Tuesday, December 20, 2016

158. अपने इतिहास को जानो - देसूरी - घानेराव 03 जनवरी 2017

मेघवाल :
जागो ! उठो !! आगे बढ़ो !!!
(श्री मारवाड़ मेघवाल सेवा संसथान, शाखा- देसूरी के घानेराव में दिनांक 03 जनवरी 2017 तैयार किया गया उद्बोधन)
-ताराराम

हम लोग यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसर पर एकत्रित हुए है। इस अवसर पर हमें हमारे मुक्तिदाता परम पूज्य बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के पौत्र बाला साहेब एडवोकेट प्रकाशराव आंबेडकर जी का सानिध्य प्राप्त हुआ, यह हम सबके लिए प्रेरणा और उत्साह का एक ऐतिहासिक और सुखद क्षण है। हम उनका मारवाड़ की इस ‘मेघ-भूमि’ पर बारम्बार अभिनन्दन करते है एवं आभार व्यक्त करते है कि आपने अपने व्यस्ततम कार्यक्रम में से कुछ बहुमूल्य समय हम लोगों को देकर हम सबको एक नई स्फूर्ति, ओज और उर्जा प्रदान की है। हम सभी आपके कृतज्ञ है। मैं इस मंच पर विराजमान सभी महानुभावों का और आप सबका, जो दूर-नजदीक, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस कार्यक्रम से जुड़े है, उन सबका भी आभार व्यक्त हूँ कि इस महा-संगति में आपने मुझे भी याद किया और अपने विचार रखने का सुअवसर दिया। मैं व्यक्तिगतरूप से पूर्व मंत्री श्री अचलाराम जी मेघवाल साहब का और ‘श्री मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान’ के सभी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और आयोजकों का भी आभारी हूँ कि वे मुझे इस कार्यक्रम में सरीक होने के लिए बार-बार प्रेरित करते रहे।

आज का यह दिन एक ऐतिहासिक दिन है। मुझे ऐसी जानकारी है कि बाबा साहेब डॉ आंबेडकर का राजस्थान में आने का कोई कार्यक्रम बन रहा था, परन्तु उनका यहाँ आने का योग नहीं बना। एक लम्बे अन्तराल के बाद आज उनके पौत्र हमारे बीच में है तो हमारी ख़ुशी और गौरव को चार चाँद लग गए है। मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि जोधपुर के ‘प्राच्य-विद्या प्रतिष्ठान’ में बाबा साहेब का एक पत्र भी सुरक्षित है। लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल में कई मेघ लोग सक्रीय थे, जिनके निमंत्रण पर बाबा साहेब को वहां जाना था। परन्तु, अंतिम समय में आर्य-समाज के इस अनुसंगी संगठन ने वह कार्यक्रम रद्द कर दिया। इस बारे में आप सभी जानते है, मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है। उसी अवसर पर बाबा साहेब की अमूल्य कृति ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ की रचना हुई। जिसका प्रथम अनुवाद संतराम, बी.. ने किया, वे भी मेघ समाज से हो थे। सन 1932 में बाल-पखड़ी में बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने मेघवालों की एक जंगी सभा को भी संबोधित किया और आज इस अवसर पर हमें उनके पौत्र बाला साहेब प्रकाश राव आंबेडकर जी संबोधित करने वाले है। हम लोग उनको सुने, उनके निर्देश में समाज को एक गति दें। हमारा समाज बाबा साहेब के मार्ग-निर्देशन में चलता रहा है और विश्वास है कि यह समाज आगे भी उस रास्ते पर चलकर प्रगति को प्राप्त करेगा।

किसी समय मारवाड़ और महाराष्ट्र एक ही हुआ करता था और यह ध्यान देने वाली बात है कि इस क्षेत्र का नाम ‘मारवाड़’ और इस से इतर प्रदेश का नाम महाराष्ट्र इन जगहों पर निवास करने वाले एक ही तरह के ‘म्हार’ वा ‘मेग’ लोगों के कारण पड़ा था। कोल-द्रविड़ मूल के ‘मेग’ शब्द के अर्थ जूना, पुराना, प्राचीन, फेलना या पसारना, बादल, मुख्य या प्रमुख आदि कई होते है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ‘महार’ और ‘मेग’ शब्द की व्युत्त्पति धातु भी एक ही है। म्हारवाड से मारवाड़ और महार-रटठ से महाराष्ट्र शब्द बना। वाड का अर्थ जगह, घेरा या वाड़ से है और रटठ का अर्थ राष्ट्र से है। स्पष्ट यह है कि यह भूमि मेघों और महारों की भूमि रही है; ऐसा इसके प्राचीन इतिहास से ज्ञात होता है। इनसे जुडा हुआ मालवा और मालानी भी ‘मल्ल’ लोगों का निवास होने के कारण मालवा और मालानी कहलाया। ये सब तथ्य आज जिस संगठन के बैनर-तले यह कार्यक्रम हो रहा है, उसके लिहाज से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मारवाड़ की ‘मेघ’ जाति की उत्पत्ति’ और महाराष्ट्र की ‘म्हार’ नामधारी जाति की उत्त्पति एक ही प्रजाति से हुई है। मल्ल, मेग, म्हार आदि भारत के प्राचीन और मूल वाशिंदे है। इस में अब कोई संशय नहीं रह गया है और वे कोल-द्रविड़ मूल के है। सिन्धु-घाटी की प्राचीन सभ्यता के सृजनहारों में कईं इतिहासकारों ने ‘मेगों’ का उल्लेख किया है और हमारा जो यह प्रदेश है, वह किसी समय सिंध का ही एक हिस्सा था। इसलिए यहाँ निवास करने वाले आज के ‘मेग’ और प्राचीन काल के ‘मेग’ एक ही परंपरा और एक ही प्रजाति के है, इसमें भी कोई संदेह नहीं रह जाता है। सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के आस-पास बसने वाले मेगों का उल्लेख महाभारत आदि ग्रंथों में मद्र और मल्ल के रूप में और कहीं-कहीं बाह्लिक के रूप में हुआ है। विश्व-इतिहास में इन्हें ‘मेडीटेरियन’ के रूप में भी रखा है और आस्ट्रिक प्रजाति के साथ वर्णन किया गया है। आज तक की उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट हुआ है कि ये प्रजातिगत रूप से कोल-द्रविड़ मूल के मंगोलियन प्रजाति से निकली हुई जातियां है, जो भारत में वैदिक आर्यों के आक्रमण से पहले यहाँ बस चुकी थी। वैदिक आर्यों के और यहाँ की मेघ आदि जातियों के बीच 500 वर्ष तक लम्बा संघर्ष चला। समय बीतते-बीतते वैदिक-आर्य सरस्वती नदी के आस-पास बस गए और उस भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया, जिसे उन्होनें आर्यावृत कहा। मेघ लोग सतलज, जिसका पुराना नाम ‘मेगाद्रु’ था उसके आस-पास व चेनाब या चंद्रभागा और सिन्धु की अन्य सहायक नदियों के आस-पास बस गए। आर्यों के बाद तूरानी, अरब, मंगोल, शक, हुण और सीथियन आदि लोगों और प्रजातियों के आक्रमण भी हुए। आर्य लोग सरस्वती से विन्ध्य पर्वत तक विस्तृत हुए, जिसे उन्होंने ब्रह्मवृत्त नाम दिया।उसके आगे वे नहीं जा सके और गंगा नदी व गांगेय-तटों को अपनी आवास भूमि बनाया। मेग आदि कोल-द्रविड़ मूल की जातियां हिमालय के तलहटी-मैदानों की ओर विस्तृत होती गयी और सिन्धु से लेकर मेघना व ब्रहमपुत्र नदी तक निवासित हुए.

अजमेर, पाली, नागौर, जोधपुर और बाड़मेर होते हुए कच्छ में जाकर अरब सागर में मिलने वाली लूनी नदी सिन्धु नदी की सहायक नदी थी। मेग लोग प्राचीन काल में इन क्षेत्रों में भी आकर बस गए। आपके क्षेत्र में बहने वाली गुहिया, खारी, बांडी, मिठडी, सुकडी आदि नदियाँ भी अपने-अपने उद्गम से निकल कर आगे जाकर इसी लूनी नदी में मिल जाती है और आप देखेंगे कि इन क्षेत्रों में आज भी मेघों की सघन बस्तियां है। विभिन्न आपदाओं और संघर्षो की बदौलत वे नदियों के आस-पास अवस्थित पर्वतों में भी बसने लगे, जिसे उस समय कि सिंध प्रदेश की भाषा में ‘कोह’ कहा जाता था। सिकंदर के आक्रमण से पहले फ़ारस के राजा का विस्तृत साम्राज्य था। उसके समय और उसके बाद सिकंदर के समय यहाँ पर मेगों और उनकी समकक्ष जातियों का राज था, जिनसे सिकंदर का मुकाबला हुआ। विश्व-इतिहास में सिन्धु से लेकर सीरिया तक राज करने वाले ‘मेग’ उपाधि-धारी राजाओं का वर्णन भी मिलता है। जनरल कन्निंघम महोदय ने मेघों और तक्षशिला के तक्षकों को एक ही माना है। इस प्रकार से ये प्राचीन नाग-वंश से सम्बन्धित होते है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सिंध-गंधार में मल्ल वा मेग लोगों को अपना राजनयिक बनाया था और वे उसके क्षत्रप थे। प्राचीन इतिहास से हमें यह ज्ञात होता है कि इस जाति का गंधार, सिंध, सौराष्ट्र, मल्ल या मारवाड़ आदि प्रदेशों में आधिपत्य रहा है और समय समय पर इन क्षेत्रों में उनका आव्रजन और प्रव्रजन भी होता रहा है। इसका तात्पर्य यह है कि मेग लोग मारवाड़ में निवास करने वाली एक प्राचीन जाति है। इस जाति के यहाँ पर बाहुल्य से निवास करने के कारण ही इस क्षेत्र का नामकरण ‘मारवाड़’ हुआ। संस्कृत में मार शब्द नहीं मिलता है, परन्तु पाली साहित्य में मार शब्द एक मनोवृति के रूप में उपलब्ध होता है।

