Monday, September 1, 2014

45. Megh : sculptures of Megh Muni in Swat valley and Gandhar


प्रोफ़ेसर अलबर्ट ग्रूनवेडेल की पुस्तक 'Handbuch' (1893) की पुस्तक का अंग्रेज़ी-भाषा में एसीगिब्सन द्वारा अनुवाद किया गया। उसका संशोधित संस्करण जेबर्गिस द्वारा 'Buddhist Art in India' के नाम से लन्दन से प्रकाशित किया। जिसमें गांधार-पुरावशेषों पर महत्वपूर्ण जानकारी संग्रहीत है। इस पुस्तक से जानकारी मिलती है कि स्वात-घाटी और गंधार क्षेत्र में बौद्ध धर्म से सम्बंधित शिल्पांकन में 'मेघकी मूर्तियों का शिल्पांकन भी बखूबी किया जाता था। लेखक ने 'मेघकी मूर्तियों के कई शिल्पांकनों का उल्लेख यत्स्तत किया है। यह ध्यान देने योग्य है कि मेघ या मेघवाल 'मेघको अपनी कौम का आदि-पुरुष मानते हैं और उसे 'मेघ रिसीया 'मेघ रिखीके नाम से सम्बोधित करते हैं। ऐतिहासिक अन्वेषण में यह भी स्पष्ट हो चुका है कि प्राचीन काल में मेघों की यहाँ सघन बस्तियां और आधिपत्य था। आज भी इस क्षेत्र के आस-पास इनकी बसावट मिलती है। दूसरागुर्जर या गूजर लोग भी मेघ की पूजा करते थे। उनके आराध्य स्थलों के पुजारी मेघ ही होते थे। विगत कुछ वर्षों तक गूजर नवजात के जन्म पर आवश्यक रूप से 'मेघकी मेघ-बाबा के नाम से पूजा करने में सन्नद्ध रहे हैं। आजकल उसका स्थान नवोदित देव 'देव नारायणलेते हुए देखे जा सकते हैं।
खैरऐतिहासिक सच्चाई जो भी होयहाँ उस पुस्तक से एक उद्धरण का मूल-पाठ जानकारी व अन्वेषण हेतु दिया जा रहा है:
"Among the Jatakas representations, perhaps the favorite is that of Sumedha or "Megha", who lived in the age of Dipankar Buddha, the twenty forth predecessor of Gautama. The legend tells how "Megha", the disciple of Ratna (i.e. of Maitreya Boddhisattava in a previous birth), obtains from Buddha, a water girl, some stakes of the Utpala flower or blue lotus, she has secured to present to Dipankara; these he throws into the air over the Buddha's head, and then places his deer-skin covering in a muddy place, unrolling his long hair for Dipankara to pass over, and so obtains his wish- that in a future age he shall be Sakya Muni, and in intermediate births Bhadra shall be his wife. "Megha" then ascended into the air and did reverence to Buddha. In two sculptures, one in the British Museum (17 inches by 16) and the other at Lahore, we have most of the details. In the first, "Megha" or Sumedha is represented a second time, on a plaque in the air, worshipping the Buddha. Among the Mahayana sculptures in Kanheri caves also, we find the same scene represented (ill.95), Bhadra with her lota and flowers; Sumedha throwing his flowers up, which remain in air over Dipankara; and then prostrating himself with his jata unrolled at the feet of the Buddha."
(Fn-1: Conf. Arch. Sur. W. India vol.4, p66; for the story see vol.6 (1873), pp385ff. The southern version is given by Rhys Davids, Budd. Birth Stories, pp8-28, where the future Buddha is called Sumedha. For other examples, in culcutta and Lahore museums, see Ind. Monts. Plates-101, 114(G), 140 and 147; Journal of Ind. Art, and c. Vol. 8, pl.11, figs. 1, 2, and p.36)
Reference already cited.
यह द्रष्टव्य है कि कई शताब्दियों पूर्व बौद्ध धर्म वहां से लुप्त हो गया। अतः समय के साथ जब विध्वंस हुआ तो कई शिल्पांकन और मूर्तियाँ खंडित कर दी गयीं या मिटटी में मिला दी गयीं। कईयों के रूप और रंग बदल दिए गए और नयी अवधारणाओं और व्याख्याओं के साथ समायोजित कर दी गयी। इनको मानने वाली परम्पराओं के लोग इधर-उधर हो गए तो उनकी सुरक्षा व संरक्षण नहीं हो सका। जो मूर्तियाँ काल के ग्रास से बच गयींउनकी निरंतरता और तारतम्यता बिठाने में विद्वानों को कठिनाई आना स्वाभाविक है। उन्हें गहराई से अन्वेषित करते हुए साधारण धारणा से ही जाना जा सकता है। जो मूर्तियाँ काल के ग्रास से बच गयींउन पर उत्कीर्ण अक्षरों की लिपि और भाषा तथा उन पर अंकित तिथियों से ही कुछ पता लगाया जा सकता हैपरन्तु वे भी पर्याप्त नहीं है और न ही तिथियों की सुनिश्चित या सुनियोजित क्रमिकता ही स्पष्ट होती है। फिर भीवे एक निरंतर परंपरा की उपस्थिति का गहरा आभास कराती हैं।

कुछ वर्षों पूर्व मेघवंशी रामचंद्र कडेला ने इस सन्दर्भ में मेघवालों के महाधर्म में प्रचलित श्रुति परंपरा में गेय 'मेघड़ी-प्रमाणनामक वाणी को मेरे सामने रखा था। उस वाणी या श्रुति में 'मेघके अवतरण की जो कल्पनीय वर्णन किया गया हैउसकी काफी-कुछ सादृश्यता इससे मिलती है। इस दृष्टि से यह शोध का विषय हो सकता है। दूसरामेरी दृष्टि में 'मेघड़ी-प्रमाणमहायान में प्रचलित 'प्रज्ञा-प्रमाणया 'ज्ञान-प्रमाणका ही विखंडित रूप है। 'मेघड़ीका अर्थ बुद्धि या प्रज्ञा लेने पर और निकलंक आदि को 'मेघया सुमेध में रूपांतरित करने पर पूरी वाणी का भावार्थ महायान के अर्थावरण में संज्ञेय किया जा सकता है। ---

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  1. 45. Megh : sculptures of Megh Muni in Swat valley and Gandhar-

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