Monday, September 1, 2014

46. Megh : A wandering fellow is dhedh


यह कौतुहल पूर्ण तथ्य है कि 13वीं से 15वीं शताब्दी में दर-दर घूमने वाले निवृत्तिमार्गी लोगों को 'ढेढ़शब्द से संबोधित किया जाता था। स्पष्टतः वे न तो हिन्दू धर्मावलम्बी थे और न मुसलमान। उनकी पहुँच दोनों में थी। राजस्थान के रेगिस्तान से कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों से लेकर पर्शिया तक उनका विचरण क्षेत्र था। उनकी अनुयायी अधिकांशतः निम्नवर्गीय जनता थी। धीरे-धीरे यह 'ढेढ़शब्द एक जाति विशेष के लिए प्रयुक्त होने लगा। कई ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्यों से विदित होता है कि गुजरातराजस्थानमहाराष्ट्र और अन्य कई प्रदेशों में जहाँ मेघ लोग थेउनके संबोधन हेतु यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। ध्यातव्य विषय यह है कि जिन दरवेशों या संतों के सम्बोधानार्थ 'ढेढ़शब्द प्रयुक्त हुआ हैक्या वे मेघ जाति से थेइस बारे में जो थोड़ा-बहुत विवरण मिलता हैवह संदेह से परे नहीं है। जब इन निवृत्तिमार्गी संतों का प्रेय और श्रेय बढ़ गया तो उन पर हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपना समान दावा किया। उन्हें उन रंगों मे रंगने के साहित्यिक प्रयास होने लगे। ये लोग अधिकांशतः मेघ समाज से ही थे और उस समय तक मेघों का जातीय संस्तरण में स्थान तय नहीं हुआ था या अधम स्तर नहीं हुआ था।
कश्मीर की लल्ला ढेढ़रूप भवानी ढेढ़जमना ढेढ़ और नन्द रिखी आदि कई नाम गिनाये जा सकते हैं। ये लोग खुद भी अपने को कहीं-कहीं रिखी और कहीं-कहीं ढेड कहते हैं। मुसलमानों के बीच मुसलमानी नाम और हिन्दुओं के बीच हिन्दू नाम से जाने जाते थे। इस प्रकार कश्मीर में साहित्यिक साक्ष्यों में ढेढ़ या ढेड शब्द 14वीं शताब्दी में पाया जाना स्पष्ट होता है क्योंकि लल्ला ढेड और नन्द रिखी/नन्द ढेढ़ या नूर दीन आदि की तिथियों पर काफी कुछ उहा-पोह हो चुका है एवं उन्हें 13वीं-14वीं शताब्दी के मध्य रखने के प्रयास इस बात को प्रमाणित करते हैं।

(Reference: देखें, Indian Antiquary, vol.2, 1921 pages 302, 313 and c.)


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