साफ बात यह है कि इतिहास के अन्वेषण से जो नए-नए तथ्य उजागर हो रहे है, वे सब अन्वेषण इस तथ्य को पुष्ट करते है कि किसी समय में इन भू-भागों पर महारों, मेघों और मल्लों का अधिकार और शासन था। वे सब एक ही परिवार या एक ही कबीले के सदस्य थे, परन्तु उस इतिहास को बाद में आने वाली बर्बर जातियों ने खुर्द-बुर्द कर दिया और हम लोगों को, जो इस भूमि के मालिक थे, उन्हें ‘हैठियाल’ बना दिया। हमारे सोचने-समझने की ताकत को उन्होंने शिक्षा और सम्पति से वंचित कर कुंद कर दिया। हम उनके कहे अनुसार अपनी जीविका को जीने के लिए मजबूर किये गए। यह सब हठात या एकदम नहीं हुआ, बल्कि इतिहास के लम्बे थपेड़ों में घटित हुआ। जिनसे हमारे मुक्तिदाता बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने हमें परिचय कराया और हमें इतिहास का गौरव वरेय करने का साहस दिया। आज हम जो कुछ है, उसी महा-मानव की असीम करुणा और ज्ञान की बदौलत ही है। उन्होंने न केवल हमारी गुलामी की बेड़ीयां काटी, बल्कि हमारे मन-मष्तिष्क के विकास का रास्ता भी प्रशस्त किया। ऐसे महापुरुष को हमारा एक जीवन तो क्या, शत-शत जीवन न्यौच्छावर कर दें तो भी कम है। उनके संघर्ष और पुण्य-प्रताप से आज हमारे इस दीन-हीन गरीब समाज में एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों प्रतिभाओं का निखार हो रहा है और हम उन सब प्रतिभाओं पर नाज करके एक नया समाज बनाने की ओर अग्रसर हो रहे है। यह महत्ती उपलब्द्धि बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के कठिन परिश्रम और दूरदृष्टि से ही फलीभूत हो रही है। अतः, इस अवसर पर जिन प्रतिभाओं का सम्मान किया जा रहा है, मैं उन सबका भी अपनी तरफ से और आप सब की तरफ से अभिनन्दन करता हूँ और सारे समाज के साथ मैं भी उन पर फख्र करता हूँ। हम सब उनसे आशा और अपेक्षा करते है कि इस समाज की जो निर्योग्यतायें और बाध्यताएं है, उन्हें वे अपनी प्रतिभा के बल पर कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आप देखिये, जबरदस्त विरोध और भय के बीच विपन्न स्थितियों में भी हमारे पूर्वजों ने साहस के साथ स्वाभिमान का जीवन जीकर हम को इस मुकाम तक पहुंचायां है। जो बाध्यताएं और निर्योग्यतायें थी, उसे बाबा साहेब ने उखाड फेंका है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक बहुत-सी परिस्थितियां बदल चुकी है, अतः अब यह आपका और हमारा दायित्व है कि हम इस कारवां को आगे बढ़ायें।

इस अवसर पर आपसे इस सम्बन्ध में चर्चा करूँ, उससे पहले यह बता देना चाहता हूँ कि भारत की सभ्यता और संस्कृति बहुत पुरानी है, सिन्धु, सौराष्ट्र और राजस्थान आदि प्रदेशो में इसके प्रमाण मिल चुके है। हमारी यह प्राचीन संस्कृति ही हमारी पहचान है। यह विविधरूपा है, जिस प्रकार से दुनिया की अन्य संस्कृतियाँ किसी ना किसी एक धारा के रूप में जानी जाती है, वैसा निष्कर्ष-रूप से भारतीय सभ्यता या संस्कृति के बारे में गवेषित नहीं किया जा सकता है। जिन लोगों ने भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के बारे में खोज की है, अन्वेषण किया है, उन लोगों ने भारतीय सभ्यता के बारे में यह गवेषित किया है कि प्राचीन भारत में मोटे रूप से दो धाराएँ रही है। उसी से हमारी संस्कृति का विकास हुआ है। ये दो धाराएँ ‘श्रमण-धारा’ और ‘ब्राह्मण-धारा’ के रूप में पहचानी गयी है। हिन्दू-शास्त्रों के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेद है और वेदों में इसके पुख्ता प्रमाण है। वेदों में आर्यों और मेगों के संघर्ष के भी सुस्पष्ट संकेत है। इससे भी यह स्पष्ट होता है कि इस देश में शुरू से ही दो धाराएँ रही है। इन दोनों धाराओं में आपसी आदान-प्रदान, विरोध और प्रतिरोध शुरू से ही रहा है फिर भी उनके आपसी सह-अस्तित्त्व के गुण ने उन्हें एकाकार बनाये रखा। यह हमारे देश की सबसे बड़ी खूबी है, जिस के कारण अनंत युगों से हमारी संस्कृति अक्षुण्ण रूप से आज भी निरंतर प्रवाहवान है।

हमें अपने इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए इन धाराओं की और इन से निकली हुई सभी छोटी-बड़ी धाराओं की जानकारी होना आवश्यक है, तभी हम अपने को पूरे रूप से पहचान पाएंगे या समझ पाएंगे। जो ‘श्रमण-धारा’ थी और जो ‘ब्राह्मण-धारा’ थी, उनमें उनकी मान्यताओं का, स्थापनाओं का, मूल्यों का, रीति-रिवाजों का और दुनिया को देखने-समझने का तात्विक, तार्किक और व्यवहारिक फर्क था। उनका तात्विक या तार्किक फर्क मनुष्य की गरिमा, उसके सम्मान और उस से जुडी मान्यताओं की स्थापनाओं को लेकर था और वह मुखर रूप में था। उसी से एक समाज व्यवस्था उभरी, एक समाज का निर्माण हुआ, जिसकी विरासत हम सभी लोगों के पास है। आज का जो हिन्दू धर्म है या हिन्दू समाज है, उसमें कई धाराओं का, धारणाओं का, संस्कृतियों का मिलन हुआ है फिर भी आधार रूप से हिन्दू धर्म की स्थापनाओं में वेद आधारित मान्यताओं को आगे किया जाता है और उसी आधार पर उसकी व्याख्या की जाती है, तो वह पुरातात्विक-ऐतिहासिक तथ्यों की रोशनी में सत्य नहीं है। इस दृष्टि से हिन्दू धर्म और वेद-धर्म एक ही बन जाते है या वे एक ही मान लिए जाते है, जो कि अनैतिहासिक है। ऐतिहासिक रूप से वेद धर्म की मान्यता है कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते है। वेद-धर्म की मान्यता अनुसार सृष्टि की उत्पति से ही यह भेद रहा है, जिसे ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त और अन्य सूक्तों में स्पष्ट किया है। समझने वाली बात यह है कि वेद-धर्म गैर-बराबरी और भेद-भाव वाले समाज के रचना की आधार भूमि प्रस्तुत करता है और इसी आधार पर वैदिक समाज का निर्माण हुआ। इस समाज रचना में मानवीय गरिमा में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उस से ऊपर कोई जा नहीं सकता है और नीचे के स्तर का कोई पैमाना नहीं है। वेदों की इन मान्यताओं के आधार पर ब्राह्मण ग्रंथों की रचनाएँ हुई। उपनिषद और पुराण लिखे गए। स्मृतियाँ और अन्य भाष्य आदि लिखे गए। दूसरी ओर श्रमण-धारा से बौद्ध और जैन धर्मों का प्रादुर्भाव और विकास हुआ। उनके आगम और पिटक ग्रंथों की रचना हुई। श्रमण धारा की स्थापना में मनुष्य और मनुष्य के बीच के भेद को नकारा गया है। अगर इन दोनों धाराओं को देखा जाय तो प्राचीन भारत में ‘श्रमण-धारा’ मजबूती के साथ जन-मानस को जकड़े हुए थी। वह धारा ही इस देश की मूल धारा और मूल भावना है। भेद-भाव और गैर-बराबरी स्थापित करने वाले शास्त्रों और प्रमाणों का खंडन हमें इस धारा के ग्रंथों में मिलता है। यह धाराओं और धर्मों की स्थिति रही है।

