Tuesday, December 22, 2015

141. गुजराँवाला और मेघ

यह माना जाता है कि भारत से विभिन्न लोगों ने आव्रजन कर के लिए इस जिले को आबाद किया है।  यहां कृषि जनजातियां बहुत हैं, उनमें मेंघ भी एक प्रमुख जाति है, जो राजपूत मूल का दावा करती है, ये अपने को अपने मूल परिवार की बड़ी  शाखा का हिस्सा मानते है ,जिसे लाहौर, सियालकोट और अमृतसर के आसपास के जिलों में स्थित बताते है। अर्थात वर्तमान पाकिस्तान अ भारत अधीन पंजाब और राजस्थान व गुजरात आदि जगहों को ये अपना मूल वतन बताते है। विरक, वेरयच, हजरा, बावरा, चीमा, जोया या जुहिया, भाटी और पंवार आदि कई मेंघ उप जातियां,( virak, Varaich, Hanjra, Bavra,  chima, joya or juhiya, bhatti and panwar and other Megh tribes.) अपनी उत्पति राजपूतों से मानती है। हालाँकि यह उनके दिमागों वशीभूत है, फिर भी उनका राजपूतों से किसी प्रकार का कोई रोटी-बेटी का संबंध नही होता है।
    अब जो अपनी उत्पति राजपूत मूल से बताते है, वह ठीक वैसी ही दर्शाते है, जैसी कि इन उप जाति नामों को धारण करने वाली राजपूत जातियां बताती है। इन उप जाति नामों को धारण करने वाले मुसलमान और हिन्दू दोनों है। हिन्दओं में मेघ और राजपूत, जाट आदि अनेक है।अतः उस को यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। किसी दूसरी पोस्ट में इसका विश्लेषण और विवेचन किया जायेगा।
  चीमा अपने को पृथ्वी राज चौहान का वंशज और चौहान मानते है। जो दिल्ली से यहाँ आना बताते है। कई लोग मुस्लमान बन गए। जो बचे वे हैसियत और औहदे से जाति निर्धारित होने पर विभिन्न जातियों में खप गए!
       वराइच/वेराइस/बिराईस आदि.... स्थान और बोलीगत भेद से अलग अलग उच्चारण मात्र है, मूलतः एक ही खांप या शाखा है। ये अपने को सूरजवंशी मानते है, जैसा कि इस नाम की राजपूत उपजाति अपने को मानती है। इनका मानना है कि उनका एक पूर्वज जो राजपूत था, गजनी से पंजाब में आया था, जो पहले पहल गुजरात जिले में बसा। उसके 9 पीढ़ी  बाद देवीदास ने चेनाब नदी पार की और एक गांव बसाया। उसके आस पास ही इनकी बढ़ोतरी होती गयी और गुजरावाला में फ़ैल गए। इन में से भी कई मुस्लमान बन गए और कई हिन्दू, जिसमें मेघ व राजपूत आदि है।
         विरक/विर्क/बिरक आदि नाम धारी....ये भी अपने को राजपूत मानते है और विरक नामधारी राजपूत से अपना निकास बताते है। उनका मनना है कि जम्मू के परघोवाल पहाड़ों से उदरसेन अमृतसर आया और किसी जमींदार की बेटी से शादी की और यहीं बस गया। जिसके तीन पुत्र थे- दृगर,विरक और वरन् । विरक की संतान ही विरक/बिरक कहलायी। ये भी मुस्लमान और हिन्दू दोनों में बँट गए। हिंदुओं में मेघ, जाट और राजपूत आदि में खप गए।
      भाटी या भाटिया अपनी निकास भटनेर से बताते है।
इस प्रकार से गुजराँवाला के मेघ भी अपनी उत्पति अन्य मेघों की तरह राजपूतों से बताते है.....

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