनका अलगाव उस कभी-कभार के अंतर्संबंधों को नहीं रोकता जो अन्य जातियों को आत्मसात करता है.

डूमों के मुकाबले मेघों की स्थिति कुछ वैसी है जैसे हिंदुओं में ब्राह्मणों कीउन्हें न केवल थोड़ा ऊँचा माना जाता है बल्कि उन्हें कुछ विशेष आदर के साथ देखा जाता है.

जम्मू-कश्मीर के महाराजा (गुलाब सिंहने इन निम्न जातियों की स्थिति में सुधार के लिए कार्य किया और सैंकड़ों लोगों को सिपाही के तौर पर खुदाई और खनन कार्य के लिए भर्ती कियाइन्होंने कुछ नाम कमाया हैवास्तव में युद्ध के समय ऐसा व्यवहार किया है कि उन्हें सम्मान मिला हैउच्चतर जातियों के समान ही अपने साहस का परिचय दिया है और सहनशक्ति में तो उनसे आगे निकले हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि डूगर के अधिसंख्य लोग हिंदू हैं जिनमें पुराने कबीलों के भी लोग हैं. वे किस धर्म से संबंधित हैं यह नहीं कहा जा सकता........

(From 'The Jummoo and Kashmir Territories, A Geographical Account' by Frederic Drew, 1875)




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