अब अगर समाज व्यवस्था की ओर नजर डालें तो हमें उन-उन स्थापनाओं के आधार पर उन-उन समाजों का प्रादुर्भाव और विकास दृष्टिगोचर होता है। वेदों में वर्णित ऋषि और मुनि, जिन्हें हम आज के महात्माओं के समतुल्य मान सकते है, वे अपनी-अपनी स्थापनाओं के आधार पर समाज-निर्माण हेतु संकल्पित और सजग नजर आते है और जो श्रमण परम्परा के ऋषि और मुनि थे, वे अपनी स्थापनाओं के आधार पर समाज के निर्माण पर जोर देते हुए नजर आते है। इसके साथ ही इस साहित्य में राजनैतिक व्यवस्था के दर्शन भी होते है और उन में विभिन्न वर्गों या लोगों में सत्ता एवं प्रतिष्ठा के लिए बहुधा संघर्ष होना भी पाया जाता है। प्राचीन वेद-साहित्य और उपनिषद साहित्य के साथ ही ‘श्रमण-धारा’ के साहित्य में भी इनका एक क्रमिक विकास नजर आता है।

वैदिक लोगों का बहुधा जिनसे संघर्ष होता रहा है, वे यहाँ के मूल वाशिंदे और वेदों की मान्यताओं से इत्तर मान्यताओं वाले समाज के रूप में उल्लेखित किये गए है। मैं इस अवसर पर उन सब पर नहीं जाना चाहता हूँ, बल्कि यह बात और तथ्य आपके सामने रखना चाहता हूँ कि हमारा जो समाज है, जिसे आज-कल मेग, मेघ, मेघवाल, मेगवाल या मेंगवार आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है या पुकारा जाता है, इस मेघ समाज की जड़े उसी गैर-वैदिक धारा या परंपरा से निकली है। ये लोग, जिसे आजकल मेघ या मेघवाल जाति के नाम से जाना जाता है, जिसकी राजस्थान में सर्वाधिक जनसँख्या निवास करती है, वे इस देश में और मारवाड़ में शुरू से रहने वाले लोग है और इस देश की पुरातन परंपरा ‘श्रमण-परंपरा’ को मानने वाले लोग रहे है। वैदिक आर्य लोग बाद में भारत में प्रवेश करते है और यहाँ के वाशिंदों को छल-कपट, युद्ध और नीति-कुनीति से परावलम्बी बना देते है। इस बात के प्रमाण न केवल वेदों में है, बल्कि विश्व-इतिहास की कई पुस्तकों में है। थानेश्वर व पंजाब से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक ‘मेग’ नाम/उपाधिधारी शासकों के सिक्के मिल चुके है। पुराणों में वर्णित कौशाम्बी के मेघ और दक्षिण भारत का मेघवाहन वंश या तो एक ही है या एक ही वंश की शाखाएं है, जिनके सिक्के और शिलालेख मिले है। मेघवाल लोग उन्ही के वंशज हैं। इस बात को हमारी नई पीढ़ी को जानना चाहिए और समझना चाहिए। आपका जो इतिहास है, उसको या तो मिटा दिया गया या उसे खुर्द-बुर्द कर दिया गया या उसको बाद में राज करने वाले लोगों ने हड़प लिया और उसे उन्होंने अपना बना लिया। आपको उस इतिहास से इसी तरह वंचित कर दिया, जिस तरह से आपको सामान्य नागरिक अधिकारों से वन्चित कर दिया गया था और जब आपको पढने-लिखने से दूर रखा गया तो आप अपने इतिहास से भी दूर हो गए। ऐसे में जो कुछ इन चालाक लोगों ने आपको बताया, उस पर आप विश्वास करते आये, परन्तु अब बाबा साहेब के संघर्ष के परिणाम-स्वरुप संविधान के बल से आपको पढ़ने –लिखने का अधिकार है, आप दुनिया का इतिहास पढ़ सकते हो, उसे जान सकते हो और समझ सकते हो। उसमें से झूठ और सच की पहचान कर सकते हो और अपने इतिहास और गौरव को प्राप्त कर सकते हो। जो सुनी-सुनाई बातें है, वे सभी इतिहास नहीं होती है। उस में से तथ्य और सत्य को छांटना हमें बाबा साहेब डॉ आंबेडकर सिखा गए है। साथ ही, आज के इस तकनिकी और वैज्ञानिक युग में झूठ और निर्मूल को सत्य से अलग करना और पहचानना कोई मुश्किल भी नहीं है। ज्ञान के विभिन्न स्रोतों से हम इसे पहचान सकते है, जितना जल्दी आप इसको जान सकोगे, उतनी ही जल्दी आपकी और हमारी उन्नति होगी।

आप इतिहास की इन घटनाओं और सन्दर्भों को समझें। किस प्रकार से उन लोगों ने आपके इतिहास और आपकी धन-धरती पर कब्ज़ा किया और वे आपके मालिक बन गए और आपको हैठियाल बना दिया था। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने अपने लेखन में इन तथ्यों का उद्घाटन किया है। हम उनके कृतज्ञ है कि उनके अनथक प्रयासों से आजादी के बाद अब एक नागरिक होने के नाते आजादी से पहले राज करने वाले और उनकी पराधीन जनता के बीच अब अधिकारों में कोई भेद नहीं रहा है। इतिहास में जो भेद डाला गया है, उसे आपको तोड़ना है, उन मिथकों या झूठी कथा-किंवदंतियों को भी तोड़ना है, जो भेद डालने वाली है। उन्हें ज्ञान के बिना आप तोड़ने में सक्षम नहीं होंगे, इसलिए आप हर तरह का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करके उस झूठे इतिहास को अपने सच्चे इतिहास को उजागर करके नेस्तनाबुद करो। यह आप सबका पुनीत कर्तव्य होना चाहिए।

आपका यह इलाका, जहाँ पर यह सभा हो रही है, इस समय राजस्थान के मारवाड़ इलाके के पाली जिले में आता है। वर्तमान में राजस्थान की शासकीय इकाई का यह पाली जिला 8 जिलों, यथा नागौर, अजमेर, राजसमन्द, उदयपुर, सिरोही, जालोर, बाड़मेर और जोधपुर से घिरा हुआ है। इस जिले में 6 विधानसभा क्षेत्र और एक एम. पी. की सीट है। दिनेशराय डांगी, अचलाराम मेघवाल, हुकमाराम मेघवाल आदि मेघ लोगों ने किसी न किसी विधानसभा क्षेत्र से या संसद-क्षेत्र से कभी-कभी आपका प्रतिनिधित्व किया है। यहाँ बहुत प्राचीन समय से मानव-बस्तियां बस चुकी थी, इस बात के साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रमाण है और इस बात के भी प्रमाण है कि यहाँ पर किसी समय ‘मेग’ और ‘मैणा’ लोगों का बाहुल्य था और इस क्षेत्र पर उनका अधिकार था। प्राचीन काल में ‘पाली’ सिंध-प्रदेश से ही जुड़ा हुआ था। प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर बसा हुआ पाली नगर इस क्षेत्र के व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। यहाँ से सिंध-सौराष्ट्र, गंधार, अफगानिस्तान और चीन आदि देशों तक इसका व्यापार होता था। इसका प्राचीन नाम पल्लिका या पल्ली के रूप में ज्ञात होता है। पाली शब्द और पाली भाषा में घनिष्ठ सम्बन्ध है। यहाँ कि भाषा और बोली ‘मारवाड़ी’ कही जाती है, जो कि मूलतः कोल-द्रविड़ भाषा-परिवार से सम्बंधित है। भाषाविदों ने मारवाड़ी बोली को ढेढ़ों और शिकारियों की भाषा कहा है और इसे प्राचीन ‘पाली भाषा’ से सम्बंधित माना है। आप इनका अर्थ और अभिप्राय समझ सकते है। राजस्थान में बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की प्रथम आदम-कद मूर्ति श्रद्धेय एच.आर. जोधा और भागीरथ झुरिया आदि साथियों के अनथक प्रयासों से आपके पाली शहर में ही लगी थी।

