Monday, September 1, 2014

47. Megh of Marwar : some of their peculiar beliefs


मारवाड़ के मेघों में व्याप्त कुछ निषेध या ऐब और विश्वास-
रंग-
बुरी नजर या बुरी आत्माओं से बचाव के लिए विभिन्न अवसरों पर ये लोग विभिन्न रंगों का प्रयोग करते हुए देखे गए हैं। उनमें पीले रंग की महत्ता शादी-ब्याह में दिखती है। वर-वधु के हल्दी से पीले हाथ करनाशादी के पल्ले-बंधने को पीला करनाउबटन में हल्दी और तेल को मिलाकर मालिश करनाउसमें कपडे के किनारे को बुरी चीज से बचाने के लिए भिगोना और प्रयुक्त करना। पवरी के वस्त्र को पीला करना/होना आदि इस समाज के शादी के उपक्रम के विशेष ऐब या निषेध हैं। नवजात के सिर पर काले रंग या काजल से टीकी लगाना या चाँद-तारे की आकृति बनाना आदि कई उपक्रम उनके इस सम्बन्ध में ऐब या निषेधों को व्यक्त करते हैं।
दूब घास-
मृत्यु के उपक्रमों में दूब घास का प्रयोग तीये यानि तीसरे दिन के क्रिया-कलापों और ग्यारहवें दिन के क्रियाकर्म में तृण-संस्तरण के रूप में करते हैं।
गोदना-
अभी तो यह ऐब नहीं हैपर विगत समय में मेघ महिला एवं पुरुष अपने हाथों पर और पैर आदि पर गोदना गोदाने का भी ऐब रखते थे। औरतों को वादी औरतें गोदना गोदती थीं। कई बार वे घूमते हुए उन घरों में इच्छुक महिलाओं के आकर्षक गोदने गोद देती थींकई बार मेले और उत्सवों के अवसर पर ऐसा किया जाता था। उकेरी जाने वाली आकृतियों में पगलियाबिना सवार का घोडाबिच्छुपनिहारी आदि विशेष होते थे।
पानी और पानी के बर्तन-
किसी के घर पर मृत्यु हो जाने पर अर्थी उठाने के बाद घर के पानी के बर्तनों में रखे सारे पानी को गिरा देते हैं एवं दूसरे बर्तन रखकर दूसरा पानी भरते हैं। घर के पूरे आँगन को लीपा जाता है। अंतिम दिन तक झाड़ू या बुहारी से आँगन साफ नहीं करतेबल्कि टाट आदि के कपडे से आँगन को बुहारते हैं।
पानी को सबसे पवित्र माना जाता है। जन्म पर बच्चे का नहावनतीन दिन बाद प्रसूता का नहावनशादी का नहावन व मृत्यु पर नहावन आदि आवश्यक है। तीन नहावनजन्मशादी और मृत्यु के कहलाते हैं। प्रसूता का नहावन कुछ विशिष्ठ क्रियाक्रमों के साथ किया जाता है। जिसमें अनाज और पीपल/नीम की पत्तियांकलश आदि का प्रयोग करते हैं। पूजा के समय बच्चे को थोडा ऊपर उछालते हैं। कांसे की थाली आदि बजाते हैं ताकि बुरे का असर नहीं हो। अग्नि में तिल या सरसों भी डालते हैं।
वर-वधु के गृह-प्रवेश पर या अतिथि के गृह-प्रवेश पर पानी से वारणा करते है। पीले किये हुए चावल भी उनके ऊपर से फेंकते हैं।
थूक-
किसी बुरे या बुरी नज़र वाले के जाने के बाद उसके पीछे तीन बार थूकने से उस बला का टलना मानते हैं। कभी-कभी किसी की आँखें थक जाती हैं तो उस पर ऐसी औरत का थूक पलकों पर लगाते हैं जिसके दो पुत्र हों यानि पुत्रवती हो और अब सन्तति बंद हो गयी हो। ज्यादा आँख फड़कने पर भी पलक पर थूक लगाते हैं। नवजात से मिलने पर नवजात को नजर नहीं लगेइस हेतु मिलने आने वाले लोग उस पर थो-थो करके थूकने का उपक्रम करते हैं। आकाश में तारा टूटने पर भी थो-थो करके तीन बार थूकने का उपक्रम करते हैं। इसे वे थुथकि देना कहते हैं। बुरी नजर लगने वाले पर मिर्ची और नमक अवार कर आग में डालते हैं और उस पर थूकने का उपक्रम करते हैं। कई बार छोटे-मोटे घाव पर भी थूक लगाते हैं। कु्त्ते के कान फड़फड़ाने पर भी थूकते हैं।
लूण या नमक-
नजर लगने पर नमक को अवार कर फेंकते हैं। रात्रि को हाथ में पकड़ कर दूसरे को नहीं देते।
दूध या मक्खन-
मक्खन और दूध को पवित्र या पुण्य कार्यों हेतु प्रयोग में लेते हैं। गाय के छाणों का ही धूपिया करते हैं अर्थात धूप खेने के लिए प्रयुक्त आग गाय के छाणों या ठेपडियों से ही की जाती है। चाहे वह शादी-ब्याह के अवसर का धूप हो या देवी-देवता का। मृत्यु के अवसर पर गाय के गोबर और मिट्टी से आँगन को लीपते हैं। जिसे चौका देना भी कहते हैं। देहावसान के बाद टोघडी के मूत्र का छाँटा देते हैं।
बाजरी या अनाज का अवारना-
मृत्यु पर अनाज के पेटिये दिए जाते हैं। मृतक पर बाजरी अवार कर फेंकते हैं। आटे के चार गोले बनाकर चारों दिशाओं में फेंकते हैं।
लोहा,सोना,चांदी-
इन धातुओं का प्रयोग भी बुरी आत्माओं से बचने के लिए भी करते हैं। मादलिए बनाकर बुरे से बचने के लिए हाथ में या गले में पहनते हैं।

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