Monday, September 1, 2014

51. Megh : Dharmnath & Dhanodhar & Megh nath of kathiawar


ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में सिंध से कई मेघ लोग काठियावाड़ और कच्छ में आकर बस गए। मेघों में कई लोग निवृत्तिमार्गी और साधना प्रवृत होने के कारण वे तपस्या हेतु सुनसान जगह की तलाश में भी इन क्षेत्रों में आकर साधना प्रवृत्त हुए और यहाँ अपनी धूणी या गादी स्थापित की। जिनमें पेशावर के धर्मनाथ की धीणोंधर धूणी प्रमुख है। मेघों की परंपरा उन्हें अपनी जमात का मानती है। परन्तु उनकी अभिज्ञात जाति के बारे मे स्पष्ट रूप से ऐतिहासिक जानकारी अत्यल्प है।

मेघ परंपरा उन्हें महाधर्म का सिद्ध मानती है एवं मछेन्द्र का चेला मानती है। उनकी परंपरा गोरख नाथ को धर्म नाथ का गुरु भाई मनाई है। सत्य जो भी हो। धीनो धर की धूणी गोरखनाथ के पंथ में मिल गयी परन्तु मेघों की सामाजिक पदावनति के साथ उसका भी स्थान कमतर माना जाने लगा। धर्मनाथ का दूसरा नाम धुजणी नाथ भी बताया जाता है। यह नाम कठोर तप-पालन के कारण पड़ा। उनके चेले गरीबनाथ हुए। गरीबनाथ से लेकर मेघ नाथ तक धूणी के पीर मेघों में से ही होते थे। धीरे धीरे यह गादी रेबारी जाति के पीर के पास गयी और मेघों से दूसरी जाति में चली गयी। सन 1827 में बर्गीज महोदय ने वहां का पुरातात्विक सर्वे किया। जिसमें प्राचीन इतिहास और प्राचीन अवशेषों का वर्णन है। उसमें से एक पैरा इस सन्दर्भ में उल्लेखित है-

Their tenets appear to be those of the yoga (योग), or abstract devotion practised by the yogis of the Nath (नाथ) sect, in which Dharmanath (धर्मनाथ) and Garibanath were well versed; but the pirs of Dhinodhar, except the first two or three, were ignorant of their tenets. They themselves, being generally converts from the shepherd* tribe, are quite illiterate and ignorant, and know nothing but the name of Dada. They worship Siva, and follow the ritual of the Mata, whose stot'ra the pir repeats on the 2nd of every month. They are vowed to celibacy, and allow no woman to enter their precincts. I could find no works written by them like those of the Naths of the North and the Dekhan. Their great aim appears originally to have been to feed suffering humanity, without distinction of caste or creed for which they had obtained from the former Raos and others, villages and lands. In this respect they resemble the humane order of St. Bernard, in Europe, and are regular hospitallers. But, after obtaining the grants, they gradually lost their character as disintrested yogis, and brought upon themselves as it were, the worldy cares which they had renounced* 

*Formerly Meghavals or were admitted, and one of their pi'rs, Megh Nath, was of this caste. The yogis of Dhinodhar are, therefore, regarded as very low, though the practice of adopting Meghavals is long since discontinued.

(Reference: Report on the Architectural and Archaeological Remains in the Province of Kachh By: Dalpatram Pranjivan Khakhar, Sir Alexander Burnes and James Burgess, Govt press, 1874, page 10-11.)



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