राजपूतों की उत्त्पति से पहले का इस क्षेत्र का सिल-सिलेवार प्राचीन इतिहास अज्ञात है, परन्तु यह तथ्य सुविदित है कि सन 120 ईस्वी पूर्व यहाँ पर भगवान बुद्ध के परम-उपासक महाराजा कनिष्क का शासन था। बताया जाता है कि पाली जिले के वर्तमान रोहट और जैतारण का क्षेत्र उसके अधीन था। कईं भिक्षु यहाँ विहार करते थे। तक़रीबन 7वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में उसकी परंपरा के लोगों का राज्य था, जिससे आज भी आपके रीति-रिवाज और मान्यताएं जुडी हुई है। महाराजा कनिष्क बौद्ध-धर्म की थेरवादी परंपरा का अनुयायी था। उसी परंपरा से सिद्ध और नाथों की धारा निकली है। कहने का तात्पर्य यह है कि सांस्कृतिक रूप से यहाँ के मेघवाल उसी परंपरा के संवाहक है। उसके बाद हमें ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण में भी मारवाड़ का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार ह्वेनसांग वर्तमान भीनमाल और बाड़मेर के क्षेत्रों से होते हुए थानेश्वर पहुंचा था। उस समय भीनमाल में किसी वर्मलात नामक राजा का राज्य था, जो उस समय गुर्जर-देश की राजधानी था। उसके बाद राजपूतों का उदय होता है और यहाँ पर गुहिल, सोलंकी, चौहान और राठौड आदि राजपुत कहे जाने वाले लोगों का राज्य स्थापित होता है। 10वीं से 15वीं शताब्दी तक किसी न किसी रूप में पाली पर चौहान राजपूतों का आधिपत्य रहा और नाडोल उनकी राजधानी रही। भारतीय इतिहास में सूरी वंश के शासक शेरशाह शूरी और मारवाड़ नरेश का युद्ध भी आपके पाली जिले के जैतारण कसबे के पास गिरी पर ही हुआ था। मुग़लों के समय यह क्षेत्र उनकी अधीनता में था। गहलोत राजपूतों में सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त शूर-वीर महाराणा प्रताप का जन्म भी इसी पाली की भूमि पर हुआ था। फिर भी, अकबर से लेकर औरंगजेब और उसके बाद भी यहाँ के राजे-महाराजे मुग़लों की अधीनता और उनके पारिवारिक संबंधों से बंधे रहे। जब दुर्गादास राठौर ने मारवाड़ के राजपूतों को एक करने के प्रयत्न किये तो आपके क्षेत्र का ‘मिजलिया’ या ‘बिजलिया’ नाम का मेघवाल उनका दाहिना हाथ कहा जाता था। वह उनके साथ हर युद्ध-विपत्ति और सुख-दुःख में एक बहादुर वीर की तरह सारथी बना रहा। सादड़ी के पास मगर तालाब मेगों की भूमि थी, जहाँ पर मेघवालों ने कईं शासक लोगों को प्रश्रय व नया जीवन दिया था। देश की आजादी से पहले पाली जोधपुर रियासत के अधीन था और जब मारवाड़ के महाराजा ने भारत गणराज्य में मिलने का निर्णय किया तो यह क्षेत्र भी 1949 में वर्तमान राजस्थान में मिल गया। संक्षिप्त रूप से आपके क्षेत्र के इतिहास की यह रुपरेखा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि आबू-पर्वत पर हुए अग्नि-कुण्डीय यज्ञ के बाद यहाँ के वाशिदों का आधिपत्य धीरे-धीरे कम होता गया और नये-नये विदेशी आक्रमणकारी इस क्षेत्र पर कब्ज़ा करते गए। यहाँ के मूल वाशिंदे मेघ और मीणा आदि या तो यहाँ से विस्थापित हो गए या पराधीन-प्रजा के रूप में जीवन-यापन को मजबूर हुए। प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह जानकारी भी मिलती है कि इस क्षेत्र का प्राचीन नाम अर्बुददेश व मरुदेश था, जिसका उल्लेख पालि-साहित्य और पुराण आदि साहित्य में भी मिलता है। मैं इस अवसर उन सब पर नहीं जाना चाहता हूँ बल्कि यह कहना चाहता हूँ कि आप इस धरती के मूल वाशिंदे और मालिक है। हालाँकि आज भी यहाँ पर मेघों का बाहुल्य है, परन्तु मेघ लोग अब यहाँ पर न तो सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत है और न राजनैतिक या शासकीय रूप से प्रभुत्वकारी है। आज अगर हमारे लोगों की स्थिति का विश्लेषण करें तो वह डरावनी और निराशाजनक स्थिति है। हमारे लोग गांवों में रहते है और गांवों की स्थिति आज भी वैसी ही सामंतशाही और जातिवाद के भेदभाव में डूबी है। हमारे लोगों पर तरह-तरह के जुल्म और अत्याचार होते रहे, जिसका मुकाबला हमारा समाज करता रहा, परन्तु हिन्दू समाज में सवर्णों के मुकाबले में हम अल्पसंख्यक ही है। अतः उपेक्षा के शिकार होते रहे है। यह बात हमें समझनी चाहिए कि ब्राह्मणवाद या हिन्दुवाद में अगर कोई सबसे अल्पसंख्यक है तो वे अनुसूचित जातियां ही है। हम लोगों की तरह गरीबी से सताए हुए, अन्याय और जुल्म से परेशान दूसरे नहीं है। सबसे ज्यादा अज्ञान की वजह से अपना संरक्षण करने में असमर्थ यदि कोई है, तो वे हम ही है। पिछले वर्षों की डांगावास, घेनडी, नोखा/गडरारोड़ की घटनाएँ इस बात के ताज़ा उदाहरण है। इसलिए हम लोगों को संगठन की बहुत बड़ी आवश्यकता है, हमें संगठित रहना चाहिए, उसके लिए संगठन बनाना चाहिए। आपका यह संगठन इस हेतु एक उदाहरण है और ऐसी विपत्तियों का माकूल जबाब भी है। यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि विगत-काल में आजकल की अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर कई तरह के अन्याय और अत्याचार होते थे। मेघवाल कौम भी इससे बुरी तरह से पीड़ित थी। वर्तमान में काफी कुछ परिस्थियों के बदल जाने के बावजूद भी जो निर्योग्यतायें और अमानवीय अत्याचार आदि होते रहे है, उनसे अभी भी हमें पूर्ण मुक्ति नहीं मिली है। इसलिए इन सभी चीजों को हमें समझना बहुत जरुरी है। अगर आज के ज़माने में भी हम जागृत नहीं रहते है आस-पास क्या घटित हो रहा है, उस से वाकिफ नहीं होते है तो दुनियां की प्रगति की भीड़ में यह समाज पिछड़ जायेगा। इसलिए आप लोग जागो! उठो! और आगे बढ़ो! आज संविधान के द्वारा बहुत सी बाध्यताओं और निर्योग्यताओं को ख़त्म किया जा चुका है। यह युग बाबा साहेब डॉ आंबेडकर का युग है, प्रतिस्पर्धा और प्रतिभा का तकनिकी-वैज्ञानिक युग है। उस में अपनी चमक दिखाओ, दुनिया को अपना लौहा मनवाओं। यह बहुत कठिन काम है, इसके लिए पूरे समाज में महत्वाकांक्षा, लगन और मेहनत की नितांत आवश्यकता रहती है। अगर आदमी ठान ले तो उसके लिए असंभव जैसा कुछ भी नहीं है। वह कई ऊँचाईयों पा सकता है। जब तक हम कठोर मेहनत नहीं करेंगे, इरादा पक्का नहीं रखेंगे, तब तक हमारे अच्छे दिन नहीं आने वाले है। दूसरे समाजों के लिए यह जरुरी नहीं है, उनके लिए अवसर, साधन और सुविधा सहज और सुलभ हो सकते है,परन्तु हम लोगों को अपनी मेहनत और प्रतिभा का लौह मनवाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। हमारे समाज को इस हेतु समय-बद्ध संगठित प्रयास करना बहुत जरुरी है।

आप जानते है कि राजस्थान की अनुसूचित जातियों और जन-जातियों में सर्वाधिक जन-संख्या आप लोगों की है, मेघवाल लोगों की है, परन्तु फिर भी शिक्षा और नौकरियों में उनका अनुपात दो प्रतिशत से भी कम है। इसका मतलब है कि हम शिक्षा में पिछड़ रहे है, इसलिए नौकरियों में भी कम है। आप देखिये, जो लिखित दस्तावेज है, उनके अनुसार पंजाब और जम्मू के महाराजा गुलाबसिंह ने 19वीं शताब्दी के मध्य में बड़े स्तर पर मेघ लोगों को सेना में भर्ती कर सरकारी नौकरियां देनी प्रारंभ की। उस समय भारत की ओर से अफगानिस्तान के विरुद्ध लड़े गए युद्ध में मेघ लोगों ने भारत की ओर से युद्ध कर दुश्मनों को अपनी बहादूरी का लौहा मनवाया। मेघों की बहादूरी को देखते हुए अंग्रेजों ने भी प्रथम विश्व-युद्ध में मेघवालों की सेना में व्यापक-स्तर पर भर्ती की। द्वितीय विश्व-युद्ध में भी हमारे इलाके से कई लोग सेना में भर्ती हुए और भारत की ओर से युद्ध लड़े तथा भारत की जीत सुनिश्चित हुई। उस समय बाबा साहेब डॉ आंबेडकर वायसराय हिन्द के रक्षा-सलाहकार थे और श्रम-सदस्य भी थे; परन्तु अन्य सरकारी नौकरियों में हम लोगों का प्रवेश बिलकुल ही बंद था। कहीं-कहीं पर मेघवाल अछूत और कहीं-कहीं पर सछूत शूद्र गिने जाने लगे। अछूतपन और अज्ञानता से हमें बाबा साहेब आंबेडकर ने ही मुक्ति दिलाई। आपने सुना होगा, यहाँ मारवाड़ में कहते है कि मेघवालों को जो मिले वो ‘बाबा’ ही मिले, तो इसमें कोई दो राय नहीं है। एक तो हमारे अपने बाबा रामदेवजी, जो 15वीं शताब्दी में हुए; उन्होंने उस समय हमारा आध्यात्मिक मार्गदर्शन किया और सिद्धों और नाथों के रूप में विरल होती ‘महाधर्म’ की धारा को नवजीवन दिया और दूसरे बाबा केरण वाले बाबा हुए, जिन्होंने हमें अपना सामाजिक-स्तर ऊपर उठाने की सीख दी और तीसरे आधुनिक युग-प्रवर्तक हमारे परम पूज्य बाबा साहेब डॉ आंबेडकर हुए, जिन्होंने हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक उन्नयन का मार्ग प्रशस्त किया। जिसके प्रतिफल आज हम लोग सरकारी सेवाओं में और राजनीती में बराबरी का अवसर पाते है। हमारा समाज उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।

