Monday, September 1, 2014

49. Megh : Marwari is Pali, dialect of Meghs. Nomenclature from Mhar (megh)


यह तथ्य कई साक्ष्यों से साबित हो चुका है कि वर्तमान राजस्थान के कई भूभागों पर राजपूतों के आधिपत्य से पूर्व म्हारों और मेघों का आधिपत्य था। वे नागवंश से सम्बंधित रहे हैंयह बात भी साबित हो चुकी है। अब उन प्राचीन राजे-महाराजाओं को राजपूत बिरादरी में घसीटना विकृत इतिहास वृत्ति है। सिंध प्रदेशमेरवाड़ा (अजमेरप्रदेश व म्हारवाड़ (वर्तमान प्रचलित नाम मारवाड़आदि की प्राचीन भाषा व कला-संस्कृति मेघों से न केवल घनिष्ट रूप से जुड़ी हुई हैबल्कि उन्हीं से उद्भूत है। उनके आधिपत्य और सघन बस्तियों के कारण ही इस क्षेत्र का नाम म्हारवाड़ अर्थात मारवाड़ पड़ा। उनकी विशेष तरह की भाषाजो पालि भाषा मे मिलती हैउनके नाम से प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार इस क्षेत्र और इनकी भाषा दोनों का नामकरण उनके कारण ही पड़ा। ऐसे तथ्यों का उद्घाटन कई विद्वानों ने किया हैजो युक्तिसंगत व सत्य प्रतीत होता है। तकरीबन 18वीं-19वीं शताब्दी में यहाँ के मेघवालों के लिए एक अन्य सम्बोधानार्थ शब्द ढेड भी प्रयुक्त होने लगा। उनका उल्लेख इस शब्द से किया जाने लगा।
एशिया की जातीयता पर 19वीं शताब्दी के मध्य में लाथम महोदय ने विवरणात्मक पुस्तकें लिखीं। जिनका पहले उल्लेख किया जा चुका है। यहाँ पर यह तथ्य ध्यातव्य है कि मेघों की भाषा ही मारवाड़ी भाषा कही जाती थीअब भले ही उसे सभी की बोली कहा जाता हो। बाद में आये राजपूतों आदि राजे-महाराजाओं ने खुद की भाषा को अलग बताने या अलग करने के लिए उसे डिंगल आदि नाम दिया।
निम्न उद्धरण देखें-
"The sindhi form of speech fall into dialect---- while Kutch dialect has Gujarati elements, and third dialect, belonging to Thull, or Desert, and spoken as far as Jessulmir, has borrowed from, or given to, the Marwar. It is the language of Shikari and Dhedhs, who are said to have their own peculiar Scriptures called Pali, written in a peculiar character."
(Reference: Descriptive Ethnology, vol.2, pages-373-373.)



यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि मेघों की न केवल अपनी भाषा थीबल्कि उनके अपने ग्रन्थ अर्थात साहित्य भी था।

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