Monday, September 1, 2014

55. Megh : Lalla dhedh- wandering lady devotee of Megh community

लल्ला ढेढ़/लाल ढेढ़/लालेश्वरी
एक पोस्ट में मैंने लला ढेढ़ का जिक्र किया था। कुछ लोगों ने इस बारे में जानकारी चाही थी। संक्षिप्त में रख रहा हूँ.-

मेरी जानकारी के अनुसार लल्ला ढेढ़ या लालेश्वरी कश्मीर की रहने थी। वह ढेढ़ जाति की थी। जिसमें कश्मीर की मेघमेहतर आदि जातियां गिनी जाती थीं। एक तो उसके सम्बोधनार्थ शब्द से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह निम्न जाति की थी। दूसराउसके जो उपलब्ध 'पदया रचनाएँ हैंउनमें अधिकांशतः जुलाहों के क्रिया-कलापों के संकेत या उदाहरणों को प्रस्तुत किया गया है। ऐसे कई साक्ष्यों के आधार पर वह 'मेघमहिला ही ठहरती है। हालाँकि जब अंग्रेजों ने उसके पदों को छपाया तो उसका महत्त्व बढ़ता हुआ देख ब्राह्मणों ने उसे ब्राह्मण बनाने में कोई कोर-कसर नहीं रखीपरन्तु हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि उस समय तक कश्मीर के मेघ अपने को ब्राह्मण जमात का ही मानते थे और ब्राह्मण उन्हें हीन या ढेढ़। इस बात का फायदा उठाते हुए चालाक ब्राहमणों ने उसे ब्राह्मण साबित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। उसकी कल्पित जीवनी और कथाएं गढ़ ली गयीं। परन्तु संतों पर महत्वपूर्ण शोध करने वाले परशुराम चतुर्वेदी उन्हें ढेढ़ जाति की ही मानते हैं। (देखेंपृष्ठ-101) वे लिखते हैं- "लला या लाल कश्मीर की रहने वाली एक ढेढ़ वा मेहतर जाति की स्त्री थी जो सामाजिक दृष्टि से निम्नस्तर की होकर भी बहुत उच्च विचार रखती थी---इसका समय ईसा की चौहदवीं शताब्दी---का था।"

वे आगे लिखते हैं- "---और इसकी कविताओं में कबीर साहब की भांति जुलाहों में प्रचलित पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग भी प्रचुर परिमाण में मिलते हैं।" (पृष्ठ-102-103)

इसके पदों या कविताओं को डॉगियर्सन व डॉ बर्नेट ने 'लल्ला वाक्यानिके नाम से प्रकाशित किया था। जिसका संस्कृत अनुवाद भी किसी ब्राह्मण पंडित ने किया। लला ढेढ़ और कबीर साहब के कई पदों का तुलनात्मक विश्लेषण भी डॉगियर्सन ने करते हुए बताया कि लल्ला ढेढ़ से कबीर साहब बहुत प्रभावित थे।

यह जानकारी मिली है कि वर्तमान में कश्मीर में लल्ला ढेढ़ के नाम से वहां के ब्राह्मण बिरादरी द्वारा कोई कॉलेज भी चालू किया है।

बात यह है कि जब कोई किसी भी स्तर पर ऊपर उठ जाता है तो उसे ब्राह्मण या क्षत्रिय घोषित कर दिया जाता है। इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है। जो ब्राह्मण वाद की धूल उन पर पड़ी हैउसे हटाना चाहिए।----

(संदर्भित पुस्तक उत्तरी भारत की संत परंपरालेखकपरशुराम चतुर्वेदीप्रयागप्रकाशन वर्ष संवत् 2008)



मेरे नोट्स :- कबीर के बारे में भी यह कहा जाता है कि वे किसी विधवा ब्राह्मणी की संतान थेऐसे ही कबीर को रामानंद नाम के ब्राह्मण का शिष्य बताया गया जिसे अन्य शोधों ने गलत प्रमाणित किया है. कबीर ने कहा है कि 'कबीरा ता गुरु पाया जा का नाम विवेक'. ऐसा प्रतीत होता है कि कबीर के नाम से मंदिर बनाने के लिए ही ब्राह्मणों ने ऐसा प्रचार कियामंदिरों का बिज़नेस या शिक्षा का व्यापार करने वाले ब्राह्मण ऐसा करते रहे हैं इसका लंबा इतिहास हैभारत भूषण भगत

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