समाज के सम्मान और गरिमा को लेकर अथवा मेघवाल जाति की आन-बान को लेकर उनके इन प्रयत्नों का लेखा-जोखा अभी तक इतिहासकारों की नजर से ओझल है। पढ़े-लिखे लोगों का दायित्त्व है कि वे इसे उजागर करे। पिछली शताब्दियों में मेघवालों द्वारा अपने सम्मान और स्वाभिमान के लिए किये गए आन्दोलनों पर दृष्टिपात करने से हमें ज्ञात होता है कि सिंध के थार-पारकर जिले में 1857 में मेघों और कोलियों आदि ने विद्रोह किया था, जिसे अंग्रेजों ने बे-रहमी से दबाया। उस समय कई मेघवाल और कोली परिवार बाड़मेर, जालोर, पाली, जोधपुर और जैसलमेर आदि जगहों पर आकर बसे। इसके साथ ही स्वाभिमान और सम्मान के लिए वहां पर आर्य-समाज की स्थापना होने से पहले ही मेघों ने वृहत्तर हिन्दू समाज की धारा में शामिल होने के लिए धार्मिक और सामाजिक स्तर पर विभिन्न तरह के प्रयत्न शुरू कर दिए थे। हम इन ऐतिहासिक प्रयत्नों को दुनिया के सामने उजागर करें। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते जमीनों के हक़-हुकुक और समाज में मेघवाल जाति के साथ सम्मान और बराबरी के हक़ की प्राप्ति के लिए छोटे-बड़े आंदोलन जगह-जगह होने लगे। आर्य-समाज ने भी शुद्धि का आंदोलन शुरू कर मेघों की इस जागृति को बल दिया।

मेघवाल समाज सिंध से लेकर मारवाड़ तक सघन रूप से फैला हुआ था और अकाल की विभीषिकाओं और बैठ-बेगारी से त्रस्त था। आप में से कई लोग यह जानते है कि विगत कई शताब्दियों में हमारे लोगों पर आरोप लगाये जाते थे कि ये लोग गंदे काम करते है, छोटे काम करते है, मरे हुए जानवरों को काटते है, उनकी खाल उतारते है, गंदे कपडे पहनते है, मरे हुए जानवरों का मांस खाते है। विभिन्न बदसूरत देवी-देवताओं को पूजते है, मांवडियों को पूजते है, अलख को थापते है, बाबे को धोख देते है, विधवाओं को घर में रखते है, उन्हें सीर-सरोकार देते है, विधवा-विवाह करते है, यज्ञ-बलि कर्म नहीं करते है, यज्ञोपवित-धारण के अधिकारी नहीं है, ब्राह्मण को भेंट-पूजा देकर शुद्ध या पवित्र नहीं होते है। शास्त्र-प्रमाण से ज्यादा ये अपने गुरु और परंपरा को प्रमाण मानते है। ऐसे बहुत से आरोप हमारे समाज पर लगते रहे और वे उन आरोपों से हमारी आस्था और आराधना की खिल्ली उड़ाते, हमारी बदहाली का क्रूर मजाक उड़ाते, और उनका फायदा उठाते। इस प्रकार के एक नहीं, दो नहीं, कई आरोप हम पर लगाये गए, फिर भी हमारा समाज विचलित नहीं हुआ। विगत शताब्दियों में इस समाज ने इन सब पर ध्यान दिया और जिन-जिन कारणों को जाति के पतन का कारण बताया जाने लगा, इस समाज ने उससे अपने को दूर करना शुरू कर दिया। इस दौर में जहाँ-जहाँ मेघवाल कौम निवास करती थी, वहां-वहां उसने अपने स्वतः संज्ञान से गंदे धंधे नहीं करने, मरे पशुओं का मांस नहीं खाने आदि की बंदिशे लगा कर इस जाति को ऊपर उठाने की कोशिश की, लेकिन कई जगहों के मेघवाल और उनकी पंचायते इन धंधों में आर्थिक लाभ देखते थे और इन्हें छोड़ने का साहस नहीं रखते थे। उन में और इन में जाति बहिष्कार का दंश भी 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में घुस गया। इस अवसर पर मैं उस पर चर्चा करना ठीक नहीं समझता हूँ, परन्तु यह कहना चाहता हूँ कि मेघवालों ने सम्मान और स्वाभिमान के जीवन को ही हमेशा वरीयता दी है। सामंती जातिवादी ढांचे में ढल जाने के बाद भी उन्होंने भिखारी का जीवन कभी नहीं जीया और लालच में कभी कोई हीन कर्म नहीं किया। अपने शील-सदाचार और सादगी के लिए मारवाड़ में यह कौम अपने नाम की धनी रही है।

जो लोग मेघों के इन संघर्षों की थोड़ी-बहुत भी जानकारी रखता है, वह जानता है कि हमारे समाज के केरण बाबा ने इस सम्बन्ध में पहला ऐतिहासिक कार्य किया था, जो पंजाब में जा कर बस गए थे। उन के प्रयत्नों से इस जाति ने 1879 में इन गंदे कामों और अशुद्ध या अपवित्र कहे जाने वाले खान-पान से अपने को अलग कर दिया था, इसलिए आर्य-समाज के आन्दोलन को एक पृष्ठभूमि मिली, परन्तु ऐसा कर लिए जाने के बाद भी स्थितियां बदली नहीं। आज यह समाज ऐसे कारणों से दूर है फिर भी सवर्ण हिन्दू-मानसिकता इस जाति को सम्मान और गरिमा देने में खुला ऐतराज करती है तो हमें यह बात समझ में आनी चाहिए कि ऐतिहासिक रूप से आपकी जाति के नाम पर ‘अछूतपन’ से हिन्दू समाज ने जो कलंक लगा दिया है, वह आपके शुद्ध रहने से या गंदे या नीच कहे जाने वाले कामों के करने या नहीं करने से कोई ताल्लुक नहीं रखता है।

हम इस बात से वाकिफ है कि देश आजाद होने से पहले राजस्थान में कईं देशी रियासते थी और वे अंग्रेजों के अधीन गुलाम थी। मारवाड़ की रियासतें भी अंग्रेजों के अधीन थी, जिसका पूरा तंत्र सामंतों के कब्जे में था और समाज वेठ-बेगार के जुल्म और अत्याचार से आतंकित था। हर सामंती समाज में बेगारी प्रथा एक आवश्यक अंग थी। सारे भारत में यह किसी न किसी रूप में प्रचलन में थी। बेगार का मतलब किसी को मजदूरी का पारिश्रमिक दिए वगैर उससे काम करवाना था अर्थात यह मजदूरी-रहित श्रम था, जो छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों से लिया जाता था। यह बेगारी की प्रथा दासता की प्रथा से अलग थी, दासता को ख़त्म करने में जहाँ एक ओर सामंतों ने उदारता दिखाई, वहीं सामंतों ने बेगारी प्रथा को प्रमुखता से बनाये रखा, जिसके कारण छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को कई तरह का जुल्म और अत्याचार सहना पड़ता था। इसकी अत्यधिक पीड़ा मेघवाल जाति ने भोगी, सामंती जातिवादी समाज में मेघवाल जाति बेगारी के लिहाज से एक ‘काजू-कौम’ मानी जाती थी।

जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर आदि मारवाड़ के विभिन्न इलाकों में मेघवाल लोग सघन रूप से बसे हुए थे, जहाँ वेठ-बेगार का रिवाज व्यापक रूप से प्रचलित था। मारवाड़ में यह वेठ-बेगार जजमानी की एक सुदृढ़ परंपरा बन गयी थी। जागीर के गांवो में रैयत यानि प्रजा द्वारा बिना मजदूरी या पारिश्रमिक के जागीरदारों या छोटे-बड़े हाकिमों के काम करना लाजिम समझा जाता था। मेघवालों सहित तक़रीबन हर जाति इससे त्रस्त थी। मेघवालों को और अन्य लोगों को जो खेत-खलिहान से जुड़े होते थे, उन्हें बंदोबस्ती इकरारनामे के द्वारा भी वेठ-बेगार हेतु बाध्य किया जाता था। यह शोषण की एक अतिरंजित क्रूर प्रथा थी। गांवों में बहुत से काम बैठ-बेगार के नाम से मेघवालो से मुफ्त में करवाए जाते थे। वैठ- बेगारी के रूप में सामंती समाज में मेघवाल कौम एक काजू कौम के रूप में जानी जाती थी अर्थात इन से हर तरह की बेगार करवाई जाती थी। यह रस्म या प्रथा गुलाम या दास प्रथा नहीं होते हुए भी दास-वृति से कम नहीं थी। इन प्रथाओं से छुटकारा पाने के लिए मेघवाल समाज ने जगह-जगह पर आन्दोलन किये।

बैठ-बेगारी के विरुद्ध मेघवालों का यह आन्दोलन छोटे और मध्यम दर्जे के किसानों का आन्दोलन था। मेघवालों के ये आन्दोलन राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में नहीं आ सके, इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि इनका दस्तावेजीकरण नहीं हो सका और साथ ही देश के स्वतंत्रता आन्दोलन की आवाज में इनके ये स्वाभिमान और सम्मान के आन्दोलन दब कर रह गए। कृषि-कार्यों में लगे इन मेघों के इन आन्दोलनों को बाद में किसान-आन्दोलन में समाहित कर दिया गया और उनके आन्दोलन की महत्ता और उनका महत्त्व समाप्त कर दिया गया। इनके आन्दोलनों की उर्जा को अन्य लोगों ने अपने हित-साध्य का आलंबन बना दिया और वे शिखर पर पहुंचे, वहीँ यह समाज ठगा हुआ-सा वहीँ का वहीँ रह गया। यहाँ की मेघवाल कौम ने बेगारी से छुटकारा पाने के लिए हर स्तर पर इसके विरुद्ध संघर्ष किया और आजादी से पहले इस से निजात प्राप्त कर ली, परन्तु कई जगहों पर यह किसी न किसी रूप में फिर भी व्याप्त रही, अतः यह नहीं कह सकते है कि सम्पूर्ण राजस्थान में या जहाँ-जहाँ मेघवाल जाति है, वहां इसने उसी समय एक साथ मुक्ति प्राप्त कर ली थी। कहने का तात्पर्य यह है कि अलग-अलग जगहों पर गंदे-धंधों से उन्मुक्ति और बेगारी से छुटकारा अलग-अलग समय पर पाया। इसलिए इस जाति का एक-सा स्वरुप नहीं उभर सका। यहाँ पर उन सब पर चर्चा करना उपयुक्त नहीं है, बल्कि इस सम्बन्ध में जन-नायक उम्मेदाराम जी कटारिया के ऐतिहासिक व महत्ती प्रयासों का उल्लेख करना चाहूँगा, जिनके प्रयत्नों से यहाँ की मेघवाल कौम ने स्वाभिमान और सम्मान का जीवन जीने का जज्बा प्राप्त किया।


यह सत्य है कि मेघवाल समाज को स्वाभिमान और सम्मान से जीवन जीने के लिए कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा। उन पर यहाँ चर्चा करने का कोई औचित्य नहीं है। यह सुज्ञात है कि मेघवालों ने अपने स्वाभिमान और सम्मान के लिए अपनी जमीन पर रहते हुए भेदभाव और भेंट-बेगार से छुटकारा पाने के लिए संगठित-रूप से प्रयास किये है। उनके आन्दोलनों की रुपरेखा पंचायतो के माध्यम से हर-एक व्यक्ति तक पहुंचती थी। मेघवालों की हैठियाल स्थिति और विपिन्न परिस्थितियों को देखते हुए 19वीं शताब्दी के अंत में और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कई लोग समाज-सुधार हेतु आगे आये, जिस में जोधपुर के पास बसे तिंवरी गाँव के उम्मेदाराम मेघवाल प्रमुख थे। उम्मेदाराम जी ने मेघवाल समाज की सब घटनाओं और स्थितियों को ध्यान में रखते हुए संवत् 1972 के फाल्गुन वदी 6 (छठ) तदनुसार दिनांक 3 मार्च सन् 1915 को अपने बलबूते पर मेघवाल समाज की एक बड़ी पंचायत (आम सभा) अपने गांव तिंवरी में बुलाई। इसका पूरा खर्चा और व्यवस्था उम्मेदाराम जी ने अपनी निजी हैसियत से वहन किया था और मेघवालों को एकजुट कर गंदे-धंधे छोड़ने और बेगार नहीं करने हेतु प्रेरित किया व उसका प्रण दिलाया। उस समय सारी जगहों में मेघवालों में नये समाज के निर्माण के लिए और वेठ-बेगारी से छुटकारा पाने के लिए जबरदस्त उत्साह, प्रेरणा और साहस था। मारवाड़ की कई पट्टियों से पञ्च तिंवरी में इकट्ठा हुए, उसमें जोधपुर के आस-पास की नौ पट्टी ही पहले-पहल आगीवाण हुई। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मेघवालों का यह प्रथम खुला नागरिक प्रतिरोध या विद्रोह था। उसके बाद के प्रतिरोध-आन्दोलनों का मैंने अन्यत्र उल्लेख किया है।

श्री उम्मेदाराम जी दूरदृष्टा और परिपक्व नेता थे। उनमें संगठन की अद्भुत शक्ति थी। अपने कुशल नेतृत्व के गुणों के कारण वे सबके आदर के पात्र थे। गुलाम भारत की जोधपुर रियासत में भी उनका बहुमान था! मारवाड़ में प्रजा मंडल, कांग्रेस की हरिजन सेवा समिति या सेवक-संघ आदि की शुरुआत या स्थापना होने से पहले ही उम्मेदाराम जी के नेतृत्व में मेघवाल समाज बेगारी और सामंतो के जुल्म के विरुद्ध आंदोलनरत था। सन 1920 के बाद में जब ये संगठन कार्यरत हुए तो मेघवालों का यह आन्दोलन ऐसे संगठनों के देश-व्यापी वर्चस्व का शिकार हो गया और उस देश-व्यापी आन्दोलन में मेघवालों के स्वाभिमान और सम्मान के इस संघर्ष को उसमें मिलाकर भुला दिया गया। जोधपुर में जयनारायण व्यास, जो कि बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने, उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ 1938 में हितकारिणी सभा बनायीं और हमारे आन्दोलन को उसमें मिला दिया गया। उस समय देशव्यापी आजादी के आन्दोलन और किसानों के आन्दोलन का नेतृत्व गैर-अछूतों के हाथों में था, जबकि मेघों के स्वाभिमान और सम्मान हेतु किया गया बेगारी-उन्मूलन आन्दोलन मेघवालों के हाथों में ही अर्थात यह मेघों के नेतृत्व में ही था। जयनारायण व्यास के साथ ही बलदेव राम मिर्धा ने मिलकर 1940 में किसानों का आन्दोलन शुरू किया तो उम्मेदाराम जी और उनके साथी प्रजा-मंडल, मारवाड़ हितकारिणी सभा या किसान सभा आदि से जुड़ गए, फिर भी वे अपने समाज के सुधार को लेकर प्रतिबद्ध थे और चाहते थे कि मेघवालों में अपने समाज के सुधार हेतु उनका अपना नेतृत्व उभरे। इस हेतु ही उन्होंने समाज सुधार सभा का गठन किया था, अतः उसको जारी रखना जरूरी था, साथ ही गैर-अछूतों के नेतृत्व वाले संगठन एक तरफ जागीरदारों से सहयोग और लाभ चाहते थे तो दूसरी ओर मेघवाल समाज जिन जुल्मों और ज्यादतियों के विरोध में खड़ा होता था, वहां वे मजबूती से उनके साथ खड़े नहीं होते थे। इन सब परिस्थितियों के मध्य-नजर प्रजा-मंडल, किसान-सभा, हरिजन सेवा समितियों के गठन के बाद भी उम्मेदाराम मेघवालों की पंचायत को मजबूत बनाने में जुटे रहे। हमारे समाज के स्वतंत्रता सेनानी मेघ नरपतसिंह, तेजुराम मेघवाल और भगत हंसराज मेघ आदि आज़ादी के दीवाने थे।

मेघवालों की पंचायत के दायरे को मजबूत बनाने हेतु व मेघवालों को अछूतपन से व बेगारी से छुटकारा दिलाने के लिए मेघवंशी सुधार-सभा ने 1915 में जो संकल्प लिया थे, उसे उमेदराम जी ने जीवन-पर्यंत छोड़ा नहीं था। आयु क्षीण हो जाने के बाद भी वे बुढ़ापे में भी अपने समाज का मार्ग-निर्देशन करते रहे। वे यह बात भली भांति जानते थे कि अपने खुद के नेतृत्व के बिना यह समाज आगे नहीं बढ़ सकता है, वे अपनी सभाओं में बहुधा कहा करते थे कि “हमारा सशक्त संगठन नहीं होने से दूसरे लोग हमारा नेतृत्व करना अपनी हकदारी समझते है और हमें ‘हेठियाल’ समझते है। इन दूसरे नेताओं की नज़रों में हमारी कीमत भेड़-बकरियों के बराबर ही है। इसलिए इससे उभरने के लिए हमारी पंचायत पट्टी को मजबूत करना बहुत जरुरी है।“ उन्होंने मेघवालों के पंचायती गणतंत्र को पुनः मजबूती देने के लिए पूरी ऊर्जा लगा दी और जीवन-भर उसके लिए कार्य करते रहे।साफ बात यह है कि मेघवाल समाज बेगारी और सामंतो के जुल्म के विरुद्ध 19वीं शताब्दी से आंदोलनरत था। ।

मेघवाल समाज के इन संगठित प्रयासों से इन क्षेत्रों में बेठ-बेगार आजादी से बहुत पहले ख़त्म हो गयी। इसमें बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की विचारधारा का प्रभाव, जिसे पंच लोग 'उमेदगारी' कहते थे, के साथ-साथ, यूनीयनिस्ट मिशन, कांग्रेस और आर्य समाज के प्रयासों से मेघवाल समाज को बहुत बड़ा सम्बल मिला। मेघों के इतिहास में सन् 1920 का वर्ष 'शोषण से मुक्ति' का वर्ष माना जाता है। यह वर्ष अंग्रेजी हकुमत और रियासत के शोषण से मुक्ति की चेतना से लबरेज था। सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी जोधपुर के आस-पास के मेघों ने बेठ-बेगारी के शोषण के जाल को उतार फेंक दिया। इसमें मेघों की बुजुर्ग पीढ़ी की सूझ-बूझ और चेतना की जितनी प्रशंसा की जाय, उतनी ही कम है। जब हर गांव में राजपूतों और जागीरदारों का भयंकर आतंक और शोषण था और खेत-खलिहानों के कोई पट्टा-पूली नहीं थे, कमाई के कोई साधन नहीं थे और सेठ-शाहूकारी के कर्ज के बोझ तले पूरा समाज पिस रहा था, तो ऐसे में उमेदाराम जी जैसे कर्मठ मेघ पुरुषों को हिम्मत और होशियारी से ही यह समाज इनके चंगुल से अपने को आजाद करा पाया। ऐसे आन्दोलनों के फलस्वरूप ही देश आजाद होते ही राजस्थान में भूमि-सुधार कानून बनाना पड़ा व उसे लागु करना पड़ा।

अन्याय और अत्याचारों के विरुद्ध उनका सामाजिक प्रतिकार आन्दोलन नाकामयाब रहा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। उनका धार्मिक आन्दोलन और राजनीतिक चलवल अपनी जगह ठीक थे। जब पूना पैक्ट के बाद दोहरे मतदान की बात आई और गंदे धंधे छोड़ने की बात आई, आन्दोलन हुआ तो पहली बार मेघ समाज में इन बातों को लेकर कुछ लम्बी खींच-तान हुई। जो लोग मेघवालों के मुक्ति आन्दोलन की थोड़ी बहुत भी जानकारी रखता है, वह जानता है कि सारे भारत में उस समय दलित समाज के लिए आशा की एक मात्र किरण डॉ. आंबेडकर थे और मेघवालों की पंचायतें उनके नक़्शे कदम पर चल रही थीं। अनुसूचित जातियों के कई संगठन थे, उनमें से कई संगठनों ने कांग्रेस की लाइन पर डॉ. आम्बेडकर का विरोध भी किया। ऐसे कुछ इने-गिने लोगों को छोड़कर पूरा समाज डॉ. आंबेडकर के साथ खड़ा था। शुरूआती दौर में आदि धर्म आन्दोलन से जुड़े लोग और आर्य समाज से जुड़े लोग भी डॉ. अम्बेडकर के विरोध में खड़े दिखे, पर बाद में परिस्थियाँ बदल गयीं। ऐसा क्यों हुआ, उसका सबसे प्रमुख कारण मेघवालों की पंचायतें थीं और दूसरा बॉम्बे में खोती-प्रथा या वतनदारी का कानून पारित होना था, जो मेघवालों के बेगारी के विरुद्ध किये जा रहे संघर्ष में मददगार था। इस दौर में गंदे धंधे छोड़ने, मरे हुए जानवरों की खाल नहीं उतारने और मरे हुए पशुओं का मांस नहीं खाने की जो शर्तें 1879 में तय हुई थीं, उनकी सख्ती से पालना करने के फरमान मेघवालों की पंचायतों ने जारी करने शुरू कर दिए। हमारे क्षेत्र में ये काम आजादी से पहले ही बंद कर दिए गए थे पर कुछ जगह अपवाद भी थे। उन पर पंचायतें सख्त होने लगीं। इसी सख्ती के विरुद्ध सवर्ण हिन्दू समाज खड़ा हो गया और कुछ हमारे ही लोग, कारण यह था कि पंचायतों के फरमान, जिसे परवाना कहा जाता था, उस पर जब तक राज की निशानी/सील नहीं लगती थी तब तक वह बाध्यकारी नहीं होता था और कोई भी हाकिम या जागीरदार ऐसा करने को तैयार नहीं रहता था। इसलिए मेघों पर भयंकर विपत्ति थी, फिर भी सभी मुसीबतों को झेलते हुए भी उन्होंने गंदे कहे जाने वाले कामों को स्वतः तिलांजलि दे दी। उनके साथ अन्य कौमों ने ऐसा नहीं किया। यह कहना प्रासंगिक है कि सिंध अधीन पंजाब और सिंध के आस-पास के हमारे बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर आदि के क्षेत्रों में, जो इस आन्दोलन की धूरी थे, उनमें आजादी से पहले पूर्ण प्रतिबन्ध लग गया परन्तु कई जगहों पर कई लोग इस पर सहमत नहीं हुए। उन में से कई लोग जो समाज सुधारक की भूमिका में थे वे खुलकर इसकी वकालत करने लगे। कांग्रेस और हिन्दू जनमत तो यही चाहता था। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं और उन लोगों को भी यही रास्ता अपनाना पड़ा।

वर्तमान में मेघवाल समाज में जो न्यात के मथारे (चोटिला) और पञ्च-पंचायती की मर्यादाएं है, वे इसी सभा की देन है। मारवाड़ के मेघवालो के इतिहास में अपनी तरह की यह पहली सभा या सम्मेलन था, जिसमें बेगारी, गैर बराबरी और अन्याय-अत्याचार के विरोध में खुलकर इस समाज ने सामूहिक रूप से चर्चा की और सामूहिक रूप से बेगारी के विरुद्ध खिलाफत का बिगुल बजाया। मेघवालों का यह एक नागरिक-विद्रोह था। इसके बाद ऐसा एक भी मौका नहीं आया, जिसमें मेघवालों ने पीछे मुड़कर देखा हो। वे हर जगह पर और हर स्तर पर संगठित होकर मुकाबला करते रहे। मथारों और खेड़ों के निर्धारण के साथ-साथ हर गांव और तहसील में भी सभाएं करने और वहां पर अनुभवी लोगों का दल बनाने का निर्णय भी इस न्यात में लिया गया। इस से गांवों में निवास करने वाले मेघों में एकता, स्फूर्ति और जागृति का ऐतिहासिक संचार हुआ। गांवों के पंच अपने-अपने क्षेत्र में इस पर पूरी निगरानी और नियंत्रण रखने लगे। गांवों के पंच अपने प्रभाव से समाज के नियमों का पालन करते हुए बेठ-बेगार और सामंती जुल्म के खिलाफ एकजुटता से लग गए और जहाँ कहीं भी ऐसा वाकया होता वे ढाल बनकर वहाँ खड़े होते और शोषण के खिलाफ संघर्ष करते। मेघवालों का यह ‘बेगारी-उन्मूलन आन्दोलन’ आजादी के वृहत् आन्दोलन में दब गया।


इन आन्दोलनों से हमें सीख लेनी चाहिए और हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन लोगों से हमें मुकाबला करना है, वे हमसे ज्यादा होशियार है और हमारे से बेहत्तर उनकी स्थिति है। आज के जीवन में प्रगतिशील लोगों से यदि हम कमजोर सिद्ध हुए, तो फिर हमारी खैर नहीं है, हमारी दुर्गति को कोई रोक नहीं सकेगा। आज राज-रजवाड़े नहीं है, शासन हिन्दू-शास्त्रों से नहीं चलता है और हर मोड़ पर प्रतिस्पर्धा है। हमारे लोगों में भी प्रतिभा और विलक्षण बुद्धि की कमी नहीं है, परन्तु हिन्दू समाज में हमारे प्रति हजारों सालों की नफरत भरी पड़ी है। इसलिए वे हमारी प्रतिभा और कौशल को सहज स्वीकार ही नहीं करते है। जिस समय हम सोने-सा काम करेंगे तो अन्य जातियों के लोग इसे शीशे का समझेंगे और अगर वे लोग शीशे-सा काम करेंगे तो भी वे अपने काम को सोने-सा महत्त्व देंगे और ऐसा ही बखान करेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा सोना भी उनकी नजरों में सोना नहीं, बल्कि कथीर है और उनका कथीर भी सोना है। समाज में इस तरह की सीख है। यह सीख शास्त्रों ने कूट-कूट कर उनके दिमागों में भर रखी है, इसलिए ऐसा ही व्यवहार और ऐसी ही सीख बनी हुई है। अन्य बातों में भी यही स्थिति बनी हुई है। अगर हम उनके बराबर या उनसे थोडा-बहुत अच्छा काम करते है, तो भी उनकी नजरों में उसका कोई महत्त्व नहीं होता है। इसलिए हम लोगों को हर स्तर पर मेहनत करनी पड़ेगी। कोई भी काम उनसे सौ गुणा अच्छा करेंगे, तब जाकर कहीं हम उनकी बराबरी के समझे जायेंगे। यह एक सामाजिक सच्चाई है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों से उभरने के लिए भी प्रतिस्पर्था में उतरो और आगे बढ़ो। सदियों से हमारे प्रति जो भावना है, उसे आप एक-दो दिन में, एक-दो आदमी से या एक-दो कामों से नहीं तोड़ सकते हो, इसलिए आप सब का कर्त्तव्य है कि आप पूरे समाज को ऊपर उठाने का जज्बा अपने में पैदा करें और उसके अनुरूप ही आगे बढ़ें।

आज समाज का चारों तरफ से शोषण हो रहा है। हर जगह हम अकेले, निस्सहाय और निहत्थे है। हिन्दू धर्म की जनसँख्या में हम अल्पसंख्यक है और हिन्दू समाज के स्तर पर भी हम न तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र जाति में गिने जाते है और न उच्च-वर्ण में माने जाते है बल्कि नीचे के पांवदान पर हमारी स्थिति है। छोटे से छोटे पटवार घर से लेकर बड़े-बड़े ऑफिस, कोर्ट और कचहरी में हमारे लिए न्याय मुश्किल है। इन परिस्थितियों से बचने के लिए हमें खूब पढना-लिखना पड़ेगा, संगठित होकर रहना पड़ेगा और राज-काज में जो महत्त्वपूर्ण पद है उन्हें प्राप्त करना पड़ेगा, उसके लिए विद्यार्थी वर्ग को और युवा पीढ़ी को महत्त्वाकांक्षी बनकर संकल्प के साथ आगे बढ़ना पड़ेगा। हर परिस्थिति का मुकाबला करके जब आप आगे निकल जायेंगे तो इस समाज के गौरव के बहुमान को कोई नहीं रोक पायेगा। इसलिए कैसी भी परिस्थिति हो, आप निराश नहीं होवें, बल्कि प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहे। हमारे समाज के लोगों के पास जीविका के प्रयाप्त साधन नहीं है, सरकारी संरक्षण नहीं है, फिर भी जगह –जगह हम लोग डटे हुए है।

अंत में, अपनी बात समाप्त करने से पहले जो यह राजनीति है, इस पर थोडा बोलते हुए अपनी बात को समाप्त करना चाहूँगा। आप सभी जानते हैं कि आजादी में सभी का योगदान रहा है और हमारे समाज के लोगों ने भी इसके लिए कुर्बानियां दी हैं। आजादी के बाद सत्ता का हस्तांतरण अंग्रेजों के हाथों से एक ऐसे वर्ग के हाथों में चला गया है, जो दंभ तो प्रजातंत्र का भरता है, परन्तु घोर ब्राह्मणवादी और सामंती मानसिकता से ओत-प्रोत है। विगत 70 वर्षों से हमने इस चीज को अनुभव किया कि सत्ता हमारे साथ नहीं है। आजादी के बाद जो राजनीती चल रही है, उसको देखते-जानते हुए उसकी धारा किधर और किस किनारे पहुंचेगी, इस बारे में कुछ भी भविष्य कथन करने में डर लगता है। राजनीती में देखा जाय तो जिन लोगों की छाया से भी पहले डर लगता था, आज वे सत्ता के भागीदार हैं। उनके सामने बड़े-बड़े अधिकारी, ब्राह्मण, राजपूत, बनिए, पिछड़े शुद्र या अन्य जातियां हैं, वे सिर झुकाते हुए देखे गए है।

यह राजनीती का करिश्मा नहीं है, बल्कि राजनीती में जो ताकत होती है, उसका परिणाम है। हम लोगों का संगठन नहीं होने से हम राजनीती में ऐसी ताकत अभी पैदा नहीं कर पाये हैं, भलेई हमारे एम्.पी., एम.एल.. और मंत्रियों की झड़ी लगी हो, परन्तु राजनीती में हमारी अभी भी ताकत नहीं हैं, इस लिहाज से सामंती जागीरदारी के राज और आज के राज में कोई फर्क नहीं है। हमारे लिए सत्ता नहीं के बराबर है। फर्क इतना है कि पहले सत्ता वंश परंपरा से चलती थी और अब एक तरह की सम्मति से चलती है। ऐसी सत्ता हमारे किसी काम की नहीं है।

हमारे जो प्रतिनिधि है, वे चाहे तो विधानसभा या संसद में बैठकर हमारे अधिकार और हक़ की शिकायत कर सकते हैं, उन्हें करनी चाहिए परन्तु स्थिति बड़ी निराशाजनक है। वे बुत बने रहते है या अपने आकाओं के निर्देशों पर बड़ी ऊठक-बैठक करते है। हमारे हितों के प्रति उनकी ईमानदारी संदिग्ध है। आज दो-तीन हजारो साल पुराणी रूढ़ियों की वजह से जो भेद-भाव और निर्योग्यतायें हम पर थोंप दी गयी, वे बनी हुयी है। हम यह तो मान सकते है कि इसमें 10-20 साल अपर्याप्त है, परन्तु 60-70 साल कम नहीं होते हैं। इस अवधि में 4-5 पीढियों का जीवन बीत गया है, फिर भी हमारे पक्ष में हिन्दू-मानसिकता नहीं है तो हमें गंभीरता से सोचना पड़ेगा। कानून बना दिए जाने के बाद भी जातिगत भेद-भाव और गैर-बराबरी के रस्म-रिवाजों पर क़ानूनी दबाब नहीं है, तो यह आजादी किसी काम की नहीं है। हमारे जेहन में बार-बार यह प्रश्न कौंधता है कि क्या सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में कानून बनाकर परिवर्तन करना संभव है या नहीं? यह यक्ष प्रश्न हमारी भावी पीढ़ी के सामने भी खड़ा रहेगा। इसलिए हमें राजनीति में भी सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।

आप देखिये, हम लोगों ने आजादी की लडाई लड़ी, छुआ-छूत के विरुद्ध संघर्ष किया, बेगारी के विरुद्ध आन्दोलन किया और उससे निजात पायी। हमारी गाडी आगे बढ़ी। राजनीति के सहारे, समाज-सुधारकों के सहारे हमारी गाडी प्रगति के पहाड़ पर चढ़ रही है। पहाड़ पर चढ़ते हुए जैसे बैलों के पैरों से गाडी फिसल जाती है, गाडी के फिसलने का डर रहता है, ऐसी ही आज हमारी हालात है। हम लोग पहाड़ की ढलान पर है और राजनीति के इस हो-हल्ले में हमें जो सवाल उठाने चाहिए, वे सवाल पीछे छूट गए है। प्रजातंत्र में संख्या-बल का महत्त्व होता है और उससे भी महत्त्वपूर्ण सत्ता की सम्मति में भागीदारी होती है। ऐसी जगहों पर जहाँ निर्णय किये जाते है, योजनाये बनती है, प्रगति के रास्ते मुहैया कराये जाते है, उनसे हमारे वर्ग को निरंतर दूर रखा जा रहा है। सत्ता एक विशेष वर्ग की सम्मति से ही अमल में लायी जा रही है। पार्टियों के नाम बदल जाते है, बैनर बदल जाते है, चेहरे बदल जाते है, परन्तु सत्ता की सम्मति पर कब्ज़ा उसी वर्ग का है। हमें इस बात को समझना और तोड़ना पड़ेगा, तभी हम राजनीति में कूच कर पाएंगे। इस देश पर विभिन्न लोगों ने राज किया है। अब यह मौका आपके पास है। आप इस देश की लोकशाही को मजबूत करो। आप देखिये, जब लोकशाही मजबूत होगी तो आप भी मजबूत होंगे, देश का हर नागरिक मजबूत होगा और वह संविधान के मूल्यों को मजबूत करने से ही होगा। इसलिए इस अवसर पर मेरा आपसे निवेदन है की आप उठो! जागो!! और आगे बढ़ो!!! हमारी गाडी आगे बढे और शिखर पर चढ़े इसके लिए हम सबको एकजुट होकर लग जाना चाहिए। आप लोग उठिए, जागिये और मनोबल को प्राप्त करिए और अपना उद्धार अपने आप से करिए।

अंत में, पुनः आप सबका आभार व्यक्त करता हूँ। आपने इस अवसर पर मुझे बुलाया और विचार रखने का मौका दिया और आप सबने उसे ध्यानपूर्वक सुना, इसके लिए मैं आप सबका और आयोजकों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

जय भीम ! जय भारत !!


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